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About Meditation? क्या सृजनात्मकता कहीं न कहीं ध्यान से जुड़ी है?

क्या सृजनात्मकता कहीं न कहीं ध्यान से जुड़ी है?

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कला को दो हिस्सों में बांटा जा सकता है। निन्यानबे प्रतिशत कला विषयगत कला है, केवल एक प्रतिशत ऑब्जेक्टिव या वस्तुगत है। निन्यानबे प्रतिशत विषयगत कला का ध्यान से कोई संबंध नहीं है। केवल एक प्रतिशत वस्तुगत कला ध्यान पर आधारित है।
विषयगत कला का अर्थ है तुम अपने आपको, अपने स्वप्नों को, अपनी कल्पनाओं और ख्यालों को कैनवास पर उंडेल रहे हो। यह तुम्हारी मानसिकता का प्रक्षेपण है। वही कविता के बाबत, संगीत और सृजन के सभी आयामों के बाबत घटता है। तुम्हारा उस व्यक्ति से कोई लेना-देना नहीं होता जो तुम्हारी पेंटिंग देखनेवाला है। वह जब उसे देखेगा तो उस पर क्या गुज़रेगी उससे तुम्हें कोई मतलब नहीं है। तुम्हारी कला सिर्फ एक वमन है। वह तुम्हें वैसे ही लाभदायी है जैसे वमन। वह मितली दूर करती है, वह तुम्हें अधिक साफ, अधिक स्वस्थ करती है। लेकिन तुमने यह नहीं सोचा कि जो तुम्हारे वमन को देखेगा उस पर क्या गुज़रेगी। उसे मितली आएगी, उसे लगेगा वह बीमार हो गया है ।  
पिकासो के चित्रों को देखो। वह महान चित्रकार है लेकिन महज एक विषयगत कलाकार है। उसके चित्रों को देखकर तुम्हें चक्कर आएगा, तुम बीमार अनुभव करोगे, मानो तुम्हारे दिमाग में कुछ अस्तव्यस्त हो गया है। तुम पिकासो के चित्र की तरफ ज्यादा देर तक देख नहीं सकते। तुम भाग जाना चाहोगे क्योंकि वह चित्र मौन व्यक्तित्व से नहीं आया है, वह अराजकता से आया है। वह एक दु:स्वप्न की उपज है। लेकिन निन्यानबे प्रतिशत कला उस श्रेणी की है।

वस्तुगत कला इससे ठीक उल्टी है। उस व्यक्ति में रेचन करने के लिए कुछ नहीं है, वह बिलकुल खाली है, एकदम स्वच्छ है। इस मौन से, इस करुणा से सृजन की संभावना निकलती है। यह मौन, यह करुणा, यह प्रेम ध्यान की गुणवत्ताएं हैं।
ध्यान तुम्हें तुहारे ठीक केंद्र पर लाता है। और तुम्हारा केंद्र सिर्फ तुम्हारा ही केंद्र नहीं है, यह समूचे अस्तित्व का केंद्र है। सिर्फ परिधि पर हम अलग हैं। जैसे-जैसे हम केंद्र की तरफ बढ़ने लगते हैं, हम एक हो जाते हैं। हम शाश्वत के हिस्से हैं –– मस्ती का ऐसा असीम दीप्तिमान अनुभव जो शब्दों के पार है; ऐसा कुछ जो तुम हो सकते हो लेकिन कहना कठिन है। लेकिन तुम्हारे भीतर एक अदम्य इच्छा उठती है कि इसे बांटें क्योंकि तुम्हारे आसपास अन्य लोग बिलकुल ऐसे ही अनुभवों के लिए टटोल रहे हैं। और तुम्हारे पास वह है, तुम वह रास्ता जानते हो।

और ये लोग सब तरफ खोज रहे हैं सिवाय अपने भीतर जहां वह है। तुम उनके कानों में चिल्लाना चाहोगे। तुम उन्हें झकझोरकर बताना चाहोगे, 'अपनी आंखें खोलो। कहां जा रहे हो? तुम जहां भी जाओगे, खुद से दूर जाओगे। घर लौट आओ, और अपने भीतर जितने गहरे जा सको, जाओ।'

बांटने की यह इच्छा सृजनात्मकता बनती है। कोई व्यक्ति नाच सकता है। ऐसे रहस्यदर्शी रहे हैं, जैसे जलालउद्दीन रूमी, जिनकी सिखावन शब्दों में नहीं थी, जिनकी सिखावन नृत्य के द्वारा थी। वे नाचते थे। उनके शिष्य उनके पास बैठे होते और वे उनसे कहते, ' जो भी मेरे साथ आना चाहें वे आ सकते हैं। यह तुम्हारे भाव का सवाल है। यदि तुम नहीं चाहते तो तुम्हारी मर्जी। तुम सिर्फ बैठो और देखो।'

 लेकिन जब तुम जलालउद्दीन रूमी जैसे आदमी को नाचते हुए देखते हो तो तुम्हारे अंदर सोया हुआ कुछ जाग उठता है। तुम देखते हो कि तुम्हारे बावजूद तुम नाच में शामिल हो गए। इससे पहले कि तुम्हें होश आए, तुम नाच में सम्मिलित हो चुके हो।  

यह अनुभव भी अत्यधिक कीमती है कि तुम एक चुंबकीय शक्ति की भांति खिंच गए हो। यह तुम्हारे मन का निर्णय नहीं है, तुमने उसके पक्ष या विपक्ष में सोचा नहीं है, कि शामिल होना है कि नहीं होना। रूमी के नृत्य का महज सौंदर्य, उसकी फैलती हुई ऊर्जा, इस सबने तुम पर काबू कर लिया है। तुम्हें कुछ छू गया है। यह नृत्य वस्तुगत कला है।

अगर तुम जारी रखोगे… और धीरे-धीरे तुम्हारी झिझक कम से कम होती जाएगी, जल्दी ही तुम पूरी दुनिया को भूल जाओगे। एक घड़ी आती है जब नर्तक खो जाता है और नृत्य रहता है।

हिंदुस्तान में मूर्तियां हैं जिनके पास, सिर्फ शांत बैठकर तुम्हें ध्यान करना होता है। इन मूर्तियों को देखो, उन्हें ध्यानियों ने इस भांति बनाया है, ऐसे अनुपात से कि केवल उस मूर्ति को, उस आकृति को,  उसके सौंदर्य को देखने से… तुम्हारे भीतर उसी तरह की मूर्ति बनानी हो
 तो सब कुछ बहुत गणित जैसा है। और बुद्ध या महावीर की मूर्ति के साथ मौन बैठने से तुम्हारे अंदर विचित्र अनुभूति होगी जो किसी पाश्चात्य शिल्प के पास बैठने से नहीं होगी।
 
समूचा पाश्चात्य शिल्प कामुक है। तुम यूनानी शिल्प देखो: खूबसूरत, लेकिन वह तुम्हारे अंदर कामुकता जगाता है। वह तुम्हारे सेक्स केंद्र पर चोट करता है। वह तुम्हें उन्नत नहीं करता। पूरब में स्थिति बिलकुल अलग है। मूर्तियां बनाई गई हैं लेकिन इससे पहले कि मूर्तिकार मूर्ति गढ़े, वह ध्यान सीखता है। किसी भी कला के लिए ध्यान अत्यंत आवश्यक है। हर कला के लिए ध्यान एक आत्यंतिक आवश्यकता है, तभी कला वस्तुगत होगी।
तब फिर हाइकु – लघु कविता का जापानी रूप – की चंद पंक्तियां यदि तुम शांति से पढ़ो तो तुम्हें आश्चर्य होगा कि वे किसी भी डायनामाइट से ज्यादा विस्फोटक होती हैं। वे बस तुम्हारे अंतस का द्वार खोलती हैं।
बाशो का छोटा सा हाइकु मैंने मेरे मकान के बगल में एक पोखरे के पास लगा रखा है। मुझे वह इतना प्यारा लगता है कि मैं चाहता था कि वह वहां हो। तो हर बार आते-जाते… बाशो उन लोगों में से है जिनसे मैं प्रेम करता हूं। उसमें ज्यादा कुछ नहीं है: एक प्राचीन पोखरा …यह कोई सामान्य कविता नहीं है। यह बहुत चित्रमय है। जरा देखो: एक प्राचीन पोखरा, एक मेंढक कूदता है … तुम प्राचीन पोखरे को लगभग देखते हो। तुम मानो मेंढक की आवाज सुनते हो, उसके कूदने की ध्वनि : प्लाप!
और फिर सब कुछ शांत होता है। प्राचीन पोखरा है, मेंढक कूद चुका है, उसकी कूदने की आवाज ने पहले से ज्यादा शांति को जन्म दिया है। उसे पढ़ना किसी और कविता की भांति नहीं है जिन्हें तुम पढ़ते रहते हो – एक कविता, दूसरी कविता … नहीं, तुम उसे पढ़ो और चुपचाप बैठ जाओ। उसे मन की आंख से देखो। आंखें बंद करो, प्राचीन पोखरे को देखो, मेंढक को देखो, उसे कूदते हुए देखो, उस आवाज को सुनो, पानी पर उठती हुई तरंगों को देखो, और उस सन्नाटे को सुनो जो बाद में शेष रहता है। यह है वस्तुगत कला।

  बाशो ने इसे बहुत ध्यानपूर्ण चित्तदशा में लिखा होगा: एक प्राचीन पोखरे के पास बैठे हुए, मेंढक को देखते हुए… और मेंढक कूदता है। और अचानक बाशो इस चमत्कार के प्रति जागता है कि ध्वनि  नीरवता को गहरा रही है, मौन पहले से भी ज्यादा है। इसे वस्तुगत कला कहते हैं।

जब तक कि तुम सर्जक नहीं हो, तुम्हें वास्तविक आनंद नहीं मिलेगा। केवल सृजन के द्वारा ही तुम विश्व की असीम सृजनात्मकता का हिस्सा बनते हो। लेकिन सर्जक बनने के लिए ध्यान एक मूलभूत जरूरत है। उसके बगैर तुम चित्र बना सकते हो लेकिन उस चित्र को जला देना चाहिए, उसे किसी को दिखाना नहीं चाहिए। वह अच्छी थी क्योंकि उसने तुम्हें निर्भार करने की कोशिश की लेकिन कृपा करके किसी और को बोझिल मत बनाओ। तुम्हारे मित्रों को उसे भेंट मत दो, वे तुम्हारे दुश्मन नहीं हैं।

वस्तुगत कला ध्यानपूर्ण कला है, विषयगत कला मन से निकली कला है।

ओशो: दि लास्ट टेस्टामेंट, भाग 3, प्रवचन 24

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