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OSHO Times Body Dharma हमारी अंत:प्रज्ञा से जुड़ना

हमारी अंत:प्रज्ञा से जुड़ना

जब तुम पूरी तरह जगे होते हो, एक स्थानांतरण घटित होता है: मस्तिष्क के बाएं क्षेत्र से ऊर्जा दाएं क्षेत्र की ओर प्रवाहित होने लगती है। जब तुम पूरी तरह सजग होते हो, तुम अंतर्ज्ञान से भरने लगते हो, तुम्हें झलकें आने लगती हैं, अज्ञात से, असीम से झलकें आने लगती हैं। हो सकता है कि तुम उन्हें जान न पाओ, लेकिन तब तुम बहुत अधिक चूक जाओगे।

वास्तव में विज्ञान की सभी महत्वपूर्ण खोजें भी मस्तिष्क के दाहिने हिस्से से आती हैं, न कि बायें हिस्से से।

तुमने मैडम क्यूरी--एकमात्र महिला जिसने नोबेल पुरस्कार पाया, के बारे में अवश्य सुना होगा। वह गणित के एक विशेष प्रश्न को हल करने के लिए तीन साल से अथक प्रयास कर रही थी परंतु उसे हल नहीं कर पा रही थी। वह कठिन श्रम कर रही थी, उसने इस तरफ से और उस तरफ से तर्क किया परंतु कोई हल न निकला। एक रात, पूरी तरह थकी-मांदी निढाल होकर वह सो गई, और जब वह सो रही थी तब भी वह प्रश्न को हल करने का प्रयास कर रही थी। रात में वह उठी, टहली, किसी कागज पर उत्तर लिखा, वापिस विस्तर पर आकर सो गई।

सुबह जब वह उठी, एक मेज पर उसने वह उत्तर लिखा हुआ पाया परन्तु वह विश्वास नहीं कर पा रही थी कि यह किसने किया..यह उत्तर कहां से आया। यह बाएं हिस्से से संभव नहीं था: बायां तो तीन साल से लगातार कठिन श्रम कर रहा था। और कागज पर कोई विधि नहीं अंकित थी, मात्र निष्कर्ष था। यदि यह बाएं से आया होता तो उसमें एक विधि होती, यह क्रमवार होता। लेकिन यह एक झलक की तरह आया... ठीक उस तरह की झलक जो उस बच्चे को घटी थी, जो चेस्ट में था। बायां हिस्सा थक कर , हार कर, असहाय होकर, दाएं हिस्से की मदद लेता है।

जब भी तुम इस स्थिति में हो कि तुम्हारे तर्क काम न कर रहे हों, तुम दुखी न होओ, निराश न होओ। वे क्षण तुम्हारे जीवन के सबसे आशीर्वाद के क्षण हो सकते हैं: वे क्षण हैं जब बायां हिस्सा दाएं को अपनी दिशा में जाने की इजाजत देता है। तब स्त्रैण भाग, सुग्राहक भाग तुम्हें एक दिशा प्रदान करता है। यदि तुम उनका अनुसरण करो, तो अनेक द्वार खुल सकते हैं। लेकिन यह संभव है कि  तुम चूक जाओ। तुम कह सकते हो, 'क्या बकवास है।'
पूरी कला यह है कि तुम मस्तिष्क के स्त्रैण भाग से कैसे कार्य करते हो, क्योंकि स्त्रैण अस्तित्व से जुड़ा है, और पुरुष अस्तित्व  से जुड़ा नहीं है।

पुरुष आक्रामक है, पुरुष सदा एक संघर्ष में है-- स्रैण सदा ही समर्पण की दशा में है, एक गहरे ट्रस्ट में है। इसलिए स्त्री का शरीर इतना सुंदर है, इतना सुडौल है। वह प्रकृति के साथ एक गहरे ट्रस्ट और एक गहरे लय में है।
स्त्री एक गहरी समर्पण की दशा में जीती है - पुरुष सदा संघर्षरत है, क्रोधित, सदा कुछ न कुछ करता रहता है, कुछ साबित करने का प्रयास करता रहता है, कहीं पहुंचने का प्रयास करता रहता है। स्त्री प्रसन्न है, कहीं पहुंचने का प्रयास नहीं है। स्त्री से पूछो कि क्या उसे चांद पर जाना है? वह बहुत आश्चर्य चकित होगी। 'किसलिए'? क्या अर्थ है? इतना श्रम क्यों उठाना? घर में होना पूरी तरह ठीक है।' स्त्री को रस नहीं है कि वियतनाम में क्या हो रहा है और कोरिया में क्या हो रहा है और इसराइल में क्या हो रहा है। अगर उसे कुछ रस है तो अधिक से अधिक कि पड़ोस में क्या हो रहा है, अधिक से अधिक  कि कौन किसके प्रेम में पड़ गया, कौन किसके साथ भाग गई - उसका रस बस गप-शप में है, राजनीति में नहीं।

तुम जीवन में बहुत कुछ खो देते हो क्योंकि तुम्हारा सिर सदा बात करता रहता है। यह तुम्हें चुप होने नहीं देता।

और मस्तिष्क का गुण मात्र इतना है कि यह अधिक तार्किक, धूर्त, खतरनाक और हिंसक है। अपने हिंसक गुण के कारण यह भीतर मालिक बन गया है और भीतर के इस लीडरशिप के कारण आदमी बाहर भी लीडर बन गया है। आदमी ने बाहरी दुनिया में भी स्त्री के ऊपर मालकियत कर रखी है - अनुग्रह के ऊपर हिंसा ने मालकियत जमा ली है।

पुरुष मन एक संघर्ष पैदा करने की घटना हो गया है; इसलिए यह प्रभुत्व जमाता है, यह दूसरे पर मालकियत करता है। लेकिन भीतर गहरे में, यद्यपि तुम बलशाली हो भी जाओ, तुम जीवन को खो देते हो - और भीतर गहरे में, तुम्हारा स्त्रैण चित्त गति करता रहता है।

जब तक तुम वापस स्त्रैणता को नहीं प्राप्त कर लेते और तुम समर्पण नहीं करते, जब तक तुम्हारा प्रतिरोध और संघर्ष समर्पण नही बनते, तब तक तुम वास्तविक जीवन और उसके उत्सव को नहीं जान सकते।

एनसिएन्ट म्युज़िक इन दि पाइन्स, प्र # 1

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