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OSHO Times Body Dharma शारीरिक बुद्धिमत्ता

शारीरिक बुद्धिमत्ता

मैं पिछले दस वर्षों से बार-बार बीमार पड़ता हूं। मेरे विचार से मैं अपने शरीर से ज्यादा तेज चल रहा हूं। मेरा अनुमान है कि मैं अपने केंद्र से हट जाता हूं और तब शरीर प्रभावित होता है।.

तुम्हारी समझ सही रास्ते पर है। सबको अपने शरीर के कार्य के बारे में समझना है। अगर तुम अपने शरीर की सहन शक्ति से ज्यादा कुछ करते हो, जल्दी ही या कुछ समय बाद तुम अस्वस्थ हो जाओगे।

एक निश्चित सीमा है जहां तक तुम शरीर को इसके खिलाफ खींच सकते हो, लेकिन यह हमेशा नहीं चल सकता। तुम बहुत ज्यादा काम कर रहे होगे। यह और लोगों को बहुत ज्यादा नहीं भी लगता होगा, लेकिन यह सवाल नहीं है। तुम्हारा शरीर उतना सहन नहीं कर सकता, इसे विश्राम चाहिए। और इसका कुल परिणाम उतना ही होगा। बजाए इसके की दो या तीन हफ्ते काम करके फिर दो तीन हफ्ते आराम करो, पूरे छ्ह हफ्ते काम करो और काम को आधा कम कर दो…साधारण गणित।
 
यह बहुत खतरनाक है क्योंकि यह शरीर में कई नाजुक चीजों को नष्ट कर सकता है, लगातार बहुत ज्यादा काम करना और फिर थकना,और बिस्तर पर पड़ जाना और इस सब के बारे में बुरा अनुभव करना। अपनी गति कम करो, धीरे चलो, और इसको सब तरह से करो। उदाहरण के लिए जिस तरह से तुम चलते हो वैसे चलना बन्द करो। धीमे चलो, धीमे स्वांस लो, धीमे बोलो। धीमे खाओ अगर तुम अक्सर बीस मिनट लेते हो तो चालीस मिनट लो। अपना स्नान धीमे करो अगर तुम अक्सर दस मिनट लेते हो तो बीस मिनट लो। सारी की सारी गतिविधियों की गति आधी तक कम कर देनी चाहिए।
 
यह केवल तुम्हारे व्यवसायिक कार्य का सवाल नहीं है। सारे चौबीस घंटों को कम करना है; गति को वापिस कम से कम पर, आधी पर लाना है। यह तुम्हारे सारे जीवन के ढांचे और आदतों का परिवर्तन होगा। धीमें बोलो, यहां तक की पढो भी धीमेपन से, क्योंकि  मन सब चीजों को एक ही तरह से करना चाहता है।

एक आदमी जो बहुत ज्यादा सक्रिय है तेजी से पढेगा, तेजी से बोलेगा, तेजी से खाएगा; यह एक सनक है। जो कुछ भी वह कर रहा है, वह तेजी से करेगा, चाहे जरूरत ना भी हो। चाहे वह सुबह घूमने गया हो, वह तेजी से जाएगा। कहीं जा नहीं रहा है…यह सिर्फ घूमना है, और तुम दो मील जाते हो या तीन इससे कोई फर्क नहीं पड़ता। लेकिन एक तेज गति से ग्रसित आदमी हमेशा तेजी में होता है। यह बस उसकी स्वचालित यांत्रिकता है, स्वचालित यांत्रिक व्यवहार। यह लगभग अन्तर्निहित हो जाता है। इसलिए इसे रोको।

आज से, प्रत्येक चीज को आधा कर दो। ताइ-ची तुम्हारे लिए बहुत अच्छा होगा। तुम इसे बहुत ज्यादा पसन्द करोगे। खड़ा होना है, धीरे से खड़े होओ; धीमे चलो, और यह तुम्हें बहुत गहरी जागरूकता भी देगा, क्योंकि जब तुम किसी चीज को बहुत धीरे से करते हो, उदाहरण के लिए, अपना हाथ बहुत धीरे से घुमाते हो, तुम इसे लेकर बहुत सतर्क हो जाते हो। इसे तेजी से घुमाओ और तुम इसे यांत्रिकता से करते हो।

अगर तुम धीमा होना चाहते हो, तुम्हें जागरूकता के साथ धीमा होना पड़ेगा; और कोई तरीका है ही नहीं। तुम अपने शरीर की सामर्थ्य से कहीं ज्यादा गति से सक्रिय थे इसलिए शरीर गिर गया, जवाब दे गया।

कुछ बुनियादी बातें समझनी हैं। मानव प्रकृति जैसी कोई चीज नहीं है। जितने मानव हैं
उतनी ही मानव प्रकृतियां हैं, इसलिए कोई कसौटी नहीं है।
 
कोई तेज धावक है, कोई धीमा चलता है। उनकी तुलना नहीं हो सकती क्योंकि वे अलग हैं; दोनों पूर्णत: अद्वितीय और विशिष्ट हैं। इसलिए इसके बारे में चिन्ता मत करो। यह तुलना करने से होता है। तुम देखते हो कि कोई बहुत ज्यादा कर रहा है और कभी बिस्तर पर नहीं जाता और तुम कुछ करते हो और बिस्तर पकड़ लेते हो, और तब तुम बुरा अनुभव करते हो और सोचते हो कि तुम्हारी सामर्थ्य उतनी नहीं है जितनी होनी चाहिए।

लेकिन वह कौन है और तुम कैसे उससे अपनी तुलना कर सकते हो? तुम तुम हो, वह वह है। अगर उसको धीमा चलने के लिये विवश किया जाए, वह बीमार पड़ सकता है। तब यह उसकी प्रकृति के विरूद्ध होगा; जो तुम कर रहे हो वह प्रकृति के विरूद्ध है। इसलिए बस अपनी प्रकृति को सुनो। हमेशा अपने शरीर की सुनो। यह फुसफुसाता है, यह कभी चिल्लाता नहीं, क्योंकि यह चिल्ला नहीं सकता। यह केवल फुसफुसाहट में तुम्हें अपना संदेश देता है। अगर तुम सतर्क हो तो तुम इसे समझ सकोगे। और शरीर की अपनी बुद्धिमत्ता है जो की मन से बहुत गहरी है। मन बिल्कुल अपरिपक्व है। शरीर सदियों से बिना मन के रहा है। मन बहुत बाद में आया है। यह अभी बहुत ज्यादा नहीं जानता। सब बुनियादी चीजें अभी भी शरीर ही अपने ही नियंत्रण में रखता है। केवल बेकार की चीजें मन को दे दी गयी हैं, सोचने के लिए; दार्शनिकता और ईश्वर के बारे में, और नर्क और राजनीति के बारे में सोचने के लिए।.   
 
इसलिए शरीर की सुनो और कभी भी तुलना मत करो। पहले कभी तुम्हारे जैसा आदमी नहीं था और ना कभी होगा। तुम पूर्णत: अद्वितीय हो…अतीत में, वर्तमान में या भविष्य में। इसलिए तुम किसी के साथ अपना मिलान नहीं कर सकते और ना ही तुम किसी की नकल कर सकते हो। इसलिए वह विचार छोड़ दो। दो सप्ताह के लिए धीमे हो जाओ। इसी क्षण से शुरू करो!

ओशो, अ रोज़ इज़ ए रोज़ इज़ # 17