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OSHO Times Body Dharma शरीर के माध्यम से केंद्रीकरण

शरीर के माध्यम से केंद्रीकरण

तुम्हारे शरीर की स्वयं की बुद्धिमत्ता होती है -- यह अपनी कोशिकाओं में सदियों की बुद्धिमत्ता संजोए हुए है।
 
तुम्हारा शरीर भूख अनुभव कर रहा है और तुम उपवास पर हो, क्योंकि तुम्हारा धर्म कहता है कि इस दिन तुम्हें उपवास करना है -- और तुम्हारा शरीर भूख अनुभव कर रहा है। तुम अपने संस्थान पर भरोसा नहीं करते, तुम एक मरे हुए शास्त्र पर भरोसा करते हो, क्योंकि किसी शास्त्र में किसी ने लिख दिया है कि इस दिन तुम्हें उपवास पर रहना है। इसलिए तुम उपवास करते हो।
 
अपने शरीर की सुनो। हां, ऐसे दिन आते हैं जब शरीर कहता है, 'उपवास पर रहो।'- तब उपवास करो। लेकिन शास्त्रों की सुनने की आवश्यकता नहीं है। जिन लोगों ने शास्त्र लिखे हैं, उन्होंने तुम्हें ध्यान में रख कर शास्त्र नहीं लिखे, बिल्कुल भी नहीं। उन्होंने तुम्हारी कल्पना भी नहीं की होगी। तुम उनके लिए मौजूद ही नहीं थे, वे तुम्हारे विषय में लिख ही नहीं रहे थे। यह ऐसा है कि तुम बीमार पड़े हो और तुम एक मरे हुए डाक्टर के घर जाते हो और उसके नुस्खे तलाशते हो, और तुम कोई नुस्खा पा जाते हो और उस नुस्खे का अनुपालन करते हो। वह नुस्खा किसी और के लिए, किसी अन्य बीमारी के लिए, किसी अन्य परिस्थिति के लिए था।
 
स्मरण रहे कि अपने संस्थान पर ही भरोसा करना है। जब तुम महसूस कर रहे हो कि शरीर कह रहा हो कि मत खाओ, तुरंत खाना बंद कर दो। जब शरीर कह रहा हो कि खाओ, तब परवाह न करो कि शास्त्र कहते हों कि उपवास करो या न करो। यदि तुम्हारा शरीर कहता हो कि दिन में तीन बार खाओ, तो यह पूरी तरह ठीक है। यदि यह कह रहा हो कि एक बार खाओ, तो यह पूरी तरह ठीक है।

यह सीखो कि शरीर की बात किस तरह सुनना है क्योंकि यह तुम्हारा शरीर है।

तुम इसमें हो; तुम्हें इसका आदर करना है, और तुम्हें इसका भरोसा करना है।
 
यह तुम्हारा मंदिर है; इस पर कुछ भी थोपना अधार्मिक कृत्य है। किसी भी दूसरे उद्देश्य से कोई भी चीज नहीं थोपनी चाहिए! और यह तुम्हें केवल शरीर पर ही भरोसा करना नहीं सिखाएगा, धीरे-धीरे यह तुम्हें अस्तित्व पर भरोसा करना भी सिखाएगा -- क्योंकि तुम्हारा शरीर अस्तित्व का हिस्सा है। तब तुम्हारा भरोसा विकसित होगा, और तुम वृक्षों पर, चांद-तारों पर, सूरज पर और समुद्रों पर भरोसा कर सकोगे: तुम लोगो पर भरोसा करोगे।

लेकिन भरोसे की शुरुआत अपने स्वयं के संस्थान पर भरोसा करने से होगी।

भरोसा तुम्हारा हृदय है।

संन्यासी वह है जो स्वयं के संस्थान पर भरोसा रखता है, और यह भरोसा उसे स्वयं की निजता से सामंजस्य बनाने में मदद करता है, और अस्तित्व की पूर्णता से सामंजस्य बनाने में मदद करता है। यह स्वयं के प्रति और दूसरों के प्रति एक सर्व स्वीकृति लाता है। 

यह एक तरह का स्थायित्व और केन्द्रीकरण लाता है। तब अधिक बल और शक्ति अनुभव होती है; क्योंकि तुम स्वयं के शरीर में केंद्रित होते हो, स्वयं के अस्तित्व में। तुम्हारी जड़ें अब जमीन में हैं।

अन्यथा तुम लोगों को उखड़े-उखड़े देखते हो, जैसे कि वृक्षों को जमीन से उखाड़ दिया गया हो। वे बस मर रहे हैं, वे जी नहीं रहे हैं। इसलिए जीवन में बहुत प्रसन्नता नहीं है। तुम हास्य की गुणवत्ता नहीं पाते हो, उत्सव खो गया है।

तुम्हारे इसी शरीर में, तुम्हारे इसी अस्तित्व में, इसी क्षण दिव्यता मौजूद है -- और तुमने इसका उत्सव नहीं मनाया। तुम उत्सव नहीं मना सकते।

उत्सव पहले तुम्हारे खुद के घर में घटित होगा, सबसे नजदीक में।

उसके बाद यह एक बड़ी तूफानी लहर बनेगी और संपूर्ण अस्तित्व पर फैल जाएगी।
 

ओशो, दि हार्ट सूत्र, प्र 10