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About Meditation? तादात्म्य के कारण थकान

तादात्म्य के कारण थकान

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तादात्म्य के कारण थकान

ओशो

नहीं, बिलकुल नहीं। ऊर्जा तो जग रही है, ऊर्जा तो जग रही है; ऊर्जा को जगाने के लिए ही सारा काम चल रहा है। हां, इंद्रियां थक रही हैं। इंद्रियां ऊर्जा नहीं हैं, सिर्फ ऊर्जा के बहने के द्वार हैं। यह दरवाजा मैं नहीं हूं, मैं तो और हूं। इस दरवाजे से बाहर-भीतर आता-जाता हूं। दरवाजा थक रहा है, और दरवाजा कह रहा है—कृपा करके हमसे बाहर मत जाओ, बहुत थके हुए हैं। लेकिन कहां जाओगे, फिर रहना तो भीतर पड़ेगा। दरवाजा कह रहा है—हम बहुत थके हुए हैं, अब कृपा करो कि मत जाओ बाहर; क्योंकि जाओगे तो हमें फिर काम में लगना पड़ेगा। आंख कह रही है कि हम थक गए हैं, अब इधर से यात्रा मत करो।

इंद्रियां थक रही हैं। और इनका थकना प्राथमिक रूप से बड़ा सहयोगी है। उस अर्थ में। प्रश्न: यह ऊर्जा यदि अधिक है तो टायर्डनेस नहीं लगनी चाहिए, फ्रेशनेस लगनी चाहिए।

नहीं, शुरू में लगेगी। धीरे-धीरे तो तुम्हें बहुत ताजगी लगेगी, जैसी ताजगी तुमने कभी नहीं जानी। लेकिन शुरू में थकान लगेगी। शुरू में थकान इसलिए लगेगी कि तुम्हारी आइडेंटिटी इन इंद्रियों से है। इन्हीं को तुम समझते हो ‘मैं’। तो जब इंद्रियां थकती हैं, तुम कहते हो, मैं थक गया। इससे तुम्हारी आइडेंटिटी टूटनी चाहिए न! जिस दिन... ऐसा मामला है कि तुम्हारा घोड़ा थक गया, तुम घोड़े पर बैठे हो। लेकिन तुम सदा से समझते थे कि मैं घोड़ा हूं। अब घोड़ा थक गया, अब तुमने कहा, हम मरे, हम थक गए। वह हमारे थकने का जो मतलब है, हमारी आइडेंटिटी जिससे है, वही हम कहते हैं। मैं घोड़ा हूं, तो मैं थक गया।

जिस दिन तुम जानोगे कि मैं घोड़ा नहीं हूं, उस दिन तुम्हारी फ्रेशनेस बहुत और तरह से आनी शुरू होगी। और तब तुम जानोगे कि इंद्रियां थक गई हैं, लेकिन मैं कहां थका! बल्कि इंद्रियां चूंकि थक गई हैं और काम नहीं कर रही हैं, इसलिए बहुत सी ऊर्जा जो उनसे विकीर्ण होकर व्यर्थ हो जाती थी, वह तुम्हारे भीतर संरक्षित हो गई है और पुंज बन गई है। और तुम ज्यादा, जिसको कहना चाहिए कंजर्वेशन ऑफ एनर्जी अनुभव करोगे कि तुमने बहुत ऊर्जा बचाई जो तुम्हारी संपत्ति बन गई है। और चूंकि बाहर नहीं गई, इसलिए तुम्हारे रोएं-रोएं पोर-पोर में भीतर फैल गई है। लेकिन इससे तुम एक हो, यह तुम्हें जब खयाल आना शुरू होगा, तभी तुम्हें फर्क लगेगा।

तो धीरे-धीरे तो ध्यान के बाद बहुत ही ताजगी मालूम होगी। ताजगी कहना ही गलत है, तुम ताजगी हो जाओगे। यानी ऐसा नहीं कि ऐसा लगेगा कि ताजगी मालूम हो रही है। तुम ताजगी हो जाओगे—यू विल बी दि फ्रेशनेस। लेकिन वह तो आइडेंटिटी बदलेगी तब। अभी तो घोड़े पर बैठे हो, बहुत मुश्किल से, जिंदगी भर यही समझा है कि मैं घोड़ा हूं। सवार हूं, इसको समझने में वक्त लगेगा। और शायद घोड़ा थककर गिर पड़े, तो आसानी हो जाए तुम्हें। अपने पैर से चलना पड़े थोड़ा, तो पता चले कि मैं तो अलग हूं। लेकिन घोड़े पर ही चलते-चलते यह खयाल ही भूल गया है कि मैं भी चल सकता हूं। ऐसा है! इसलिए थकेगा घोड़ा तो अच्छा होगा।

जिन खोजा तिन पाइया / 8

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