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About Meditation? क्या ध्यान करते हुए मुझे अपनी आँखें बंद रखनी आवश्यक हैं? -

क्या ध्यान करते हुए मुझे अपनी आँखें बंद रखनी आवश्यक हैं? -

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सम्पादक कि कलम से



सभी नहीं, लेकिन अधिकतर तकनीकों तथा किसी विशेष तकनीक के संपूर्ण चरणों में यह अपेक्षित है कि आप अपनी आँखें बंद रखें। जबकि अन्य कुछ में अपेक्षित है कि आप अपनी आँखें खुली रखें; जबकि कुछ में चुनाव आप पर छोड़ा जाता है।

आँखें बंद करने से अंतर्यात्रा कैसे सुलभ होती है इसके बारे में ओशो का बोध नीचे दिया गया है।

अंतर्यात्रा के लिए कोई प्राकृतिक रास्ता नहीं है, परंतु यह आवश्यक नहीं है। यदि पर्याप्त चेतना अन्तस में संग्रहीत हो जाए तो यह अपना रास्ता स्वयं बना लेती है, वैसे ही, जैसे पानी अपना रास्ता बना लेता है - कोई नक़्शा, कोई मार्गदर्शन नहीं, केवल पर्याप्त मात्रा और पानी एक अनजान सागर की ओर बहना शुरू हो जाएगा। कभी सुना नहीं, कुछ ज्ञात नहीं कि किस ओर बह रहा है।

यही चेतना के बारे में सच है। अन्तस में संग्रहीत चेतना अपने आप एक ऐसा रास्ता तुरंत बना लेती है जिस पर कभी किसी ने गमन नहीं किया, तथा अन्तर्यात्रा शुरू हो जाती है। बाह्य इंद्रियां बंद होती हैं; इसी से मेरा अभिप्राय है जब मैं तुम्हें अपने ध्यान में आँखें बंद करने के लिए कहता हूँ कि शरीर को पूर्णतया पीछे छोड़ना है ...... क्योंकि सारी इंद्रियां शरीर से जुड़ी हैं। केवल मन के दृष्टा बने रहें ताकि मन तुम्हारी ऊर्जा बाहर न ले जा सके। शरीर एवं मन, दोनों के बंद होने पर, ऊर्जा अपने आप घनीभूत हो जाती है और, एक बिंदु पर पहुंच कर यह ऊपर उठनी आरंभ हो जाती है। तो वे सभी दरवाज़े ,जो तुम्हें स्वयं से दूर ले जाते हैं, उन्हें बंद करने के अतिरिक्त तुम्हें कुछ नहीं करना है।

यह सबसे सरल है क्योंकि तुम्हें इसे करना नहीं है। परंतु केवल इसकी सरलता, इसके इतना प्रत्यक्ष होने के कारण, यह कठिन हो गया है, सबसे अधिक कठिन कार्य, क्योंकि कोई तुम्हें सिखा नहीं सकता; तुम्हें कहाँ जाना है, कैसे जाना है, इसका इशारा नहीं दे सकता। गुरु केवल ऐसी परिस्थिति पैदा कर सकता है जिसमें ऊर्जा की गति सहज हो जाती है।

इसे मैं कहता हूँ ध्यान। यह तुम्हारे किए नहीं होता। तुम्हें सभी कुछ करना बंद करना होगा। यह तुम्हारा अ- कर्ता होना है। उसी क्षण, जब तुम कुछ नहीं कर रहे, एक हज़ार एक कार्य कर रही तुम्हारी संलग्न संपूर्ण ऊर्जा को मार्ग मिल जाता है। यह उस बिंदु पर एकत्रित हो जाती है जहाँ से यह अंतस की तरफ़ बहना आरंभ कर देती है और अंतरतम केंद्र दूर नहीं है।


ओशो: दी मीरेकल, #9

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