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OSHO Times Body Dharma मूलत: मेकअप पाखंड है

मूलत: मेकअप पाखंड है

मैं राजनयिक के रूप में कार्य कर रहा था परंतु सोचता था कि मुझे कुछ मसाज करने का अध्ययन करना चाहिए क्योंकि मुझे हाथ से काम करना पसंद है, और मैं जानता हूं कि यह एक ऐसा काम है जहां व्यक्ति खुला हुआ और ग्रहणशील हो सकता है।

श्रंगार कुरूप लोगों की खोज है| ऐसा नहीं है कि श्रंगार कुरूप है, लेकिन श्रंगार अपने में कुरूप खोज है| कुरूप व्यक्ति स्वाभाविक रूप से सुंदर व्यक्ति की तुलना में हीनता का अनुभव करता है--ईर्ष्यालु, प्रतिस्पर्धात्मक| कुरूप व्यक्ति इसकी पूर्ति कृत्रिम ढंग से करने का प्रयत्न करता है| स्वाभाविक सुंदर व्यक्ति को किसी चीज की पूर्ति नहीं करनी होती| लेकिन स्वाभाविक रूप से सुंदर व्यक्ति बहुत कम हैं, इसलिए श्रंगार लगभग सामान्य घटना बन गई है|
 
हज़ारों वर्षों से आदमी हर संभव तरीक़ों से उसे छिपाने की कोशिश करता रहा है, जो उसके अंदर कुरूप है--शरीर में, मस्तिष्क में, या आत्मा में| यहां तक कि वे व्यक्ति भी जो स्वाभाविक रुप से सुंदर हैं, उन व्यक्तियों का अनुकरण करना शुरू कर देते  हैं, जो कुरूप और कृत्रिम होते हैं| केवल इस कारण से, क्योंकि कृत्रिमता धोखा देने में सक्षम होती है| उदाहरण के लिए, स्तन स्वाभाविक रूप से इतने सुंदर नहीं होते जितने दिखाई दिए जा सकते हैं | यहाँ तक कि कोई स्त्री जिसके स्तन स्वाभाविक रूप से सुंदर हों, वह भी यह सोचना शुरू कर देती है कि वह स्त्री जिसके स्तन स्वाभाविक सुंदर नहीं है अथवा वह कम से कम ऐसा मान लेती है तो भी ऐसा दिखावा करती है जैसे वे बहुत ही सुंदर हो| इस तरह से स्वाभाविक सुंदरता भी अनुकरण करना शुरू कर लेती है|
 
श्रंगार, और श्रंगार का विचार मूल-रूप से पाखंड है| प्रत्येक को स्वयं के स्वाभाविक रूप को प्रेम और स्वीकार करना चाहिए... केवल शारीरिक स्तर पर ही नहीं क्योंकि यही से यात्रा प्रारम्भ होती है| और अगर तुम यहाँ पर गलत हो, तब क्यों नहीं तुम इसी तरह से  मस्तिष्क के संबंध में मान ले सकते? तब स्वयं को संत (ज्ञानी) मान लेने में क्या बुराई है, ज्ञानी, जो कि तुम नहीं हो? तब भी तर्क वही रहेगा| और कभी-कभी ऐसा भी होता है कि नकल असल को हरा देती है, क्योंकि नकल अभ्यास कर सकती है, दोहराई जा सकती है, व्यवस्थित की जा सकती है और उसमें बहुत तरीक़ों से कुशलता लाई जा सकती है|
 
मैं यह नहीं कह रहा हूं कि वह सब, जो प्राकृतिक नहीं है, वह बुरा है| 
 
प्रकृति में भी सुधार लाया जा सकता है, इसी के लिए ही प्रतिभा का होना है, पर यह प्रकृति के विरूद्ध नहीं होना चाहिए| 
उदाहरण के लिए, ओंठों को अच्छे भोजन, अच्छे व्यायाम और अच्छी दवाइयों से भी लाल किया जा सकता है| यह भी प्रकृति में किया गया सुधार है, लेकिन प्रकृति में, प्राकृतिक तौर पर किया गया सुधार है| उस पर लिपस्टिक लगाना एक हलकापन है; असल में यह सुधार ही नहीं है| यह स्टेज के लिए ही ठीक है|    
 
स्त्रियां अपनी टांगों और बगलों के बाल हटा सकती हैं, यह उचित है, यह स्वास्थ्यप्रद है, इसमें कुछ भी गलत नहीं है| जब तक कि तुम हर प्रकार से शरीर की सफाई का ध्यान रखते हो... अगर तुम रोजाना नहाते हो और शरीर की सफाई करते हो, तब तुम्हारी बगलों के बाल बुरे नहीं हैं| इसमें कुछ भी गलत नहीं है| तब उन्हें हटाने की कोई जरूरत नहीं, वे अपने स्थान पर ठीक हैं| लेकिन अगर तुम नहाते नहीं हो और सफाई और स्वास्थ्य का ध्यान नहीं रखते, तब निश्चित ही उनमें धूल मिल जाएगी और उसमें से पसीना आने लगेगा और तब उसमें से बदबू आने लगेगी| तब उन्हें हटाना ही उचित है| मैं उन्हें हटाने के विरूद्ध नहीं हूं| यह उचित ही है कि तुम अपने टांगों के बालों को हटा कर अपनी टांगों को एक सुंदर रूप दे सको| 
 
...तुम दूसरों को धोखा दे सकते हो, पर उन लोगों को धोखा कैसे दे सकते हो जो तुम्हारे निकट हैं? और क्या उन्हें धोखा देना उचित होगा? और यदि वे तुम्हें, तुम्हारे स्तनों के कारण प्रेम करते हैं, और जिस पल उन्हें पता चलेगा कि तुम्हारे स्तन नकली हैं—प्लास्टिक या रबर के हैं, तब क्या उनका प्रेम टिक पाएगा? वह तुरंत ही तिरोहित हो जाएगा| सारी मनुष्यता झूठी हो गई है| ऐसा लगता है कि सब छल और धोखा देने की ही योजना बनाते रहे हैं| 
 
प्रकृति स्वयं के पार जाने में सहयोग कर सकती है, पर उसका दमन नहीं होना चाहिए| अगर प्रकृति का दमन किया जाता है, तब तुम खंडित मनो-स्थिति में आ जाते हो| तब तुम दोहरे व्यक्तित्त्व वाले हो जाते हो: एक जैसे तुम हो, और एक वैसा जैसा तुम दूसरों को दिखना चाहते हो| तब तुम अपने में ही उलझ कर रह जाते हो कि तुम कौन हो? यह अथवा वह? यह केवल दोहरे व्यक्तित्व का ही सवाल नहीं है, तब तुम्हें बहुत सारे व्यक्तित्व रखने होंगे| एक मां को अपने बच्चे के प्रति एक अलग व्यक्त्वि रखना पड़ता है| उसे मां होने का दायित्व भी निभाना है, और इसके अलावा अपने पति के लिए पत्नी भी बनना है, और इसके साथ ही अपने प्रेमी के लिए प्रेमिका भी होना है| इस तरह से कुछ और होना है| इस तरह उसके चारों और बहुत सारे व्यक्तित्व इकट्ठे हो जाते हैं, और इन इतने सारे व्यक्तित्वों की भीड़ में, उसके स्वयं का व्यक्तित्त्व खो जाता है| तब उसे अपने स्वयं का असली चेहरा खोजने में बहुत कठिनाई होती है| 
 
तुमने मुझसे कहा, “श्रंगार का आध्यात्मिक उपयोग कर स्त्री की प्राकृतिक सुंदरता को बढ़ाया जा सकता है...  
 
यह बिल्कुल ही व्यर्थ की बात है| अध्यात्म को किसी भी प्रकार के श्रंगार से नहीं बढ़ाया  जा सकता|  अंतःकरण की सुंदरता के लिए ऐसा कुछ नहीं किया जा सकता--जो बाहर से किया जा सकता हो|
 
 
अंतःकरण ही तुम्हारा असली चेहरा है; यह तुम्हारे मूल स्वभाव की खोज है| इसके साथ किसी भी प्रकार की छेड़छाड़ नहीं की जा सकती, उसे छिपाया भी नहीं जा सकता, उसे व्यवस्थित भी नहीं किया जा सकता| यह टांगों के बाल जैसा नहीं है, क्योंकि यहां टांग ही नहीं है, न ही बगलों के बाल या ओंठ हैं| 
 
तुम्हारे अंतरतम स्वरूप ही तुम्हारे स्वयं की विशुद्ध चेतना है| उसे किसी भी प्रकार के श्रंगार की आवश्यकता नहीं है|
 
यहां पर मेरी सारी कोशिश यही है कि मैं तुम्हें स्वयं की खोज में मदद कर, सारे व्यक्तित्वों से मुक्त कर सकूं| व्यक्तित्त्व एक प्रकार का झूठा आवरण है, जो तुमने अपने चारों ओर लपेट रखा है, और तुम्हारी निजता तुम्हें अस्तित्व द्वारा दी गई सौगात है| वह पहले से ही यहाँ तुम्हारे स्वयं के अंदर है| अगर तुम अपने सारे व्यक्तित्त्व गिरा सकों,  तब तुम उसे पा सकते हो|  जिस क्षण सारे व्यक्तित्त्व खो जाते हैं, तब ही वे जाग पाते है| 
 
असली जीवन--प्राकृतिक ही हो सकता है, और एक दिन असली जीवन ही प्रकृति के पार जा सकता है|  लेकिन प्रकृति ही उसकी बुनियाद हो सकती है, प्रकृति के विरूद्ध जाकर  नहीं, उसे छिपा कर नहीं, बल्कि उसे खोज कर, जो प्रकृति का अंतरतम मूल स्वरूप हैं|
 
तब यह एक उत्कृष्टता है, तब यह एक अत्यंत ही सुंदर अनुभव है| वह तुम्हें सुंदर बना जाता है--तुम्हारे शरीर को, तुम्हारे मस्तिष्क को, तुम्हारी आत्मा को| यह केवल तुम्हें ही सुंदर नहीं बनाता, बल्कि उन्हें भी सुंदर बना देता है, जो व्यक्ति तुम्हारे संपर्क में आते है| यह सुंदरता परलोक से संबंधित है; यह एक ईश्वरीय देन है, यह कुछ ऐसा है, जो ऊपर से आ कर तुम्हारे ऊपर बरस जाता है|
 

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