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About Meditation? क्या गुरु का मार्गदर्शन अनिवार्य है ?

क्या गुरु का मार्गदर्शन अनिवार्य है ?

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मार्गदर्शन अनिवार्य है, ऐसा हमें लगता है। लेकिन मार्गदर्शन सबीज हो सकता है और मार्गदर्शन निर्बीज हो सकता है। मार्गदर्शन ऐसा हो सकता है कि उससे सिर्फ तुम्हारे मन में विचार और कल्पनाएं और धारणाएं पकड़ जाएं। और मार्गदर्शन ऐसा हो सकता है कि तुम्हारे सब विचार और तुम्हारी सब धारणाएं तुमसे छिन जाएं और अलग हो जाएं। तो जो व्यक्ति कहता है, मैं मार्गदर्शन दूंगा, उससे बहुत डर है कि वह तुम्हें विचार पकड़ा दे। जो व्यक्ति कहता है, मैं कोई मार्गदर्शक नहीं हूं, उससे संभावना है कि वह तुम्हारे सब विचार छीन ले। जो कहता है, मैं तुम्हारा गुरु हूं, उसकी बहुत संभावना है कि वह तुम्हारे चित्त में बैठ जाए। जो कहता है, मैं गुरु नहीं हूं। राह चलते रास्ते पर हम मिल गए हैं। तुमने पूछा है कि यह रास्ता कहां जाता है? मैं जानता हूं, मैं कहता हूं कि यहां जाता है। बस इससे ज्यादा कोई संबंध नहीं है। तुम कभी लौट कर मुझे धन्यवाद भी देना, इसका भी सवाल नहीं है। बस बात यहीं खतम हो गई है।

मार्गदर्शन अगर निर्बीज हो, तो मार्गदर्शक नहीं होगा वहां। और मार्गदर्शन अगर सबीज हो, तो मार्गदर्शक बड़ा प्रबल होगा। बल्कि मार्गदर्शक कहेगा कि पहले मार्गदर्शक को मानो, फिर मार्गदर्शन है। कहेगा, पहले गुरु बनाओ, फिर दीक्षा है। कहेगा, पहले मुझे स्वीकार करो, तब ज्ञान। लेकिन जहां दूसरा जो निर्बीज मार्गदर्शन है—शब्द की तकलीफ है इसलिए ऐसा उपयोग करता हूं, जो निर्बीज मार्गदर्शन है—जो सीडलेस टीचर है, वह कहेगा, पहली तो बात यह रही कि अब मैं गुरु नहीं हूं। यानी पहले तो यह तय कर लो कि गुरु-शिष्य का संबंध न बनाओगे। पहले यह तय कर लो कि मेरी बात तुम्हारे लिए बीज नहीं बनेगी। पहले तो यह तय कर लो कि मुझे पकड़ नहीं लोगे, मेरे साथ क्लिंगिंग नहीं बना लोगे। पहले तो यह तय कर लो कि तुम्हारे मन में मेरे लिए कोई जगह न होगी। तब फिर आगे बात चल सकती है।

इन दोनों में फर्क पड़ेगा।
इसलिए कठिनाई होती है। जब मेरे जैसा व्यक्ति कहता है, कोई मार्गदर्शक नहीं, कोई मार्गदर्शन नहीं, कोई गुरु नहीं। तो तुम्हें कठिनाई होती है कि मार्गदर्शन तो चाहिए ही न! पर यह कह कर भी मार्गदर्शन होता है। और तब मार्गदर्शन के सब खतरे कट जाते हैं। और जो कहता है कि गुरु बिन तो ज्ञान नहीं होगा, तब मार्गदर्शन के सब खतरे पाजिटिवली मौजूद हो जाते हैं।

तो जो गुरु अपनी गुरुडम को इनकार करने को राजी नहीं है, वह गुरु होने की योग्यता खो देता है। जो गुरु अपने गुरुत्व को सबसे पहले काट डालता है, वह अपने गुरु होने की योग्यता देता है। अब यह बड़ा उलटा है। लेकिन ऐसा है। ऐसा है। ऐसा है कि इस कमरे में जो आदमी अपनी श्रेष्ठता की बार-बार खबर देता है, जानना कि उसका चित्त हीन है। स्वभावतः नहीं तो वह खबर नहीं देगा। और जो आदमी एक कोने में चुपचाप बैठ जाता है, कि पता ही नहीं चलता कि वह है भी या नहीं है, जानना कि श्रेष्ठता इतनी सुनिश्चित है कि उसकी घोषणा व्यर्थ है। यह जो सारी कठिनाई है जीवन की वह यह है कि यहां उलटा हो जाता है रोज।

इसलिए जो आदमी कहेगा, मैं गुरु हूं, जानना कि वह गुरु होने के योग्य नहीं। और जो आदमी कहे, गुरु-वुरु सब व्यर्थ है! कौन गुरु, क्या जरूरत! तो जानना कि इस आदमी से कुछ मिल सकता है। क्योंकि गुरुता ही इतनी गहरी है कि वह घोषणा व्यर्थ है।

मगर यह नहीं समझ में आता। और तब रोज कठिनाई होती चली जाती है, तब फिर रोज अड़चन बढ़ती चली जाती है। तब हम दोहरी भूल में पड़ते हैं। जो आदमी कहता है, मैं गुरु हूं, उसे गुरु मान लेते हैं; और जो आदमी कहता है, मैं गुरु नहीं हूं, उसे हम गुरु नहीं मान लेते हैं। तब ये दोहरी दिक्कतें हो जाती हैं। तब जो कहता है, मैं गुरु हूं, उससे हम सीखने जाते हैं; जो कहता है, मैं गुरु नहीं, तो हम कहते हैं, ठीक है। वह खुद ही कह रहा है कि मैं गुरु नहीं हूं, तो बात खतम हो गई। अब सीखने को भी क्या है! ये दोहरी भूलें निरंतर होती हैं। और दोनों ही भूलें हैं। दोनों ही भूलें हैं। जिसने पा लिया है वह मार्गदर्शक हो सकता है। लेकिन जिसने परमात्मा को पा लिया है, वह तुम्हारा मार्गदर्शक होने में भी कुछ रस लेगा, इसकी भ्रांति में मत पड़ना। उसको क्या रस हो सकता है! यानी परमात्मा को पाकर अब चार शिष्य पाने में कोई रस हो सकता है, तो फिर परमात्मा जरा कमजोर ही पाया होगा। लेकिन जिसको चार शिष्य पाने में रस है, और चार के चालीस हों तो रस है, तो जानना कि अभी और कुछ बड़ी बात नहीं मिल गई है।

इसलिए यह एक बहुत बड़ा विरोधी वक्तव्य है। बुद्ध जैसा व्यक्ति, जो गुरु होने के योग्य है, निरंतर कहता रहेगा कि कैसा गुरु! निरंतर कहता रहेगा कि गुरु से बचना! क्यों कह रहा है? क्योंकि चौराहों पर लोग खड़े हैं जो गुरु होने को बहुत उत्सुक हैं। और हम भी शिष्य बनने को बहुत उत्सुक हैं। शिष्य बनने को, चलने को नहीं। मार्गदर्शन लेने को, मार्गदर्शन मानने को नहीं।

तो झूठे गुरु भी उपलब्ध हैं, झूठा शिष्य भी उपलब्ध है। और उनके बीच संबंध भी बनते हैं। सच्चा गुरु न तो गुरु होता और सच्चा शिष्य न तो शिष्य होता। तो यह सवाल ही नहीं उठता, यह सवाल नहीं है। ये बेमानी और इररेलेवेंट बातें हैं। इनका कोई प्रयोजन नहीं है। ऐसा खयाल में आ जाए तो...


ओशो: जो घर बारे आपना, #8

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