Quantcast
अपनी तरह का एक हॉलीडे रिज़ॉर्ट
एक स्थल- जहां आप ध्यान कर सकते हैं और स्वयं से साक्षात्कार


ओशो,
आपका एक और कम्यून आकार ले रहा है और मुझे ऐसा लगने लगा है कि मैं यहां मिसफिट हूं। भारत, यहां तक कि कम्यून भी ऐसी जगह नहीं जहां मैं संतुष्ट हूं। क्या कहीं कोई ऐसी अवस्था है जिसे "अपने पर ही ध्यान देना, संतुष्ट रहना व अहोभाव से भरना "कहते हैं? क्या यह अहंकार का ही एक और रूप नहीं?


प्रेम लीलाधर, मैं स्वयं यहां मिसफिट हूं। और यह जगह कम्यून से कहीं दूर निकल गयी है। कम्यून एक वैकल्पिक समाज था लेकिन इसकी अपनी व्यवस्था, अपने नियम,अपने अधिनियम हैं। यह देखते हुए कि मिसफिट्स के लिए कम्यून का हिस्सा होना कठिन होगा, मैने कम्यून का विचार भी छोड़ दिया है।

यहां अब केवल व्यक्ति हैं जो मिलजुल कर रह रहे हैं। यहां किसी व्यक्ति से यह अपेक्षा नहीं की जाती कि वह यहां स्थायी रूप से रहे; वह जब जी चाहे यहां रह सकता है और जब जी चाहे जा सकता है। हम प्रत्येक अजनबी को हर संभव आकाश देने का प्रयास कर रहे हैं। यूरोप में मेरा एक सन्यासी वीरेश " ओशो मिसफिट सिटीज़

"निर्मित कर रहा है। मेरे देखे तुमने यह विचार अमेरीका के कम्यून से पाया है। तुम्हारे लिए वहां का अनुभव बहुत कठिन रहा होगा क्योंकि जहां भी हज़ारों लोग इकट्ठे रहते हैं,उन्हें कुछ नियमों का पालन करना होता है। अन्यथा जीना असंभव हो जायेगा।

यहां स्थायी रूप से रहने की कोई व्यवस्था नहीं है। जब तक तुम्हें अच्छा लगे तुम यहां रह सकते हो। जिस क्षण तुम्हें यहां घुटन महसूस हो, पूरा संसार तुम्हारे लिये उपलब्ध है, तुम जहां चाहो जा सकते हो और आराम से रह सकते हो। लेकिन मैं तुम्हें यह बताना चाहता हूं कि यदि तुम यहाँ खुश नहीं रह सकते तो फिर कहीं भी खुश न रह सकोगे।

मैं तुम्हारा प्रश्न पढ़ता हूं:"आपका एक और कम्यून आकार ले रहा है" यह सत्य नहीं है।

कोई कम्यून आकार नहीं ले रहा


मैने बहुत कोशिश की लेकिन इसे असंभव पाया....यदि कम्यून को रहना है तो व्यक्ति को समझौता करना पड़ेगा। यह अत्यंत स्वाभाविक और आवाश्यक है। और मैं मिस्फिट, विद्रोहियों, के इतना पक्ष में हूं कि मैने मिस्फिट्स को निकालने की बजाय कम्यून का विचार ही छोड़ दिया। अब यहाँ केवल मिसफिट लोग हैं।

और मिसफिट लोग ही एक दूसरे की ज़रूरतों को समझ सकते हैं। ज़रूरत है तो बस स्वयं होने की, स्वयं पर ध्यान देने की। इसीलिए हम यहां पर कोई उत्पादन गतिविधि विकसित नहीं कर रहे। न तो हमें सड़कों का निर्माण करना है, न ही कोई घर बनाने हैं। क्योंकि अगर आपको घर बनाने हों, सड़कें बनानी हों, खेती करनी हो, दूध व दूध से बनी वस्तुओं का उत्पादन करना हो तो स्वभावत: किसी विशेष संस्था की आवश्यकता होगी।

लीलाधर प्लास्टिक सर्जन है। हम तो यहां कोई मैडीकल सैटर भी रखने वाले नहीं। अमेरीका के कम्यून बनने से पहले एक मैडीकल सैंटर हुआ करता था पर इस के लिए संस्था की ज़रूरत है।

अब मैं इस जगह को स्वर्ग की तरह देखना चाहता हूं- छुट्टियां बिताने के लिए एक सैरगाह, जहां आप विश्रांत हो सकते हैं, मालिश करवा सकते हैं ......जल्दी ही यहां तैरने के लिये ताल होंगे, बड़े-बड़े उद्यान व बगीचे होंगे। आप जब चाहें , अपने संगीत -वाद्यों पर संगीत बजा सकते हैं। आपका जो भी जी चाहे, आप कर सकते हैं।

बस इतना ध्यान रहे कि आप जो भी करें वह दूसरे की जीवनचर्या में दखल न हो क्योंकि ठीक आप ही की तरह वह भी स्वतंत्र रहना चाहता है।
बस यही एक समझौता है-
कि प्रत्येक व्यक्ति इस हद्द तक स्वतंत्र हो जाए कि वह दूसरे के जीवन में दखल न दे।


इतनी सी सीमा अत्यंत आवश्यक है। जरा सोचें- आप सो रहे हैं और कुछ मिस्फिट आयें और तुम्हारे कमरे में सक्रिय ध्यान करना शुरु कर दें। वे अपना कार्य कर रहे हैं, वे तुम्हें सक्रिय ध्यान करने के लिये नहीं कह रहे। और उनके जाने के बाद दूसरे मिसफिट आ जायें और अपने वाद्यों पर संगीत बजाना शुरू कर दें। आपको कोई तंग नहीं कर रहा; आप सोये रह सकते हैं या जो भी आप करना! तो यह पंक्ति स्मरण रखें...

अन्यथा कोई दखल नहीं है। कार्य मैने बिलकुल हटा दिया है, जब तक कि तुम ही न करना चाहो, जब तक कि तुम्हारा ही मन न हो। कम्यून को जीवित रखने के लिये कार्य अत्यंत आवश्यक था। यहां तुम तब आओ जब आर्थिक रूप में समर्थ हो, तब जितनी देर रह सको रहो, लेकिन तुम पर किसी काम को थोपने का सवाल ही नहीं उठता। यदि तुम काम करना चाहते हो तो यह तुम्हारा चुनाव होगा या तुम आराम करना चाहते हो, तैरना चाहते हो, सामूहिक चिकित्सा में सहभागी होना चाहते हो,- या न होना चाहते हो, कोई ध्यान न करना चाहते हो, बस स्वयं होना चाहते हो।

तुम कह रहे हो,"मुझे ऐसा लगने लगा है कि मैं यहां अजनबी हूं।" तुम फिर एक बार गलत हो, लीलाधर,तुम पैदा ही मिसफिट हुए हो। ऐसा नहीं कि ऐसा तुम्हें लग रहा है। मैं तुम्हें भली-भांति जानता हूं।

तुम्हारे बावजूद मैने तुम्हें कम्यून की अस्पताल यूनिट में रखने की ज़िद की थी। मैं चाहता था कि तुम यूनिट में रहो और तुम रहे- लेकिन हो तुम मिसफिट।

मिसफिट को एक बात तो स्वीकार करनी ही होगी कि उसे साधारण समाज से आदर नहीं मिलेगा। मिसफिट होने के लिये उसे तालियां या मान-सम्मान तो मिलने से रहा। मैं निश्चित ही एक ऐसा अवॉर्ड शुरू करने की सोच रहा हूं, एक ऐसा अवॉर्ड जो महानतम मिसफिट को दिया जायेगा। और लीलाधर तुम्हारा नाम उस सूचि में पहला है।

लेकिन तकलीफ कहीं बाहर से नहीं आ रही, क्योंकि मैं नहीं समझता कि बाहर तुमसे कुछ करने की अपेक्षा की जाती है। तुम भीतरी तनाव की वजह से बेचैनी महसूस कर रहे हो; तुम मिसफिट नहीं होना चाहते, लेकिन तुम मिसफिट हो। तुम पूरे प्रेम और आनंद से यह स्वीकार नहीं करना चाहते कि तुम मिसफिट हो।

इसमें कुछ गलत नहीं; समाज को कुछ मिसफिट लोगों की आवश्यकता है।


ये वो लोग हैं जो पीढ़ी-दर-पीढ़ी स्वतंत्रता व चेतना की मशाल लेकर चलते हैं।

क्या तुम समझते हो कि गौतम बुद्ध मिसफिट नहीं थे? या महावीर मिसफिट नहीं थे? एक राजा का पुत्र हो कर नग्न हो जाना-उनके पिता बहुत शर्मिंदा थे, उनका पूरा परिवार शर्मिंदा था। वे राज़ी थे- "तुम संसार त्याग दो...लेकिन नग्न होने की क्या आवश्यकता है?" परंतु महावीर को कोई बेचैनी न थी; वे जैसे थे, वैसे ही उन्होंने स्वयं को स्वीकार किया।

यह विद्रोह अकेला नहीं आता; यह लोगों द्वारा साथ में अपमान भी लाएगा। तुम्हें इसे स्वीकार करना होगा।

समाज उन लोगों से बना है जो सीधे सपाट हैं, बिल्कुल फिट लोग। कोई भी मिसफिट एक खलल होगा। यह समाज हर बच्चे में यह धारणा निर्मित करता है: कभी भी विद्रोही मत होना, नहीं तो तुम्हारा अपमान होगा, अनादर होगा, तिरस्कार होगा। और वे धारणाएं अभी भी तुम्हारे मन में हैं।

विद्रोह तुम्हारा स्वभाव है, और बेचैनी इसलिए हो रही है कि जो धारणाएं समाज सबको देता है वे उसने तुम्हें भी दी हैं। तुम संयुक्त नहीं हो; बंटे-बंटे हो। अंदर गहरे में कहीं तुम विद्रोही नहीं होना चाहते।

मैं तुम्हें सलाह देता हूं, उन धारणाओं को छोड़ दो। सब प्रतिष्ठा, सब सम्मान व्यर्थ है अगर यह तुम्हारे स्वभाव के विपरीत है। तुम क्या कर सकते हो अगर तुम कमल का फूल नहीं हो, और गेंदा ही हो? तो गेंदा होने में ही प्रसन्न रहो।

अस्तित्व विद्रोही लोगों का अनादर नहीं करता।


सूर्य को कोई फर्क नहीं पड़्ता, चांद कोई भेद नहीं करता; पूरा अस्तित्व तुम्हें , जैसे तुम हो, वैसे ही स्वीकारता है। लेकिन भीतर गहरे में कहीं अस्वीकॄति है,इसीलिए तुम खंडित हो, असमंजस में हो। इस असमंजस के साथ तुम जहां भी जाते हो, तुम और बेचैन हो जाते हो, जितने बेचैन हो, उससे भी अधिक, क्योंकि यहां तुम्हारी निंदा करने या तुम्हारे बारे में राय बनाने में रुचि नहीं रखता। यहां तुम्हें कोई यह नहीं कहेगा, "लीलाधर, तुम वो नहीं जो तुम्हें होना चाहिये।" यहां "चाहिये" जैसा कुछ नहीं है।

अमेरीका के कम्यून में तुम्हें प्लास्टिक सर्जन के रूप में काम करना पसंद नहीं था। अब मौका है- यहां तुम्हें कोई भी प्लास्टिक सर्जन होने को नहीं कह रहा, तुम चाहो ,तो भी यहां प्लास्टिक सर्जरी में किसी की रुचि नहीं। यदि किसी का नाक लंबा है तो किसी को कोई तकलीफ नहीं है। या फिर थोड़ा छोटा है... नाक केवल एक साधन है। नाक लंबा हो या छोटा, अगर श्वास ठीक आ रही है तो कोई समस्या नहीं। यहां कोई पुरुष को स्त्री बनाने में उत्सुक नहीं है,या स्त्री को पुरुष।

यह कोई कम्यून नहीं है, यह केवल एक समूह है हर प्रकार के मिसफिट व्यक्तियों का जो कहीं भी फिट नहीं हो सकते। यहां वे अपने मिसफिट होने का उत्सव मना सकते हैं बिना अपना सम्मान,आदर या प्रतिष्ठा खोये।

तुम कहते हो," भारत, यहां तक कि कम्यून भी ऐसी जगह नहीं जहां मैं संतुष्ट हूं।"

भारत सर्वाधिक पुराना देश है जिसने हर प्रकार के मिसफिट लोगों को जगह दी है।


यह अविश्वसनीय बात है कि भारतीय समाज नें कभी किसी जीसस को सूली नहीं दी और यहां बहुत से ऐसे लोग हुए हैं जिम्होंने दावा किय है,"अहं ब्रह्मास्मि", " मैं ब्रह्म हूं"- जीसस तो केवल इतना कह रहे थे कि " मैं परमात्मा का इकलौता पुत्र हूं"- और किसी ने एतराज नहीं किया। यदि वे आल्हादित हैं और आनंदित अनुभव कर रहे हैं तो वे किसी को कोई नुकसान नहीं पहुंचा रहे।

गौतम बुद्ध परमात्मा में विश्वास नहीं करते थे। महावीर ने परमात्मा की धारणा को बिलकुल नकार दिया। लेकिन उंहें सूली नहीं दी गयी। जैसे वे थे वैसे ही उन्हें प्रेम किया गया...

इस देश ने सब तरह के मिसफिट लोगों को स्वीकार किया है और प्रेम दिया है। और यदि तुम्हें लगता है कि भारत ने तुम्हें परेशान किया है तो तुम्हें यहां कुछ देर और रहना होगा ताकि तुम्हें यहां का वातावरण छू सके। मैने विश्व भर में भ्रमण किया है लेकिन किसी भी देश का ऐसा छू देने वाला वातवरण नहीं है...

निश्चित ही तुम मुझसे बड़े मिसफिट नहीं हो...

लीलाधर, पहली बात तो यह है कि तुम्हारी बेचैनी तुम्हारे संस्कारों के कारण है, और दूसरे तुमने समग्रता से अपने मिसफिट होने को स्वीकार नहीं किया है, नहीं तो कोई बेचैन क्यों हो?

और तुम कहीं भी, कुछ भी करने को स्वतंत्र हो।

उदाहरण के लिये ,मैं विश्व भर में कहीं भी परेशान नहीं हुआ। मैं अमेरिका के जेल में परेशान नहीं हुआ। मैं विभिन्न सभ्यताओं में, विभिन्न देशों में, विभिन्न धर्मों में परेशान नहीं हुआ। मैं अपनी परेशानी को पूरे आनंद से स्वीकार करता हूं...

मैने कहीं भी परेशान नहीं महसूस किया।

मौलिक बात है- स्वयं को स्वीकार करना।


यह एक आंतरिक भावना है जिसका बाहर से कुछ लेना देना नहीं। और मैं दोहराता हूं, लीलाधर, कि यदि तुम यहां खुश नहीं रह सकते तो इस धरती पर तुम्हें कोई भी ऐसा स्थान नहीं मिलेगा जहां तुम खुश रह सको। कहीं भी ऐसा अनूठा स्थान नहीं है जहां व्यक्ति का सम्मान होता हो, कहीं भी तुम जैसे हो वैसे ही तुम्हें प्रेम नहीं मिलता। तुम्हें स्वयं को सिद्ध करना होता है, तुम्हें अर्जित करना होता है। यहां तुम्हें कुछ सिद्ध नहीं करना है, न ही कुछअर्जित करना है।

तुम्हें किसी चीज के लिये भी अपनी योग्यता सिद्ध नहीं करनी है। तुम बस ऐसे ही हो और हर कोई स्वीकार के एक अनूठे बोध से भरा है। थोड़ा सा समय दो।

क्या कहीं कोई ऐसी अवस्था है जिसे "अपने पर ही ध्यान देना, संतुष्ट रहना व अहोभाव से भरना"कहते हैं?

हां , जीवन के प्रति मेरी पूरी दृष्टि ही यह रही है- "अपने पर ही ध्यान देना, संतुष्ट रहना व अहोभाव से भरना" कहते हैं... यह अहंकार की पुष्टि नहीं है। यह तुम्हारा अपना स्वभाव है जो किसी भी उलझन से बचना चाहता है।

और यहां हम ऐसा कोई भी कार्य नहीं कर रहे जिसमें हमें किसी पर कुछ थोपना पड़े। इस स्थान को तुम्हारे भीतर एक छाप छोड़नी है -प्रफुल्लता की, मौन की, सौंदर्य की। और जो लोग तुमसे उलझते नहीं, तुम्हारी खुशी में खुश हैं। यहां कोइ ईर्ष्या से नहीं भरा हुआ, कोई प्रतियोगी नहीं है। कोई तुलना तक नहीं कर रहा।

लेकिन यह सब तुम पर निर्भर करता है।
मैने यहां एक स्थान निर्मित किया है।
अब तुमने इसका इस्तेमाल करना है, यह तुम पर निर्भर करता है।

1987 - द हिडन स्प्लेंडर में प्रकाशित ओशो प्रवचन से उद्धृत (नंबर 21)
Search Osho.com Site Map Osho.com copyright info