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About Meditation? ध्यान की सक्रिय विधियाँ क्यों ?

ध्यान की सक्रिय विधियाँ क्यों ?

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''आधुनिक मानव एक बहुत नयी घटना है । किसी भी पारम्परिक पद्धति का उपयोग हू-बहू इसी रूप में नहीं किया जा सकता जैसी वह रही है क्योंकि आधुनिक मानव का पहले कभी अस्तित्व नहीं रहा । इसलिए एक तरीके से सभी पारम्परिक पद्धतियां असम्बद्ध हो गयी हैं।

''उदाहरण के तौर पर, शरीर में बहुत बदलाव आ गया है । यह इतना विषाक्त हो गया है कि कोई पारंम्परिक विधि सहायक नहीं हो सकती । हवा, पानी, समाज, जीने की स्थितियां अब सारा वातावरण कृत्रिम हो गया है । अब कुछ भी प्राकृतिक नहीं है । तुम कृत्रिमता में पैदा हुए हो, तुम्हारा विकास इसी में होता है । इसलिए पारम्परिक जीवन पद्धतियां आज के संदर्भ में हानिकारक सिद्ध होंगी । उन्हें आधुनिक स्थिति के अनुसार बदलना होगा ।

''दूसरी बात यह है कि मस्तिष्क की गुणवत्ता मूल रूप में बदल गई है । पंतजलि के समय में मनुष्य के व्यक्तित्व का केन्द्र मस्तिष्क नहीं था, बल्कि हृदय था । उससे पहले तो हृदय भी नहीं था । उस समय यह और नीचे नाभि के पास होता था । यह केन्द्र नाभि से भी आगे चला गया है। अब, यह केन्द्र मस्तिष्क है । इसीलिए तो कृष्णमूर्ति जैसे लोगों की शिक्षाओं में अपील होती है । किसी पद्धति की आवश्यकता नहीं है, किसी तकनीक की भी आवश्यकता नहीं है - बस, केवल समझदारी की जरूरत है । अगर केवल मौखिक समझदारी हो, बस बौद्धिक हो तो कुछ भी बदलता नहीं है , कुछ भी रूपांतरित नहीं होता । पुनः ज्ञान इकट्ठा हो जाता है ।

''मैं व्यवस्थित पद्धतियों की अपेक्षा अव्यवस्थित पद्धति का उपयोग करता हूं क्योंकि अव्यवस्थित पद्धति से इस केन्द्र को मस्तिष्क से नीचे ले जाने में आसानी रहती है । इस केन्द' को किसी व्यवस्थित पद्धति से नीचे नहीं ले जाया जा सकता क्योंकि व्यवस्थाकरण मस्तिष्क का कार्य है । किसी व्यवस्थित पद्धति से मस्तिष्क मजबूत होगा, इसे अधिक ऊर्जा मिलेगी, अव्यवस्थित पद्धतियों से मस्तिष्क निष्प्रभावी हो जाएगा । इससे कुछ नहीं होता । यह पद्धति इतनी अव्यवस्थित है कि केन्द्र स्वतः ही मस्तिष्क से हृदय में चला जाता है । यदि तुम मेरे इस सक्रिय ध्यान की पद्धति को दृढ़ता से अव्यवस्थित रूप से तथा अस्त-व्यस्त ढंग से उपयोग में लाओगे तो तुम्हारा केन्द्र हृदय में चला जाएगा । तब तो एक विरेचन प्रक्रिया हो जाती है ।

विरेचन की आवश्यकता इसलिए होती है क्योंकि तुम्हारे मस्तिष्क के कारण हृदय बहुत दमित अवस्था में रहता है । तुम्हारा मस्तिष्क का इतना अधिक प्रभाव रहता है कि यह तुम्हारे अस्तित्व पर हावी रहता है । हृदय का कोई स्थान नहीं होता, इसलिए हृदय की इच्छाओं का दमन होता है । तुम कभी हृदय से नहीं हंसे हो, कभी हृदय से नहीं जिये हो, हृदय से कभी भी कुछ नहीं किया । चीजों को गणितीय बनाने के लिए व्यवस्था में हमेशा मस्तिष्क आता है और हृदय का दमन होता है । इसलिए सबसे पहले चेतना के केन्द्र को मस्तिष्क से हृदय की ओर ले जाने के लिए किसी अव्यवस्थित पद्धति की आवश्यकता है ।

''उसके बाद हृदय को निर्भार करने के लिए, दमन चक्र को अलग फेंकने के लिए, हृदय को मुक्त रखने के लिए विरेचन की आवश्यकता है । यदि हृदय हल्का और निर्भार रहेगा तो चेतना के केन्द्र को और नीचे नाभि तक ले जाया जा सकता है । नाभि शक्ति का स्रोत है, ऐसा मूल स्रोत जहां से दूसरी हर चीज संबंधित है : शरीर और मस्तिष्क तथा हर चीज'' ।


ओशो: दि साइकौलॉजी ऑफ दि इसोटरिक

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