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About Meditation? समय दुख के कारण प्रतीत होता है

समय दुख के कारण प्रतीत होता है

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समय दुख के कारण प्रतीत होता है

ओशो

यह समझने जैसा है कि समय जो है वह हमारे दुख से जुड़ा है। आनंद में समय नहीं होता। आप जितने दुख में हैं, समय उतना बड़ा होता है। रात घर में कोई खाट पर पड़ा है मरने के लिए, तो रात बहुत लंबी हो जाती है। घड़ी में तो उतनी ही होगी, कैलेंडर में उतनी ही होगी, लेकिन वह जो खाट के पास बैठा है, जिसका प्रियजन मर रहा है, उसके लिए रात इतनी लंबी, इतनी लंबी हो जाती है कि लगता है कि चुकेगी कि नहीं चुकेगी? यह रात खत्म होगी कि नहीं होगी? सूरज उगेगा कि नहीं उगेगा? यह रात कितनी लंबी होती चली जाती है! और घड़ी उतना ही कहती है। और तब देखनेवाले को लगेगा कि घड़ी आज धीरे चलती है या रुक गई है! कैलेंडर की पंखुड़ी उखड़ने के करीब आ गई है, सुबह होने लगी है, लेकिन ऐसा लगता है कि लंबा, लंबा...।

बटर्‌रेंड रसेल ने कहीं लिखा है कि मैंने अपनी जिंदगी में जितने पाप किए, अगर सख्त से सख्त न्यायाधीश के सामने भी मुझे मौजूद कर दिया जाए, तो मैंने जो पाप किए वे, और जो मैं करना चाहता था और नहीं कर पाया, वे भी अगर जोड़ लिए जाएं, तो भी मुझे चार-पांच साल से ज्यादा की सजा नहीं हो सकती। लेकिन जीसस कहते हैं कि नरक में अनंत काल तक सजा भोगनी पड़ेगी। तो यह न्याययुक्त नहीं है। क्योंकि, मैंने जो पाप किए, जो नहीं किए वे भी जोड़ लें, क्योंकि मैंने सोचे, तो भी सख्त से सख्त अदालत मुझे चार-पांच साल की सजा दे सकती है, और यह जीसस की अदालत कहती है कि अनंत काल तक, इटरनिटी तक नरक में सड़ना पड़ेगा। यह जरा ज्यादती मालूम पड़ती है।

रसेल तो मर गए, अन्यथा उनसे कहना चाहता था कि आप समझे नहीं, जीसस का मतलब खयाल में नहीं आया आपके। जीसस यह कह रहे हैं कि नरक में अगर एक क्षण भी रहना पड़ा तो वह इटरनिटी मालूम पड़ेगा; दुख इतना ज्यादा है वहां कि उसका अंत ही नहीं मालूम पड़ेगा कि वह कभी समाप्त होगा, कभी समाप्त होगा।

दुख समय को लंबाता है, सुख समय को छोटा करता है। इसलिए तो हम कहते हैं: सुख क्षणिक है। जरूरी नहीं है कि सुख क्षणिक है, सुख की प्रतीति क्षणिक होती है—कि वह आया और गया; क्योंकि टाइम छोटा हो जाता है। सुख क्षणिक है, ऐसा नहीं है, कि मोमेंटरी है। सुख की भी लंबाइयां हैं। लेकिन सुख सदा क्षणिक मालूम पड़ता है, क्योंकि सुख में समय छोटा हो जाता है। प्रियजन मिला नहीं कि विदाई का वक्त आ गया; आए नहीं कि गए; इधर फूल खिला नहीं कि कुम्हलाया। वह सुख की प्रतीति क्षणिक है, क्योंकि सुख में समय छोटा हो जाता है। घड़ी फिर भी वैसे ही चलती है, कैलेंडर वही खबर देता है, लेकिन इधर हमारे मन में सुख समय को छोटा कर देता है।

आनंद में समय मिट ही जाता है, छोटा-मोटा नहीं होता। आनंद में समय होता ही नहीं। जब आप आनंद में होंगे तब आपके पास समय नहीं होगा। असल में, समय और दुख एक ही चीज के दो नाम हैं। टाइम जो है वह दुख का ही नाम है; समय जो है वह दुख का ही नाम है। मानसिक अर्थों में समय ही दुख है। और इसीलिए हम कहते हैं—आनंद समयातीत, कालातीत, बियांड टाइम, समय के बाहर है। तो जो समय के बाहर है, उसे समय के द्वारा नहीं पाया जा सकता।

जिन खोजा तिन पाइया / 2

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