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About Meditation? आप जो ध्यान सिखाते हैं, वह पतंजलि के राजयोग से किस प्रकार भिन्न है? -

आप जो ध्यान सिखाते हैं, वह पतंजलि के राजयोग से किस प्रकार भिन्न है? -

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जैसे मैं पतंजलि से भिन्न हूं, ऐसे ही। जिस ध्यान की मैं बात कर रहा हूं, कहना चाहिए, वह मेरा ही है। लेकिन मेरे का ‘मैं’ से कोई लेना-देना नहीं है। मेरा सिर्फ इस अर्थ में कि मैं किसी दूसरे को प्रमाण बना कर कुछ भी कहूं, तो वह भरोसे की बात नहीं। मेरा इसी अर्थ में कि जो भी मैं कह रहा हूं वह अनुभव है, विचार नहीं है। जो भी मैं कह रहा हूं वह किसी शास्त्र से संगृहीत नहीं है, स्वयं से जाना हुआ है।

मेरी दृष्टि शास्त्रीय नहीं है। और मैं समझ ही नहीं पाता कि कोई व्यक्ति शास्त्रीय होकर और ध्यानी कैसे हो सकेगा! शास्त्रीय होकर ध्यानी होना कठिन है। असल में ध्यान बड़ी ही अशास्त्रीय यात्रा है। वह स्कॉलरशिप नहीं है, वह पांडित्य नहीं है। पतंजलि को जाना जा सकता है—उनके शास्त्र से, उनके सूत्रों से। लेकिन उस तरह जो शास्त्र और सूत्र से जानता है, वह आदमी चिंतन और विचार में पड़ेगा। वह पतंजलि को ठीक भी समझेगा, तो भी चिंतन से; गलत भी समझेगा, तो भी चिंतन से। पतंजलि के सूत्रों का प्रयोग भी करने जाएगा, तो भी यह प्रयोग शब्द-निर्भर और विचार-निर्भर प्रयोग होगा।

और ध्यान में एक मौलिक कठिनाई है। और वह कठिनाई यह है कि जब भी कोई आदमी विचार करके ध्यान करने जाता है, तो उस विचार के बीज उसके ध्यान में रह जाते हैं। और जब वह ध्यान में उतरता है, तो वे जो विचार के बीज उसने पकड़े हैं, वे प्रोजेक्ट होने लगते हैं। उसने जो सोचा है, उसका मन उसको वही करवा देता है। उसने जो माना है, जो मान कर वह खोज पर निकल गया, उसका मन उसी को प्रोजेक्ट कर देता है। वह कहता है: यह देखो, यह काली खड़ी है! ये कृष्ण खड़े हैं! ये क्राइस्ट खड़े हैं! यह देखो, चक्र जगे! यह देखो, कुंडलिनी उठी! जो वह मान कर चल पड़ा है, उसका मन उसे उन सबका दर्शन करा देगा। यह दर्शन बिलकुल झूठा होगा। इसका यह मतलब नहीं कि कुंडलिनी नहीं है। यह जो अनुभव में कुंडलिनी आई, यह झूठी होगी। यह इसके मन की ही भ्रमणा है, यह मन का ही खेल है।

एक और कुंडलिनी भी है, जो मान कर नहीं जागती है। जो सब शब्दों को, सब ज्ञान को, सब शास्त्रों को, सब विचार-बीजों को छोड़ कर, सिर्फ शून्य होने से उठती है। उसका वर्णन किसी शास्त्र में नहीं है। हो भी नहीं सकता। क्योंकि वह प्रत्येक व्यक्ति में अलग ही ढंग से उठती है। इसलिए अगर शास्त्र से आपकी कुंडलिनी बिलकुल मेल खा रही हो, तब तो पक्का ही समझ लेना कि वह झूठी है। क्योंकि आप पतंजलि नहीं हैं। तो पतंजलि को जैसा अनुभव हुआ वैसा आपको हो नहीं सकता। यानी ध्यान की अनुभूति में शास्त्र से बिलकुल मेल खा जाना बड़ी खतरनाक लक्षणा है, यह हो नहीं सकता। अगर अनुभव से आप गुजरें, तो आपको पच्चीस जगह ऐसा लगेगा मेल भी खाता है, पच्चीस जगह ऐसा भी लगेगा मेल नहीं भी खाता है। तब समझना कि जो आपके भीतर जगा है, वह आपका ही जगा है, मन का खेल नहीं है।


ओशो: जो घर बारे आपना, #8

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