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OSHO Times Body Dharma शरीर पर आधारित ध्यान

शरीर पर आधारित ध्यान

अध्यात्म कभी तनावपूर्ण नहीं होता,   अध्यात्म कभी भी तनावपूर्ण नहीं होता, ऐसा नहीं हो सकता। आध्यात्मिक तनाव होता ही नहीं, तनाव केवल शारीरिक होता है और मानसिक होता है।

शारीरिक तनाव उन्होंने पैदा किए हैं, जिन्होंने धर्म के नाम पर सदैव ही शरीर-विरोधी उपदेश दिए हैं। पश्चिम में ईसाइयत स्पष्ट तौर पर शरीर के प्रति प्रबल विरोधी रही है। इन्होंने तुम्हारे और तुम्हारे शरीर के बीच एक झूठा अंतर और दरार पैदा की है, फिर तुम्हारा पूरा रवैया ही तनाव पैदा करनेवाला बनता है। तुम तनाव रहित होकर भोजन नहीं कर सकते,  निश्चिन्तता से सो नही सकते, शरीर का प्रत्येक कृत्य तनाव बन जाता है। शरीर शत्रु है, पर तुम इसके बिना जी नही सकते। तुम्हें इसके साथ ही रहना है, तुम्हें अपने शत्रु के साथ ही रहना है, इसलिए निरंतर तनाव है; तुम कभी रिलैक्स नहीं हो सकते।

शरीर तुम्हारा शत्रु नही है, न ही वह किसी तरह तुम्हारा विरोधी है, यह तुम्हारे प्रति उपेक्षा से भी भरा नहीं है। शरीर के होने में ही आनंद है। और जिस क्षण तुम शरीर को एक उपहार की तरह समझते हो--परमात्मा का उपहार, तब तुम शरीर में वापस लौटकर आ जाते हो। तब तुम इससे प्रेम करने लगोगे, तुम उसे महसूस करोगे--और उसे महसूस  करने का ढंग बड़ा ही सूक्ष्म होता है।
 
तुम तब तक किसी अन्य के शरीर को अनुभव नही कर सकते, जब तक तुमने अपने स्वयं के शरीर का अनुभव नही किया।  तुम किसी अन्य के शरीर को प्रेम भी नही कर सकते, जब तक तुमने अपने शरीर को ही प्रेम नही किया, यह असंभव है। तुम तब तक किसी अन्य के शरीर का ध्यान नही रख सकते, जब तक तुमने अपने शरीर का ध्यान नहीं रखा--और कोई भी ध्यान नहींरखता। तुम कह सकते हो कि तुम रखते हो, पर मैं दृढ़तापूर्वक कहता हूं ; कोई भी ध्यान नही रखता। अगर तुम ध्यान रखते हुए दिखते भी हो, तब भी तुम वास्तव में ध्यान नही रखते। तुम किसी अन्य कारण से ध्यान रखते हो--दूसरों की राय के कारण, किसी अन्य की आंखों में तुम अच्छे दिख सको इसलिए। तुम अपने शरीर का ध्यान स्वयं के लिए नहीं रखते। तुम अपने शरीर को प्रेम नही करते, यदि तुम इससे प्रेम नही कर सकते, तुम इसमें हो भी नही सकते।

अपने शरीर को प्रेम करो और तब तुम ऐसा विश्रांत अनुभव करोगे जैसा तुमने पहले नहीं किया होगा। प्रेम विश्रांतदायी है। जहां प्रेम है, वहां विश्रांति है। अगर तुम किसी अन्य को प्रेम करते हो--अगर तुम्हारे और उसके बीच प्रेम है, तो प्रेम अपने साथ विश्रांति का संगीत लाता है। तब गहन विश्रांति है।
 
यही घटना  घटती है यदि तुम अपने शरीर से प्रेम करते हो, तब तुम विश्रांत रह सकते हो, तुम शरीर का ध्यान रखते हो। यह गलत नहीं है, अपने शरीर से प्रेम करना कोई आत्म-मुग्धता नहीं है, सच तो यह है कि यह अध्यात्म की ओर पहला कदम है।

इसीलिए सकि'य ध्यान शरीर से प्रारंभ होता है, तेज श्वास लेने से मस्तिष्क विस्तार पाता है, चेतना फैलती है, पूरा शरीर एक थिरकता हुआ, कंपता हुआ अस्तित्व होता है। अब कूदना आसान होगा। अब तुम कूद सकते हो; तब विचारों का अवरोध कम होने लगेगा। तब तुम पुनः बच्चे बन जाते हो, नाचते-कूदते, कंपायमान, जीवंत। कंडिशनिंग, विचारों की कंडिशनिंग नहीं बचती।

तुम्हारा शरीर तुम्हारे मन जितना कंडिशंड नहीं होता। इसे याद रखो, तुम्हारा मन संस्कारों से बंधा है, पर तुम्हारा शरीर अभी भी प्रकृति का ही हिस्सा है। सभी धर्म और धार्मिक लोग-- जो मूलतः मस्तिष्क पर ही आधारित रहे हैं--शरीर के विरोधी हैं, क्योंकि शरीर के साथ, इंद्रियों के साथ मन और उसके संस्कार खो जाते हैं।

श्वास लेने के साथ ही तुम्हें यह अनुभव होगा कि जैसे तुम्हारा सारा शरीर, उसका प्रत्येक कोना; जैसे पूरे शरीर में बाढ आ गई है। तुम उसके साथ एक हो जाते हो। अब तुम छलांग लगा सकते हो।
 
जो छलांग सेक्स में ली जाती है वह छोटी छलांग है, और वह छलांग जो ध्यान में ली जाती है, बहुत महान छलांग है। सेक्स के दौरान तुम किसी अन्य में छलांग लगाते हो, उस छलांग से पहले तुम्हें अपने शरीर के साथ एक होना होगा और उस छलांग में तुम्हें और विस्तार करना होगा--किसी अन्य के शरीर तक। तुम्हारी चेतना  तुम्हारे शरीर के पार फैलती है। ध्यान में तुम्हारी छलांग अपने शरीर से संपूर्ण ब्रह्मांड के शरीर तक की होती है; तब तुम उसके ही अंग हो जाते हो।   
 
सक्रिय ध्यान का द्वितीय चरण रेचन है। तब तुम न केवल अपने शरीर के साथ एक हो जाते हो, बल्कि शरीर ने अब तक अपने साथ जो तनाव इकट्ठा कर रखा है, उसे बाहर फेंक दिया जाता है। शरीर को बहुत हलका और निर्भार होना है, क्रियाओं को बहुत तेज और जोशपूर्ण होना है, जितना तेज हो सके उतना । फिर दरवेश और सूफी नृत्य में जो संभव है, वह हो सकता है। जब तुम्हारी क्रियाएं तेज और त्वरा से भरपूर होंगी, तब एक क्षण ऐसा आएगा जब तुम अपने स्वयं पर सारा नियंत्रण खो देते हो। और वह क्षण आवश्यक है। तुम्हें अपना नियंत्रण करना भी नही चाहिए, क्योंकि तुम्हारा नियंत्रण ही बाधा है, तुम ही बाधा हो। तुम्हारे मन का स्वभाव ही नियंत्रण है, वह ही बाधा है।
 
क्रियाएं करते रहो। यद्यपि तुम्हें प्रारंभ करना  ही होगा, पर ऐसा पल आएगा जब तुम आविष्ट हो जाओगे; तुम अनुभव करोगे कि तुम्हारा नियंत्रण खो गया है। तुम किनारे पर खड़े हो, अब तुम छलांग लगा सकते हो। तब तुम फिर से बच्चे की भांति हो गए, तुम वापस आ गए। सारी कंडिशनिंग फेंक दी गई। अब तुम किसी भी बात की चिंता नही करते, तुम इस बात की भी चिंता नही करते कि दूसरे क्या सोचेंगे। अब हर वह चीज जो समाज ने तुम पर थोप रखी थी, फेंक दी गई। अब तुम ब्रह्मांड में नृत्य करते हुए एक कण हो जाते हो।
 
सक्रिय ध्यान के द्वितीय चरण में तुम  जब सब कुछ फेंक देते हो केवल तब ही तीसरा चरण संभव हो सकता है। तुम्हारी पहचान खो जाएगी, तुम्हारी प्रतिमा टूटेगी, क्योंकि जो कुछ भी तुम अपने बारे में जानते हो वह तुम्हारा अपना नहीं है, वह केवल थोपा गया है। तुम्हें यह बताया गया है कि तुम ऐसे हो या वैसे हो और तुमने इससे अपना तादात्म्य बना लिया है। पर इस तरह तेज क्रिया और वैश्विक नृत्य करने से, सभी प्रकार के तादात्म्य खो जाएंगे। तब तुम पहली बार ऐसे बन जाओगे, जैसे तुम तब थे, जब तुम्हारा जन्म हुआ था। और इस नये जन्म  के साथ तुम एक नये व्यक्ति बन जाओगे।
 

ओशो , मेडीटेशन दि आर्ट ऑफ एक्स्टेसी # 5