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About Meditation? विधि को बदलने के बारे में कैसे जानें? -

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सदा स्मरण रखें, जिस विधि से भी तुम्हें आनंद मिलता है वह तुम्हारे भीतर गहरे उतर सकती है; केवल वही तुम्हारे भीतर गहरी उतर सकती है। इससे आनंद मिलने का अर्थ केवल इतना है कि यह तुम्हारे लिए बनी है। यह तुम्हारे साथ लयबद्ध है: विधि एवं तुम्हारे मध्य की सूक्ष् सहमति है।

एक बार जब तुम किसी विधि से आनंद प्राप्त करते हो तो लालची मत बनो; उस विधि में जितना हो सके गहरे उतरो। कम से कम तुम उसे दिन में एक बार अथवा संभव हो सके दो बार कर सकते हो। जितना अधिक तुम इसे करते हो, उतना अधिक तुम्हें उससे आनंद मिलेगा। विधि को तभी छोड़ो जब उससे आनंद समाप्त होने लगे । तब इसका कार्य समाप्त हो गया। कोई और विधि तलाश करें। कोई विधि तुम्हें अंतिम छोर तक नहीं पहुँचा सकती।

यात्रा के दौरान तुम्हें कई बार रेलगाड़ियाँ बदलनी होंगी। एक विशेष विधि तुम्हें एक निश्चित स्थान तक तो ले कर जा सकती है। इसके आगे इसका कोई अधिक उपयोग नहीं है, इसकी पूर्णाहूति हो चुकी है।

अत: दो बातें ध्यान में रखनी होंगी: जब तुम एक विधि से आनंद उठा रहे हो तो यथा संभव इसमें गहरे उतरें परंतु इसके आदी न बनें, क्योंकि एक दिन तुम्हें इसे भी छोड़ना होगा। यदि तुम इसके अधिक आदी हो जाते हो तो यह एक नशे की दवा हो जाती है; तुम इसे छोड़ नहीं सकते। तुम इससे अब आनंदित नहीं होते - इससे तुम्हें कुछ भी प्राप्त नहीं हो रहा - परंतु यह एक आदत बन गई है। तब तुम करना जारी रख सकते हो, परंतु तुम दायरों में घूम रहे हो; यह तुम्हें उनसे पार नहीं ले जा सकती।

अत: आनंद को कसौटी बनाएँ। यदि आनंद है तो जारी रखें, आनंद की अंतिम बूँद प्राप्त होने तक ज़ारी रखें। इसे पूर्णतया निचोड़ना होगा। कोई रस पीछे न बचे ....... एक बूँद भी नहीं। और फिर इसे छोड़ने के लिए समर्थ भी रहें। कोई और विधि ढूंढें जो पुन: आनंद लाए। एक व्यक्ति को अक्सर बदलाव करना ही पड़ता है। यह व्यक्ति-व्यक्ति पर निर्भर कर सकता है परंतु ऐसा कभी-कभार होता है कि एक विधि से सम्पूर्ण यात्रा हो।


ओशो: ओनली लूज़रर्ज कैन विन इन द् गेम



सभी विधियाँ जो मैनें तुम्हें दी हैं ऐसी हैं कि तुम्हें इन्हें छोड़ने की आवश्यकता न पड़े। केवल उन्हें परिपूर्णता तक प्रयोग में ले जाएँ, और उनके परिपूर्ण होते ही वो अपने आप गिर जांएगी - जैसे एक पका फल वृक्ष से गिरता है। और जब कोई विधि अपने आप लुप्त होती है, उसका अपना ही सौन्दर्य है; तब तुम्हारा साक्षी भाव बिना किसी छाप के है। केवल उस समय तक जारी रखें जब तक विधि अपने आप लुप्त न हो जाए, और तुम पर पहाड़ी पर सिर्फ एक दृष्टा बचे रहो।


ओशो: ट्रांसमिशन आफ़ द लैम्प, #29

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