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OSHO Times Body Dharma अपने शरीर से दोस्ती करना -

अपने शरीर से दोस्ती करना -

प्रत्येक व्यक्ति, एक प्रकार से स्किज़ोफ्रेनिया की दशा में है –– कम या अधिक; फर्क केवल मात्रा का है। प्रत्येक व्यक्ति विभक्त है, क्योंकि धार्मिक और राजनीतिक दोनों तरह के शोषक इस रणनीति पर निर्भर करते रहे हैं कि व्यक्ति को विभक्त रखो, उसे अखंड मत होने दो, और वह गुलाम बना रहेगा। खुद के खिलाफ विभाजित घर का कमजोर होना स्वाभाविक है। इस प्रकार तुम्हें शरीर के खिलाफ लड़ना सिखाया गया है; तुम्हें विभक्त रखना, विभाजन की मूल रणनीति है। 'शरीर से लड़ो, शरीर तुम्हारा दुश्मन है। यह शरीर ही है जो तुम्हें नर्क की तरफ खींच रहा है। लड़ो, हाथ में तलवार लेकर! रात-दिन लड़ो! जन्मों-जन्मों तक लड़ो! केवल तभी, एक दिन, तुम जीत सकोगे। और जब तक तुम अपने शरीर पर विजय नहीं पा लेते, तुम परमात्मा की दुनिया में प्रवेश नहीं कर सकते।

सदियों से लोगों को यह मूढ़ता सिखाई गई है। जिसका परिणाम है कि हर व्यक्ति विभाजित, बंटा हुआ है, हर व्यक्ति अपने शरीर के विरोध में है। और यदि तुम अपने शरीर के विरोध में हो, तुम मुसीबत में होने को बाध्य हो। तुम अपने शरीर से लड़ोगे, और तुम और तुम्हारा शरीर 'एक ही' उर्जा हैं। शरीर दृश्य आत्मा है, और आत्मा अदृश्य शरीर है। शरीर और आत्मा कहीं भी विभाजित नहीं हैं, वे एक-दूसरे के हिस्से हैं, वे एक पूर्ण के हिस्से हैं।

तुम्हें शरीर को स्वीकार करना है, तुम्हें शरीर को प्रेम करना है, तुम्हें शरीर का सम्मान करना है, तुम्हें तुम्हारे शरीर का आभारी होना है। केवल तभी तुम एक तरह की समग्रता को उपलब्ध हो सकते हो, तभी एक सघनता घटित होगी, अन्यथा तुम दुखी रहोगे। और शरीर से तुम्हारा छुटकारा इतनी आसानी से नहीं होने वाला; सैकड़ों जन्मों के बाद भी लड़ाई जारी रहेगी। तुम शरीर को हरा नहीं सकते।

ध्यान रखना, मैं यह नहीं कह रहा हूं कि तुम शरीर पर विजय नहीं पा सकते, लेकिन तुम शरीर को हरा नहीं सकते। तुम इसके प्रति शत्रुवत होकर इसे हरा नहीं सकते। तुम मित्रवत होकर, प्रेमपूर्ण होकर, सम्मानपूर्ण होकर, भरोसा रखकर--इसके ऊपर विजय पा सकते हो। यही मेरा दृष्टिकोण है: कि शरीर मंदिर है, और तुम मंदिर के देवता हो। मंदिर तुम्हारी रक्षा करता है; वर्षा, तूफान और धूप में तुम्हें आश्रय देता है। यह तुम्हारी सेवा में है! तुम्हें इससे लड़ना क्यों है? यह ऐसे ही मूढ़तापूर्ण है जैसे कोई चालक अपनी कार से लड़े। यदि चालक अपनी कार से लड़ता है, तो क्या होने वाला है? वह कार को नष्ट कर देगा, और इससे लड़कर वह खुद को नष्ट कर लेगा। कार एक सुंदर वाहन है,यह तुम्हें सुदूर यात्रा पर ले जा सकती है।

शरीर अस्तित्व का सबसे जटिल तंत्र है। यह एकदम अद्भुत है!-- और धन्य हैं वे जो चमत्कृत हैं। अपने स्वयं के शरीर के साथ एक विस्मय-भाव से शुरू करो, क्योंकि वह तुम्हारे सबसे करीब है। शरीर के माध्यम से-- प्रकृति तुम्हारे जितने निकटतम आती है ,परमात्मा उतना निकटतम तुम्हारे पास आया है। तुम्हारे शरीर में समुद्रों का जल है, तुम्हारे शरीर में सितारों और सूर्यों की अग्नि है, तुम्हारे शरीर में वायु है, तुम्हारा शरीर मिट्टी का बना है। तुम्हारा शरीर, पूरे अस्तित्व और इसके सभी तत्वों का प्रतिनिधित्व करता है। और क्या गजब का रूपांतरण है! क्या गजब का कायापलट है! मिट्टी को देखो और फिर अपने शरीर को देखो--क्या गजब का रूपांतरण है, और तुम इसके लिए कभी अचंभित नहीं हुए! एक धूल दिव्य हो गई; इससे बडा और रहस्य क्या संभव है? तुम इससे बड़े और किस चमत्कार की प्रतीक्षा कर रहे हो? और तुम प्रतिदिन चमत्कार घटित होते देखते हो। कीचड़ से कमल पैदा हो जाता है...और मिट्टी से उत्पन्न हो जाती है--हमारी सुंदर काया। इतना जटिल तंत्र, और इतना सुचारु रूप से चलता हुआ...कोई आवाज नहीं। और यह वास्तव में जटिल है।

वैज्ञानिकों ने अधिक जटिल मशीनों का निर्माण किया है, परन्तु शरीर की तुलना में वे कुछ भी नहीं हैं। यहां तक कि जटिल से जटिल कम्प्युटर भी, शरीर की आंतरिक संरचना की तुलना में एक खिलौने जैसा है। और तुम्हें इससे लड़ना सिखाया गया है। इससे एक विभाजन पैदा होता है, जो तुम्हें परेशान रखता है, जो तुम्हें अनवरत एक अंतर्युद्ध में संलग्न रखता है। क्योंकि तुम स्वयं से लड़ रहे हो--जो पूरी तरह मूर्खतापूर्ण है--तुम्हारा जीवन कम से कम बुद्धिमत्ता का और अधिक से अधिक मूर्खता का होता जाता है। और तब तुम आशा करते हो महान रूपांतरणों की; तुम चाहते हो कि ईर्ष्या समाप्त हो जाए और तुम चाहते हो कि क्रोध विदा हो जाए और तुम चाहते हो कि तुम्हारे भीतर लोभ न हो।

यह असंभव है! प्रारंभ से ही इस मिथ्याबोध के साथ, तुम वह स्थिति कैसे उत्पन्न कर सकते हो जहां रूपांतरण घटित होता है, जहां क्रोध करुणा हो जाती है, जहां घृणा प्रेम हो जाती है, जहां लोभ साझेदारी हो जाती है, जहां काम समाधि हो जाती है? अपनी इतनी रूग्ण स्थिति के साथ, तुम कैसे आशा कर सकते हो, तुम कैसे आकांक्षा कर सकते हो--इतने महान रूपांतरणों की।

स्वयं बनने के लिए, विभाजन गिरा देना मूलभूत बात है। एक हो जाओ, और तब सब कुछ संभव यहां तक कि असंभव भी संभव हो जता है।

रास्ता बहुत सरल और सीधा है। यहां तक कि एक बच्चा भी समझ सकता है। यह दो और दो चार जितना सरल है, या कि इससे भी ज्यादा सरल है । यह पक्षी के गीत जितना सरल है, यह गुलब के फूल जितना सरल है--सरल एवम सौंदर्यपूर्ण, साधारण एवम अतीव गरिमामय। लेकिन केवल अव्यथित मन ही इसे समझ सकता है, केवल एक अव्यथित मन की ही क्षमता इसे देख सकने की है; अन्यथा तुम लोभ में जिओगे और तुम क्रोध में जिओगे, और तुम ईर्ष्या और पजेसिवनेस में जिओगे और तुम घृणा में जिओगे। तुम ढोंग कर सकते हो, ऊपर-ऊपर तुम एक संत बन सकते हो, लेकिन गहरे में भीतर तुम एक पापी ही रहोगे। और स्वयं को विभक्त करना सबसे बड़ा पाप है।

बड़े पाप दूसरों के प्रति नहीं किए जाते हैं, यह सदैव स्वयं के प्रति किए जाते हैं। अपने शरीर और स्वयं के बीच यह विभाजन पैदा करना: यह एक आत्महत्या की दशा है। शरीर की निंदा कर तुम केवल एक पाखंडी हो सकते हो, तुम केवल एक दिखावटी जीवन जी सकते हो।

शरीर का आदर करो, मन का आदर करो, जिससे वे तुम्हारा आदर कर सकें। एक मित्रता सृजित करो। वे तुम्हारे हैं; विरोधी मत होओ। सभी पुरानी परंपराएं तुम्हें शरीर और मन के प्रति विरोधी होना सिखाती हैं; वे शत्रुता पैदा करती है, और शत्रुता के माध्यम से तुम ध्यान में अग्रसर नहीं हो सकते। तब जब तुम ध्यान कर रहे हो, मन अन्य समयों की अपेक्षा अधिक परेशान करेगा। तब ध्यान के समय शरीर, अन्य समयों की अपेक्षा अधिक बेचैन हो जाएगा। यह बदला लेगा, यह तुम्हें शांत बैठने नहीं देगा। यह तुम्हारे लिए बहुत सारी समस्याएं उत्पन्न करेगा।

यदि तुम कुछ समय के लिए शांत बैठने का प्रयत्न करो,तब तुम्हें पता चलेगा। काल्पनिक चीजें घटनी शुरू हो जाएंगी। तुम सोचोगे कि तुम्हारी टांग पर कोई चींटी चढ़ रही है, और जब तुम देखोगे तो पता चलेगा कि वहां कोई चींटी नहीं है। आश्चर्यजनक है...। जब तुम आंख बंद किए बैठे थे तब तुमने पूरी तरह महसूस किया कि चींटी वहां थी, चढ़ते हुए, आते हुए, आते हुए. आते हुए...। और जब तुम आंख खोलते हो, कोई चींटी नही है, कुछ नहीं है। यह मात्र शरीर था, तुम्हारे साथ चालाकी कर रहा था।

तुम शरीर के साथ चालाकी करते रहते हो। तुम अनेक भांति शरीर को धोखा देते रहते हो, इसलिए अब शरीर तुम्हें धोखा दे रहा है। शरीर जब सोना चाहता है, तुम उसे सिनेमा हाल में बैठने को बाध्य करते हो। शरीर कहता है,' ठीक है। जब सही अवसर आएगा, मैं देखूंगा।' इसलिए जब तुम ध्यान करने बैठते हो, शरीर तुम्हारे लिए समस्याएं पैदा करना शुरू कर देता है। एकाएक तुम महसूस करते हो कि तुम्हारी पीठ में खुजलाने की आवश्यकता है...। और तुम आश्चर्यचकित हो क्योंकि साधारणतया ऐसा कभी नहीं होता।

एक महिला मेरे लिए बैटरी-युक्त प्लास्टिक का हाथ, पीठ खुजलाने हेतु ले आई। मैंने कहा,'लेकिन तुम यह मेरे पास क्यों लाई हो?' वह बोली,' आप ध्यान में बैठते होंगे...। जब भी मैं ध्यान में बैठती हूं तब एक ही समस्या कि मेरी पीठ...मुझे बहुत अधिक महसूस होता है कि मैं इसे खुजलाऊं, और मैं उस तक पहुंच नहीं पाती। इसलिए मैंने यह हाथ खरीदा है। यह बहुत सुविधापूर्ण है! तुम इसे चालू कर दो और यह कहीं भी खुजला सकता है। इसलिए मैं ऐसा सोचती थी कि आप ध्यान में बैठते होंगे...आप को इसकी आवश्यकता होगी!

मैंने कहा,'मैं कभी ध्यान में नहीं बैठता। मैं ध्यान में 'हूं', इसलिए मुझे बैठने की आवश्यकता नहीं है। जो कुछ भी मैं करता हूं , मैं ध्यान में होता हूं। यदि मुझे मेरी पीठ खुजलाने की आवश्यकता होगी, मैं इसे तुरंत ही खुजला लूंगा। अपनी खुद की पीठ खुजलाने में गलत क्या है? तुम किसी और की पीठ तो खुजला नहीं रहे हो।'

सिर्फ शरीर का ध्यान रखो, शरीर तुम्हें काफी प्रतिफल देगा। अपने मन का ध्यान रखो और मन सहायक होगा। मित्रता पैदा करो, और ध्यान सुगमता से आता है। समझने के बजाय... क्योंकि ध्यान के पहले समझ सम्भव नहीं है, केवल नासमझी...।

एक रात एक आदमी एक पब में गया और बार में बीयर पीने के लिए बैठ गया। जब वह अपने बगल के स्टूल पर बैठे आदमी से बात करने में तल्लीन था, एक बंदर बार-पोस्ट के सहारे नीचे उतरा, उसके ग्लास के पास रुका और उसके बीयर में पेशाब कर दिया। जब तक उस आदमी के खयाल में आए, देर हो चुकी थी॥

'हे!' उसने आश्चर्य से पूछा,' क्या तुमने यह देखा? वह बंदर मेरे बीयर में पेशाब कर गया!'

'ठीक है, लेकिन मुझसे पूछने का कोई अर्थ नहीं है,' उसके पड़ोसी ने कहा. ' बार कीपर से पूछो--वह इस जगह का मालिक है।'

उस आदमी ने बार कीपर को वहां बुलाया। 'हे!' उसने कहा, 'क्या तुम जानते हो कि जब मैं इस सज्जन के साथ बात कर रहा था, एक बंदर यहां आया और मेरे बीयर में पेसाब कर गया?'

'मुझसे कुछ लेना-देना नहीं है' बार के मालिक ने कहा, 'जाओ और वहां उस पियानो वादक से बात करो--यह उसी का बंदर है!'

वह आदमी अपने बीयर के ग्लास को लिए हुए पियानो वादक के पास गया और उसके कंधे पर ठोकते हुए कहा,' हे, क्या तुम जानते हो कि तुम्हारे बंदर ने मेरे बीयर में पेशाब कर दिया है?

'नहीं' पियानो वादक ने कहा,' लेकिन यदि तुम ैन शब्दों को सुर में गाओ , तो मैं साथ में पियानो बजा दूंगा।'

 

ओशो: द वे आफ द बुद्धा: द धम्मपदा, Vol. 10, Talk #4

 

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द वे आफ द बुद्धा: द धम्मपदा