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About Meditation? क्रोध का सृजनात्मक उपयोग कैसे करें ।

क्रोध का सृजनात्मक उपयोग कैसे करें ।

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क्रोध तो केवल एक उदाहरण के लिए लिया था—सारे भावावेग शक्तियां हैं। और अगर उन शक्तियों का कोई सृजनात्मक उपयोग न हो, तो वे शरीर के किसी अंग को, चित्त की किसी स्थिति को विकृत करके अपनी शक्ति को व्यय कर लेते हैं। शक्ति का व्यय होना जरूरी है। जो शक्ति बिना व्यय की हुई भीतर रह जाएगी, वह ग्रंथि बन जाएगी। ग्रंथि का मतलब, वह गांठ बन जाएगी, वह बीमारी बन जाएगी।

समझें। क्रोध की ही बात नहीं है। अगर मेरे भीतर प्रेम देना हो और मैं प्रेम न दे पाऊं किसी को, तो प्रेम गांठ बन जाएगा। अगर मेरे भीतर क्रोध हो और मैं क्रोध न कर पाऊं, तो क्रोध गांठ बन जाएगा। अगर मेरे भीतर भय पैदा हो और मैं भय प्रकट न कर पाऊं, तो भय गांठ बन जाएगा। सारे भावावेश भीतर एक शक्ति को उत्पन्न करते हैं। उस शक्ति का निष्कासन चाहिए।

निष्कासन दो तरह से हो सकता है। एक निगेटिव रास्ता है, एक नकारात्मक रास्ता है। जैसे एक आदमी को क्रोध आया, नकारात्मक रास्ता यह है कि वह गया और उसने पत्थर चलाए, लकड़ी मारी, गालियां बकीं। यह नकारात्मक इसलिए है कि इसकी शक्ति तो व्यय हुई, लेकिन फल इसे कुछ भी नहीं मिला। फल यह मिलेगा कि जिसको यह गाली देगा, वह दुगुनी वजन की गाली इसको लौटाएगा। जिसको यह पत्थर मारेगा, उसके भीतर भी क्रोध पैदा होगा। और वह भी सामान्य आदमी है, उसका भी नकारात्मक ढंग होगा क्रोध को प्रकट करने का। वह भी लकड़ी उठाएगा। अगर आपने किसी को पत्थर मारा है, तो वह बड़ा पत्थर आपको मारेगा।

क्रोध का नकारात्मक उपयोग और क्रोध को पैदा करेगा। शक्ति व्यय होगी। फिर से क्रोध पैदा होगा और नकारात्मक आदत फिर क्रोध करवाएगी। फिर शक्ति व्यय होगी, फिर विपरीत उत्तर में फिर क्रोध पैदा होगा। क्रोध की श़ृंखला अनंत होगी, उसमें केवल शक्ति ही व्यय होती जाएगी, परिणाम कुछ भी नहीं होगा।

क्रोध की श़ृंखला को तभी आप तोड़ सकते हैं, जब आप क्रोध का कोई सक्रिय उपयोग कर लें, कोई सृजनात्मक उपयोग कर लें। इसलिए महावीर ने कहा है, जो घृणा करता है, वह घृणा उत्तर में पाता है। जो क्रोध करता है, वह क्रोध को पैदा करता है। जो वैर करता है, वह वैर को जन्म देता है। और इस श़ृंखला का कोई अंत नहीं है। और इसमें केवल शक्ति ही व्यय हो सकती है। परिणाम क्या हो सकता है? समझ लें, मैं क्रोध करूं, आप उत्तर में मुझे क्रोध दें, मैं फिर पुनः क्रोध करूं, आप फिर उत्तर में मुझे क्रोध दें—परिणाम क्या होगा? हर क्रोध मुझे क्षीण करेगा और मेरी शक्ति को व्यय कर जाएगा। इस वजह से सभ्यता ने नियम बनाया है कि क्रोध मत करो। इस वजह से सभ्यता ने नियम बनाया कि किसी पर क्रोध जाहिर मत करो।

यह नियम तो अच्छा है। इससे क्रोध जाहिर तो नहीं होगा, श़ृंखला तो नहीं बनेगी, लेकिन वह शक्ति, मेरे भीतर वह शक्ति का वेग घूमेगा। वह कहां जाएगा? वह कहां जाएगा?
पशुओं की आंख आपने देखी है! खूंखार से खूंखार पशु की आंख आपसे ज्यादा निर्मल होती है। एक हिंसक पशु की आंख भी मनुष्य की आंख से ज्यादा निर्मल होती है। क्या बात है? वहां दमित वेग कुछ भी नहीं है। क्रोध आता है, तो उसे प्रकट करता है। चिल्लाता है, आवाज करता है, हमला करता है, निकाल देता है। वह सभ्य नहीं है। उसको जो होता है, निकाल देता है।
बच्चों की आंखों में जो निर्मलता होती है, उसका क्या कारण है? उनको जो होता है, उसे वे निकाल देते हैं। उनकी कोई ग्रंथियां पैदा नहीं होतीं। अगर उन्हें क्रोध आता है, तो क्रोध निकाल देते हैं। अगर ईर्ष्या होती है, तो ईर्ष्या निकाल देते हैं। अगर किसी बच्चे का खिलौना छीनना है, तो उसको छीन लेते हैं। दमन नहीं है बच्चे के जीवन में, इसलिए सरलता मालूम होती है। और आपके जीवन में दमन है, इसलिए जटिलता शुरू हो जाती है।

ग्रंथि का अर्थ है, कांप्लेक्सिटी। कुछ भीतर होता है, कुछ आप बाहर दिखाते हैं। वह जो शक्ति नहीं निकल पाती है, वह कहां जाएगी? वह ग्रंथि बन जाती है। ग्रंथि का मेरा मतलब है, वह गांठ की तरह आपके चित्त में या आपके शरीर में अवरुद्ध हो जाती है। जैसे नदी में कोई पानी का हिस्सा बर्फ के टुकड़े बनकर बहने लगे, तो जितने बड़े-बड़े टुकड़े होते जाएंगे, नदी की धार उतनी कुंठित होती जाएगी। अगर सब बर्फ हो जाए, तो नदी जमकर वहीं समाप्त हो जाएगी।

तो हम उन नदियों की तरह हैं, जिनके भीतर बड़े-बड़े बर्फ के टुकड़े बह रहे हैं। उनको पिघलाना जरूरी है। वह ग्रंथियों से मेरा मतलब है कि वे जो बर्फ के बड़े-बड़े टुकड़े हमारे जीवन में बह रहे हैं। हमारे घृणा के, हमारे क्रोध के, हमारे सेक्स के जो दमित वेग थे, उन्होंने हमारे भीतर बर्फ के बड़े-बड़े टुकड़े पैदा कर दिए हैं। अब वे हमारी धार को बहने नहीं देते हैं। कुछ की तो धारें ऐसी हैं कि सब बर्फ ही बर्फ हो गया है, वहां कोई धार ही नहीं है।

उसको पिघलाने की जरूरत है। और उसको पिघलाने के लिए मैंने कहा, सृजनात्मक उपयोग करना चाहिए। और सृजनात्मक उपयोग के लिए मैंने दो रास्ते बताए, एक तो पिछले वेग को कैसे विसर्जित करें और नए वेग का कैसे सृजनात्मक उपयोग करें। अब ये देखिए आप, छोटे बच्चे हैं, उनमें बड़ा वेग होता है, बड़ी शक्ति होती है। अगर उनको आप घर में छोड़ते हैं, तो वे इस चीज को उठाते हैं, उसको पटकते हैं; यह चीज तोड़ते हैं, वह चीज फोड़ते हैं। आप उनको कहते हैं, यह मत करो, यह मत करो। आप उनसे यह तो कहते हैं कि यह मत करो, लेकिन आप यह कभी नहीं कहते कि फिर क्या करो। और आपको यह पता नहीं है कि जब एक बच्चा एक गिलास को उठाकर पटक रहा है, तो क्यों पटक रहा है! उसके भीतर शक्ति है और शक्ति निकास मांगती है। अब कुछ नहीं मिलता, तो एक गिलास को पटक रहा है। उस गिलास को पटकने से उसकी शक्ति निकसित होती है, निकलती है।

लेकिन आपने कहा, ‘गिलास मत तोड़ देना।’ और वह गिलास तोड़ने से रुक गया। वह बाहर गया, उसने फूल तोड़ना चाहा। आपने कहा, ‘देखो, फूल मत छू देना।’ वह फूल भी नहीं छू पाया। वह अंदर गया, उसने किताब उठायी। आप बोले, ‘देखो, किताब खराब मत कर देना।’ तो आपने उसे यह तो बताया कि क्या मत करना, आपने यह उसे नहीं बताया कि अब क्या करो। यह बच्चे में ग्रंथियां शुरू हो गयीं, कांप्लेक्सेस पैदा होने शुरू हो गए। अब इसमें गांठें पड़ती चली जाएंगी। यह एक दिन गांठ ही गांठ रह जाएगा। इसके भीतर यह न करो, वह न करो, यह सब रहेगा। क्या करो, इसे कुछ समझ में नहीं आएगा। मेरा कहना यह है सृजनात्मक उपयोग का कि इसे यह बताओ कि क्या करो। अगर यह गिलास उठाकर पटक रहा है, तो इसका मतलब है कि इसके पास शक्ति है और कुछ करना चाहता है। आपने कह दिया, यह मत करो। इससे बेहतर था, आप इसे मिट्टी देते और कहते, एक गिलास बनाओ। इसी गिलास की तरह एक गिलास बनाओ। तो यह सृजनात्मक उपयोग होता। मेरी आप बात समझे? यह फूल तोड़ने गया था। इसे आप कागज पकड़ा देते और कहते कि इसी तरह का फूल बनाओ, तो यह सृजनात्मक उपयोग होता। यह किताब फाड़ रहा था या किताब उठाया था, इसे आपको कुछ देना चाहिए था कि उस शक्ति का उपयोग करता।

अभी शिक्षा बिलकुल ही असृजनात्मक है, क्रिएटिव नहीं है, इसलिए बच्चों का जीवन बचपन से खराब हो जाता है। और हम सब बिगड़े हुए बच्चे हैं। हम सब बिगड़े हुए बच्चे हैं। हम बड़े हो गए हैं, बस इतनी भूल है। बाकी हम बिगड़े हुए बच्चे हैं, जिनका बचपन से सब बिगड़ा हुआ है। और फिर हम जीवनभर वही बिगड़ा हुआ सब करते चले जाते हैं। तो मैंने जो कहा, क्रिएटिविटी, सृजनात्मकता, उससे मेरा मतलब यह है कि जब भी शक्ति का उदय हो, उसका कोई सृजनात्मक उपयोग करिए, जिससे कुछ बन जाए, कुछ निर्मित हो जाए। कुछ विनष्ट न हो।

अब एक आदमी जो निरंतर निंदा करता है किसी की, हो सकता था, वह कोई गीत लिखता। और आप जानते हैं, जो गीत नहीं लिख पाते, कविता नहीं लिख पाते, वे आलोचक हो जाते हैं। वह वही शक्ति है। वे जो क्रिटिक्स हैं, वे जो आलोचक हैं; वह वही शक्ति है, जो गीत लिख सकती थी, कविता बना सकती थी। लेकिन उन्होंने उसका सृजनात्मक उपयोग नहीं किया। वे केवल यह कर रहे हैं कि वे दूसरों की आलोचना कर रहे हैं कि कौन गलत लिख रहा है, कौन क्या कर रहा है!

यह विनाशात्मक उपयोग है। दुनिया बहुत बेहतर दुनिया हो जाए, अगर हम अपनी शक्तियों का सृजनात्मक उपयोग करें, और हर शक्ति का। और शक्ति बुरी और भली नहीं होती, स्मरण रखिए। क्रोध की शक्ति भी बुरी और भली नहीं है। उसके उपयोग की बात है। आप यह मत सोचिए कि क्रोध की शक्ति बुरी है। शक्ति कोई बुरी-भली नहीं होती। अब एटामिक एनर्जी है; न बुरी है, न भली है। उससे विनाश हो सकता है सारे जगत का, उससे सारे जगत का निर्माण हो सकता है। सब शक्तियां न्यूट्रल होती हैं। कोई शक्ति बुरी और भली नहीं होती। विनाशात्मक उपयोग हो, तो बुरी हो जाती है; और सृजनात्मक उपयोग हो, तो भली हो जाती है।

अपने क्रोध को, अपने काम को, अपने सेक्स को, अपनी घृणा को, सबको बदलिए और सृजनात्मक उपयोग करिए। जैसे कोई खाद को लाता है, तो उसमें गंध और बास उठती है, दुर्गंध उठती है। उस खाद को माली बगीचे में डालता है, पानी सींचता है और बीज डालता है। फिर उन बीजों से होकर वही खाद पौधा बन जाती है। और उन पौधों की नसों में से पार होकर वही खाद की गंदगी फूलों की सुगंध बन जाती है। वही गंदगी, वही खाद, जो दुर्गंध फेंकती थी, फूल में आकर सुगंध फेंकती है। यह ट्रांसफार्मेशन आफ एनर्जी है। यह शक्ति का उदात्तीकरण है।

जो-जो आपमें दुर्गंध दे रहा है, वही-वही आपमें सुगंध देने का कारण बन सकता है—वही। क्योंकि जो दुर्गंध देता है, केवल वही सुगंध दे सकता है। इसलिए कभी बुरा मत मानिए कि आप क्रोधी हैं। यह शक्ति है और आपका सौभाग्य है। और कभी बुरा मत मानिए कि आप सेक्सुअल हैं कि आप कामुक हैं। यह शक्ति है और आपका सौभाग्य है। दुर्भाग्य यह होता कि आप सेक्सुअल न होते। दुर्भाग्य यह होता कि आपमें क्रोध ही न होता, तो आप इम्पोटेंट होते; तो आप पुंसत्वहीन होते, तो आप किसी मतलब के न होते। क्योंकि आपमें कोई शक्ति न होती, जिससे कुछ किया जा सके। तो शक्ति के लिए सौभाग्य मानिए। और आपके भीतर जो भी शक्तियां हों, सबका धन्यवाद मानिए, क्योंकि वे शक्तियां हैं। अब यह आपके हाथ में है कि आप उनका क्या उपयोग करते हैं!

दुनिया के जितने महापुरुष हुए हैं, सब एक्सट्रीम सेक्सुअलिस्ट थे। जितने दुनिया के महापुरुष हुए हैं, सब अति कामुक थे। यह असंभव है, अगर न रहे हों। अगर अति कामुक न होते, महापुरुष नहीं हो सकते थे।

गांधी जी को आप जानते हैं, अति कामुक थे। और जिस दिन उनके पिता की मृत्यु हुई, डाक्टरों ने कह दिया कि पिता मरने को हैं, वे उस रात भी अपने पिता के पास नहीं बैठ सके। जब उनके पिता मरे, तो वे अपनी पत्नी के पास सोए हुए थे। और डाक्टर कहे कि पिता मरने को हैं और उस रात भी वे पिता के पास नहीं बैठ सके। वे मरने को थे रात में, यह जाहिर ही था। गांधी जी को बहुत धक्का लगा इस बात से कि मैं कैसा आदमी हूं! मैं आदमी कैसा हूं!

लेकिन धन्यभाग था उनका कि वे इतने कामुक थे। वही कामुकता उनका ब्रह्मचर्य बन गयी—वही कामुकता। अगर वे उस रात पिता के पास बैठे रहते, तो पक्का मानिए, गांधी पैदा नहीं होता दुनिया में। हममें से अधिक बैठे ही रहते। रात क्या, दो रात बैठे रहते, पर गांधी पैदा नहीं होता। वह जो उस दिन दुर्गंध मालूम हुई होगी उनके चित्त को, वही बाद में उनके जीवन की सारी सुगंध बन गयी।

तो किसी शक्ति का अनादर मत करिए। अपने भीतर उठी किसी भी शक्ति का अनादर मत करिए। सौभाग्य मानिए और उसको परिवर्तित करने में लगिए। हर शक्ति बदल जाती है और हर शक्ति समपरिवर्तित हो जाती है। और जो आपमें बुरा दिखता है, वही सुगंध में और फूलों में परिणत हो जाता है।


ओशो: ध्यान सूत्र, #3

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