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OSHO Times Body Dharma गहरी श्वास लें !

गहरी श्वास लें !

मैं पूर्णता से श्वास नहीं ले सकता। मुझे लगता है कि नीचे नाभि के पास मैं कुछ रोक रहा हूं।

फिर रॉल्फिंग ठीक रहेगी। रॉल्फिंग मालिश करने से श्वास स्वाभाविक हो जायेगी। फिर तुम इसे जारी रख सकते हो।

श्वास का विशेष ध्यान रखना होगा क्योंकि यह एक बहुत महत्वपूर्ण बात है।यदि तुम पूर्णता से श्वास नहीं ले रहे तो तुम पूर्णता से जी भी न सकोगे।

तब तुम हर जगह कुछ न कुछ रोकोगे, यहां तक कि प्रेम में भी। बातचीत करने भी तुम कुछ रोकोगे। तुम पूरा वार्तालाप न करोगे;कुछ न कुछ बच रहेगा।
एक बार श्वास ठीक हो जाये तो सब सही रास्ते पर आ जाता है। श्वास जीवन है। लेकिन लोग इसकी उपेक्षा कर देते हैं,वे इसकी चिंता नहीं लेते,वे इस पर बिलकुल ध्यान नहीं देते।
और तुम्हारे जीवन में जो भी बदलाहट आयेगी वह श्वास में बदलाहट द्वारा ही आयेगी।

यदि तुम् वर्षों से गलत ढग से श्वास ले रहे हो, उथला श्वास, तो तुम्हारी मांस-पेशियां जम जाती हैं। तब यह तुम्हारी इच्छा-शक्ति की बात नहीं रह जाती। यह ऐसा ही है कि कोई वर्षों से हिला-जुला न हो, उसकी लातें मृत हो गयी हों, मांस-पेशियां सिकुड़ गयी हों और रक्त जम गया हो। अब अचानक वह व्यक्ति लंबी सैर का विचार करे- बाहर सूर्य उगा है,मौसम सुहावना है। लेकिन वह हिल न सकेगा; केवल सोचने से यह घटित न होगा। अब बहुत संघर्ष करना होगा उन लातों को जीवंत करने के लिये।

श्वास की नली की मांस-पेशियां एक विशेष ढंग से बनी होती हैं और यदि तुम गलत ढंग से श्वास लेते रहे हो- और लगभग सभी लोग गलत ढंग से लेते हैं- तो मांस-पेशियां जम जाती हैं। अब इन्हें अपने प्रयत्न करके बदलने में बहुत समय व्यर्थ जायेगा। गहरी मालिश से, विशेषतया रॉल्फिंग से, यह मांस-पेशियां शिथिल हो जाती हैं और तुम फिर दोबारा प्रारंभ कर सकते हो। लेकिन रॉल्फिंग  के बाद एक बार तुमने सही श्वास लेना शुरू कर दिया तो पुन: पुरानी आदत में न लौट जाना।

जीवन का अत्यंत मूलभूत पाठ

हर कोई गलत ढंग से श्वास लेता है क्योंकि संपूर्ण समाज गलत संस्कारों, धारणाओं और दृष्टिकोणों पर आधारित है। उदाहरण के रूप में एक छोटा बच्चा रोता है तो मां उसे रोकती है। अब बच्चा क्या करे?- क्योंकि रोना आ रहा है और मां कह रही है कि वह न रोये। वह सांस रोकनी शुरू कर देगा क्योंकि यही एक रास्ता है रोकने का। यदि तुम सांस रोक लो तो सब कुछ रुक जाता है- रुदन, अश्रु, सब कुछ। फिर वह एक ढर्रा बन जाता है-क्रोध मत करो, रोओ मत, यह न करो, वह न करो।

बच्चा सीख जाता है कि यदि वह उथला श्वास लेता है तो सब कुछ नियंत्रण में रहता है, लेकिन अगर वह गहरी, संपूर्ण सांस लेता है तो वह निरंकुश हो जाता है। इसलिये वह स्वय को पंगु बना लेता है।

हर ब्च्चा, लड़का हो या लड़की, अपने गुप्तांगों से खेलने लगता है क्योंकि उसे सुखद अनुभव होता है। उसे अहसास भी नहीं कि सामाजिक मूढ़ता के चलते यह वर्जित है, और यदि मां, पिता या कोई बच्चे को ऐसा करता देख ले तो उसे उसी क्षण रोक देगा। उनकी आंखों में ऐसी भर्त्सना का भाव दिखाई देता है कि बच्चे को गहरा आघात लगता है और वह गहरी सांस लेने से ही डरने लगता है। क्योंकि यदि तुम गहरा श्वास लेते हो तो यह भीतर से तुम्हारे गुप्तांगों को सहलाता है। वह तुम्हारे लिये समस्या पैदा करता है और तुम गहरी सांस ही नहीं लेते। तुम उथली सांस लेते हो ताकि गुप्तांगों से संपर्क ही न हो।

वह सब समाज जहां सेक्स का दमन किया जाता है, उथले श्वास वाले समाज हैं। केवल आदिवासी समाज, जहां सेक्स के दमन की कोई धारणा नहीं है, पूर्णता से श्वास लेते हैं। उनकी सांस लेने की प्रक्रिया अत्यंत सौन्दर्य पूर्ण है, संपूर्ण है, स्वास्थ्य दायक है। वह पशुओं की भांति सांस लेते हैं, बच्चों की भांति सांस लेते हैं।
 

तो इसमें बहुत सी बातें सम्मिलित हैं…

अबव ऑल डोंट वॉबल