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OSHO Times Body Dharma स्वास्थ्य, ध्यान और स्वप्न

स्वास्थ्य, ध्यान और स्वप्न

ऐसा क्यों होता है कि सक्रिय-ध्यान में गहरी व तेज़ श्वस्न-क्रिया के बाद शरीर बहुत हल्का महसूस करने लगता है?

यह सत्य है कि शरीर ध्यान के पश्चात हल्का महसूस करता है। ऐसा होगा ही, क्योंकि शरीर का होने का बोध केवल भारीपन का है। जिसे हम बोझीलापन कहते हैं वह और कुछ नहीं अपितु शरीर के प्रति हमारा बोध है। एक रुग्ण व्यक्ति को, चाहे वह कमज़ोर या दुबला-पतला ही क्यों न हो, अपना शरीर भारी लगता है। परंतु एक स्वस्थ व्यक्ति को, भले ही वह भारी-भरकम ही क्यों न हो, अपना शरीर हल्का लगता है। तो वास्तव में यह शरीर-बोध है जो हम पर बोझ सा लगता है।

और हमें अपने शरीर का बोध तब होता है जब उसे पीड़ा होती है, जब इसे कष्ट होता है। जब हमारे पांव दुखते हैं तब हमारी चेतना पैरों पर चली जाती है। जब हमारा सिर दुखता है तो हमारी पूरी चेतना वहीं चली जाती है। अगर हमारे शरीर में कोई पीड़ा नहीं होती तो हमें शरीर का बोध भी नहीं होता। चेतना हमारी पीड़ा का समस्त मापदंड है।
 

हमारी स्वस्थ व्यक्ति की परिभाषा है: वह व्यक्ति जो यह अनुभव करता है कि वह शरीर से निर्भार है।
 

जिसे यह महसूस नहीं होता कि वह शरीर है, जिसे शरीर से निर्भार होने का आभास होता है वही स्वस्थ व्यक्ति है। और अगर वह शरीर के किसी अंग से तादात्म्य कर लेता है तो कहा जा सकता है कि उसके शरीर का वह हिस्सा बीमार है।

ऑक्सीजन की मात्रा जैसे-जैसे बढ़ती जाती है और जैसे ही कुंडलिनी जाग्रत होती है, तुम्हें वे अनुभव होने शुरु होंगे जो शरीर के नहीं हैं; वे आत्मा के अनुभव हैं। और इन सूक्षम अनुभवों के कारण तुम हल्का महसूस करोगे, एक विशेष प्रकार की निर्भारता। बहुत लोगों को लगेगा कि वे ज़मीन से ऊपर उठ रहे है। ऐसा नहीं कि वे वास्तव में ऊपर उठ जाते हैं-- यह घटना तो कभी-कभार ही घटती है। लेकिन शरीर की निर्भारता के कारण तुम्हें ऐसा लगता है कि तुम ऊपर उठ गए हो। अगर तुम अपनी आंखें खोलकर देखते हो तो तुम पाते हो कि तुम तो ज़मीन पर बैठे हो। तो ज़मींन से ऊपर उठने का यह अनुभव क्यों ?

तथ्य यह है कि हमारा चित्त अपनी अंतरतम गहराइयों में किसी ऐसी भाषा को नहीं जानता, जिसे हम जानते हैं। यह केवल चित्रों, संकेतों की भाषा ही जानता है। तो तुम जब भी निर्भारता अनुभव करते हो, परम निर्भारता, तो यह ऊपर उठने की इस घटना का चित्रण चित्रों में करता है, यह इसे ऐसा ही अनुभव करता है।
 

हमारा गहरा चित्त, हमारा अवचेतन मन शब्दों में नहीं सोचता, यह चित्रों में, संकेतों में सोचता है।
 

तभी तो हमारे सपने चित्रों वाले होते हैं। सपनों का चित्त हमारे अनुभवों, हमारे विचारों को चित्रों में बदल देता है। इसीलिये जब सुबह हम जागते हैं तो हमे अपने ही सपनों को समझना कठिन हो जाता है। जिस भाषा को हम जानते हैं और अपनी जाग्रत अवस्था में प्रयोग में लाते हैं वह सपनों की चित्रक भाषा से सर्वथा भिन्न है। दोनों एक दूसरे के लिये बिल्कुल अजनबी हैं और इसीलिये उसे समझाने के लिये पंडितों, पुरोहितों व मनोवैज्ञानिकों के रूप में मध्यस्थों की आवश्यकता रहती है।

मान लो, कोई व्यक्ति महत्वाकांक्षी है, तो वह अपनी महत्वाकांक्षा को सपने में कैसे देखेगा? वह पक्षी बन कर आकाश में उड़ान भरेगा। तब वह सबसे ऊपर होगा, पूरे संसार को अपने पीछे छोड़ता हुआ। महत्वाकांक्षा सपने में उड़ान का रूप ले लेगी-- एक सपना, कि वह उड़ता जा रहा है, उड़ता ही जा रहा है। सभी महत्वाकांक्षी लोग उड़ने का सपना देखते हैं।

अत: जागने पर वह व्यक्ति हैरान होता है कि वह सपने में उड़ क्यों रहा था! यह उसकी महत्वाकांक्षा है जो पक्षी बन कर उसे सपने में उड़ाती है।

इसी प्रकार जब हम ध्यान की गहराइयों में उतरते हैं तो हम निर्भार महसूस करते हैं।
 

ओशो: इन सर्च ऑफ़ मिरैकुलस, भाग 1, #2