Quantcast

OSHO Times Body Dharma अंतस की आंतरिक लय

अंतस की आंतरिक लय

तुम भीतरी लय की खोज कर रहे हो, जिसे कभी तुम धन में, कभी सत्ता में, कभी प्रतिष्ठा में, और कभी कई प्रकार के संबंधों में खोजते हो| तुम मांग ही करते रहे हो| तुम इससे भी कुछ श्रेष्ठ के बारे में जानना चाहते हो, तुम श्रेष्ठ के लिए प्यासे हो| 
 
कभी-कभी किसी दिन सामान्य जीवन में भी यह घटता है| न जाने कैसे, अचानक किन्हीं क्षणों में, जब किसी दिन--सुबह तुम जागते हो, सब कुछ तुम्हें ठीक लगने लगता है, चिड़िया गीत गा रही है, सुगंधित हवा चल रही है, सूरज उग रहा है, और अचानक ही तुम्हें लगता है कि सब कुछ शांत है, और अब एक पल के लिए भी तुम इनसे अलग नहीं... तुम बिना किसी कारण के अपने भीतर से बहुत आनंद उमगता हुआ अनुभव करते हो| अचानक ही तुम भारी उत्साह अनुभव करते हो, पूरी तरह नया सा, मानो घर लौट आए हो| शायद रात्रि की गहरी नींद और आराम ने, या शायद एक खूबसूरत सुबह ने, गीत गाते पक्षियों ने, ताजी हवाओं ने, शायद सूरज की रोशनी में चमकती घास पर पड़ी ओस की बूंदों ने या इन सबने मिलकर, ऐसी स्थिति बनाई हो जहां बिना तुम्हारे कुछ किए ही, केवल संयोग से ही तुम्हारी लयबद्धता स्वयं के और अस्तित्व के साथ हो गई हो| 
 
और याद रखो, यह दोनों हमेशा ही साथ होती है: जब तुम स्वयं के साथ लयबद्ध होते हो, तब तुम अस्तित्व के साथ भी लयबद्ध हो जाते हो|
लयबद्धता के दो पहलू होते हैं: व्यक्तिगत और अस्तित्वगत| अगर कोई मनुष्य स्वयं के साथ लयबद्ध है, तो कोई कारण नहीं कि वह अस्तित्व के साथ लयबद्ध न हो| अगर तुम्हारे भीतर के सारे संघर्ष समाप्त हो जाएं, चाहे एक क्षण के लिए ही सही--तब उस क्षण में तुम अस्तित्व के ही हिस्से हो, अब तुम किसी द्वीप की तरह नहीं, अब तुम किसी से अलग नहीं| अचानक ही सारी दीवालें खो जाती हैं; अब तुम किसी कैद में नही रहे|
 
अगर तुम पीछे देखो तो तुम केवल कुछ क्षण ही याद कर सकते हो... और वे क्षण, वहीं क्षण होंगे, जब तुम पूर्ण विश्रांत थे, ये क्षण--वे ही क्षण होंगे जब तुम्हारे मन में कोई विशेष कामना नहीं थी, जहां तुम चिंतित नहीं थे, जहां कोई तनाव नहीं था, जहां तुम बस थे|  
 
इन आकस्मिक घटित क्षणों का सूक्ष्मता से निरीक्षण करो, क्योंकि यही रहस्य की कुंजी है| अगर यह शिथिल अवस्था में घटता है, जब तुम बहुत शांत और शिथिल होते हो, तब तुम इसका संदर्भ निर्मित कर सकते हो! तुम शिथिल हो सकते हो| तुम्हारे तैरने के दौरान भी अगर यह घटता है, तब तुम तैर भी सकते हो और उसका संदर्भ भी बना सकते हो| अगर तुम्हारे दौड़ने के दौरान भी घट सकता है... यह विभिन्न लोगों को विभिन्न ढंग से होता है| बहुत सारे दौड़ने वाले यह जानते हैं कि एक निश्चिंत सीमा के बाद अगर तुम दौड़ते ही रहते हो और दौड़ते ही रहते हो. तब अचानक यह घटता है, क्योंकि मनुष्य की ऊर्जा की तीन परतें होती हैं|
पहली परत--केवल दैनिक जीवन की गतिविधियों के लिए है; यह बहुत पतली परत है| यह आपके आफिस, पत्नी, बच्चों और सामान्य जीवन के लिए पर्याप्त है|
 
दूसरी परत आपात स्थितियों के लिए है; तुम्हारे मकान में आग लगी हो; शायद तुम सारे दिन काम करने के बाद थकावट अनुभव कर रहे हो और बहुत आराम करने की आशा के साथ अपने घर आ रहे हो, तब जब तुम अपने घर पहुंचो और अचानक ही पाओ कि तुम्हारे घर में आग लगी है| तुरंत ही तुम्हारी सारी थकान गायब हो जाती है, अब तुम कोई थके हुए नहीं रहे| तुम अपने सारे आराम को भूल चुके, और आग बुझाने में सारी रात लगा देते हो| और सारी रात के काम के बाद भी तुम थके हुए नहीं रहते| यह ऊर्जा का साधारण स्तर नहीं था, जिसने काम किया, वह तो खत्म हो चुकी थी, अब आपात परत ने काम करना आरंभ कर दिया था|
 
तीसरी परत इससे भी गहरी है| तुम लगातार ही चलते जाओ... उदाहरण के लिए, अगर तुम एक दिन, दो दिन, तीन दिन के लिए लगातार ही काम करते रहो, तब तुम्हारी आपात परत भी समाप्त हो जाएगी और तब तुम उस वैश्विक परत के संपर्क में आते हो| यही जीवन का स्रोत है, और वह अनंत है| जब भी तुम इसके संपर्क में आते हो, तब अदभुत आनंद तुम्हारे भीतर से छलकता है|
 
कभी-कभी व्यायाम करने वालों पर, दौड़ने वालों और तैराकों पर यह घटता है| पहली परत समाप्त हो जाती है, तब दूसरी भी, और जब तुम दूसरी परत के समाप्त हो जाने के बाद भी दौड़ते जाते हो, उस क्षण--तुम उस तीसरी परत के संपर्क में आते हो और तब बिना किसी कारण परम आनंद उमड़ने लगता है|
 
यह तुम पर तब भी घट सकता है, जब तुम संभोग कर रहे हो| यह तुम पर तब भी घट सकता है जब तुम संगीत सुन रहे हो, यह तुम पर तब भी घट सकता है, जब तुम चुपचाप बिस्तर पर लेटे हो और कुछ भी नही कर रहे| यह तुम्हें पेंटिग करते समय--जब तुम उसमें खोए हुए पूरी तरह से लीन हो, तब भी घट सकता है| अथवा और हजारों तरीकों से यह तुम पर घट सकता है| लेकिन निरीक्षण करो: जब भी यह घटे, जब भी वह असीम आनंद का क्षण तुम तक आए, जब भी वह दिव्यता तुम्हारा द्वार खटखटाए, देखो--किन परिस्थितियों में यह घटता है, सचेत रहो! सब ओर निरीक्षण करो किस अंतराल में यह घटित हो रहा है| तब तुम्हें कुंजी मिल गई| अब तुम भी ऐसी परिस्थिति में वही अंतराल निर्मित करने में समर्थ हो सकोगे, जब वह क्षण फिर से आ सकेगा|
 
तुम इसके घटित होने के लिए कुछ नहीं कर सकते, लेकिन इसके घटित होने के लिए स्वयं को उपलब्ध करा सकते हो| तुम इसे घटित होने के लिए बाध्य नहीं कर सकते, लेकिन वह सब निर्मित कर सकते हो-- जो इसके घटित होने के लिए आवश्यक है| तुम अपनी तरफ से कुछ कर नहीं रहे हो: यह घट रहा है| लेकन फिर भी तुम इसमें एक महान भूमिका निभा सकते हो| ऐसे ही ध्यान की इन सब तकनीकों को विकसित किया गया है| इसी तरह से योग पैदा हुआ।
 
वह सामंजस्य तुम्हारे भीतर मौजूद है, क्योंकि इसके बिना तुम जीवंत नहीं रह सकते|
 
यह संगीत पहले से ही वहां उपलब्ध है, वहीं तुम्हारे भीतर बह रहा है, क्योंकि यह संगीत ही तुम्हें इस जगत के साथ जोड़े हुए है|
 
अगर एक बार यह कट जाए तो तुम्हारी मृत्यु हो जाए| तुम जीवित हो, यही इसका पर्याप्त प्रमाण है कि वह संगीत बह रहा है| इस खोज के लिए तुम्हारे स्वयं के भीतर गहरे में प्रवेश करना होगा और खोजना होगा कि यह कहां घटित हो रहा है|

ओशो दि फिश इन दि सी इज़ नेवर थर्स्टी,#10