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OSHO Times Emotional Ecology भय में जीना

भय में जीना

तुम्हारे सारे भय तादात्म्य की उपज हैं।

तुम किसी स्त्री से प्रेम करते हो और प्रेम के साथ, उसी पैकेज में भय आता है: कि वह तुम्हें छोड़ देगी। वह पहले भी किसी को छोड़ चुकी है और फिर तुम्हारे साथ आई है। ऐसा घटा है; शायद वह तुहारे साथ ऐसा ही करे । भय लगता है, पेट में गांठें पैदा होती हैं। तुम अत्यधिक जुड़े हुए हो।

  एक छोटी सी बात तुम्हारी समझ में नहीं आती कि तुम इस दुनिया में अकेले आए हो, तुम यहां पर कल भी थे, बिना इस स्त्री के, भले-चंगे, पेट में किसी गांठ के बगैर और कल को अगर यह स्त्री चली जाए तो गांठों की जरूरत क्या है? तुम जानते हो उसके बिना कैसे जीना और तुम उसके बगैर मजे से जीओगे।

यह भय कि कल चीजें बदल जाएंगीं … कोई मर जाएगा, तुम्हारा दिवाला निकल जाएगा, तुम्हारी नौकरी छिन जाएगी। हजारों चीजें ऐसी हैं जो बदल सकती हैं। तुम ज्यादा से ज्यादा भयों के नीचे दब जाते हो। और उनमें से कोई भी असली कारण नहीं है। क्योंकि कल भी तुम इन्हीं भयों से भरे थे, व्यर्थ ही। चीजें बदल गई हों लेकिन तुम अभी भी जिंदा हो। मनुष्य के पास बहुत बड़ी क्षमता है किसी भी स्थिति से तालमेल करने की।

 कहते हैं, केवल मनुष्य और तिलचट्टे में तालमेल करने की अपरिसीम क्षमता है। इसीलिए जहां आदमी मिलेगा वहां तिलचट्टा मिलेगा। और जहां तिलचट्टा मिलेगा वहां आदमी मिलेगा। वे एक साथ होते हैं, उनमें समानता है। सुदूर क्षेत्रों में जैसे कि उत्तर धृव या दक्षिण धृव … जब मनुष्य इन स्थानों में गया, उसे अचानक पता चला कि वह अपने साथ तिलचट्टे लाया है। और वे पूरी तरह से स्वस्थ और जीवित थे और प्रजनन कर रहे थे।

अगर तुम पृथ्वी पर नजर डालो तो देखोगे कि मनुष्य हजार तरह की विभिन्न भौगोलिक परिस्थितियों में, मौसमों में, राजनैतिक और सामाजिक स्थितियों में, धार्मिक वातावरणों में जीता है; लेकिन वह जी लेता है। और वह सदियों से जीता चला आया है, चीजें बदल जाती हैं, लेकिन वह स्वयं को समायोजित करता चला जाता है।

डरने की कोई जरूरत नहीं है। यह दुनिया भी डूब जाए तो क्या? उसके साथ तुम भी समाप्त हो जाओगे। क्या तुम सोचते हो कि तुम एक द्वीप पर खड़े रहोगे और दुनिया विनष्ट हो जाएगी सिर्फ तुम्हें छोड़कर? फिक्र मत करो, कम से कम तुम्हारे साथ कुछ तिलचट्टे तो होंगे ही।

अगर दुनिया खत्म हो जाए तो समस्या क्या है? मुझसे यह कई बार पूछा गया है । लेकिन समस्या क्या है? अगर वह खत्म होती है तो होती है। उसमें कोई समस्या नहीं है क्योंकि हम यहां नहीं रहेंगे, हम उसके साथ समाप्त हो जाएंगे और चिंता करने के लिए भी कोई नहीं रहेगा। यह वस्तुत: भय से सबसे बड़ी मुक्ति होगी।

दुनिया का अंत होने का मतलब है हर समस्या का अंत , तुम्हारे पेट की हर गांठ का अंत। मुझे कोई समस्या नहीं दिखाई देती, लेकिन मैं जानता हूं कि हर कोई भयभीत है।

 लेकिन सवाल वही है: यह भय मन का हिस्सा है। मन डरपोक है, और डरपोक होना स्वाभाविक है क्योंकि उसमें कोई सार तत्व नहीं है, वह खाली और शून्य है, और वह हर बात से डरता है। और मूलत: वह इससे डरता है कि एक दिन तुम जाग सकते हो। वह सचमुच दुनिया का अंत होगा! दुनिया का अंत इस अर्थ में कि तुम्हारा जाग जाना, तुम्हारा ध्यान की स्थिति को उपलब्ध हो जाना, वहां मन को विदा होना पड़ता है, वह असली भय है। यह भय लोगों को ध्यान से दूर रखता है, उन्हें मेरे जैसे लोगों का दुश्मन बनाता है जो ध्यान का स्वाद फैला रहे हैं, जो होश और साक्षीभाव का उपाय बता रहे हैं। लोग मेरे खिलाफ हो जाते हैं, वह अकारण नहीं, उनका भय जायज़ है।

 उन्हें इसका होश न हो, लेकिन उनका मन सचमुच भयभीत है उस बात के करीब आने से जो ज्यादा सजगता पैदा कर सकती है। वह मन के अंत की शुरुआत होगी। वह मन की मृत्यु होगी। लेकिन तुम्हें कोई भय नहीं है, मन का अंत तुम्हारा पुनर्जन्म होगा, तुम्हारा वास्तव में जीने का प्रारंभ। तुम्हें प्रसन्न होना चाहिए, तुम्हें मन की मृत्यु में खुशी मनाना चाहिए क्योंकि उससे बड़ी स्वतंत्रता नहीं है। अन्य कोई बात तुम्हें आकाश में उड़ने की स्वतंत्रता नहीं देगी, अन्य कोई बात पूरा आकाश तुम्हारा नहीं करेगी।

मन एक कारागृह है।

सजगता है कारागृह से बाहर जाना या इसका बोध होना कि वह कभी कारागृह में था ही नहीं, वह सिर्फ सोच रहा था कि वह कारागृह में था। फिर पूरा भय नदारद हो जाता है।

 मैं भी उसी दुनिया में जी रहा हूं लेकिन मुझे एक क्षण भी कोई भय नहीं लगा क्योंकि मुझसे कुछ भी छीना नहीं जा सकता। मेरी हत्या की जा सकती है लेकिन मैं उसे भी होते हुए देखूंगा, तो जो मारा जा रहा है वह मैं नहीं हूं, मेरी सजगता नहीं है।

जीवन में बड़ी से बड़ी खोज , सबसे कीमती खजाना है सजगता। उसके बगैर तुम अंधकार में ही रहोगे, भयों से भरपूर, और तुम कभी स्वतंत्रता का स्वाद नहीं ले पाओगे। और वह हमेशा तुम्हारी क्षमता रही है , किसी भी क्षण तुम उस पर हक जमा सकते थे लेकिन तुमने कभी नहीं जमाया।

यह तुम्हारी जिम्मेदारी है।
 

ओशो, बियाण्ड सायकॉलॉजी, #19