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OSHO Times Emotional Ecology ध्यान रखें

ध्यान रखें

स्वयं को झूठी पहचान से अलग करने के दो ही उपाय हैं| तुम वैसे ही नहीं हो, जैसा तुम सोचते रहे हो कि तुम हो, या महसूस करते रहे, अथवा प्रक्षेपित करते रहे हो| 
 
तुम्हारी सजगता ही तुम  हो। 
 
  कुछ भी हो जाए--तुम केवल जागरूक ही बने रहते हो| तुम जागरूकता ही हो, इस पहचान को तोड़ा नहीं जा सकता| इस पहचान को नकारा नहीं जा सकता| बाकी सबको नकारा और फेंका जा सकता है|
 
जागरूकता ही परम आधार रहा है, परम बुनियाद| तुम इससे इंकार नहीं कर सकते, तुम इसे नकार भी नहीं सकते, तुम स्वयं को इससे अलग भी नहीं कर सकते|

तो यह प्रक्रिया है: जिसे फेंका नहीं जा सकता, जिसे अलग नहीं किया जा सकता वह तुम हो । जो अलग किया जा सकता, वह तुम नहीं हो|
 
पीड़ा है; एक क्षण के बाद नहीं हो सकती है, पर तुम रहोगे| खुशी आती है और चली जाती है; वह थी, फिर नहीं हो जाएगी--  पर तुम रहोगे| शरीर युवा है, फिर शरीर वृद्ध भी होगा... बाकी सब आता है और जाता है, मेहमान आते हैं और जाते हैं, पर मेजबान वहीं रहता है|
 
इसलिए झेन मनीषी कहते हैं: मेहमानों की भीड़ में खो मत जाना| 
 
अपने मेजबान-भाव को याद रखो| वह मेजबान-भाव ही जागरूकता है| यह मेजबान-भाव ही सजग साक्षीभाव है| वह मूल तत्व क्या है, जो तुम्हारे भीतर हमेशा ही एक जैसा रहता है| केवल वही होना, और अपना तादात्म्य उन सबसे स्थापित न करना, जो आता है और जाता है|
 
पर हम सबने मेहमानों से ही अपना तादात्म्य बना रखा है| सच में ही, मेजबान मेहमानों के साथ इतना व्यस्त हो जाता है कि वह भूल गया है|
 
मुल्ला नसरुद्दीन ने अपने मित्रों और कुछ  अपरिचितों के लिए एक पार्टी आयोजित की| पार्टी बहुत ही उबाऊ  थी, और आधी रात हो चुकी थी और पार्टी अभी भी चल रही थी| तभी  एक अपरिचित, जो यह नहीं जानता था कि मुल्ला ही मेजबान है, उससे कहा,  “मैंने ऐसी पार्टी कभी नहीं देखी, इतनी  बकवास-- ऐसा लगता है कि यह कभी खत्म ही नहीं होगी और मैं इतना बोर हो चुका हूं कि मैं  यहां अब और रुकना भी  नहीं चाहता|”
 
मुल्ला ने कहा, “जो तुमने कहा, यही मैं भी तुमसे कहने वाला था| मैंने भी ऐसी नीरस और बेकार पार्टी पहले कभी नहीं देखी, पर मेरे अंदर तुम्हारे जितना साहस नहीं, वरना मैं भी यहां से भाग जाता|” तब वे दोनों वहां से दूर भाग गए|
 
तब, रास्ते में मुल्ला को याद आया और उसने कहा, “कुछ गलत हो गया,  क्योंकि अब मुझे याद आ रहा है: मैं ही मेजबान हूं, इसलिए कृपया मुझे माफ करो, मुझे वापस जाना होगा|”
 हम सबके साथ भी यही हो रहा है: मेजबान खो गया है, मेजबान सब-कुछ ही भूल गया है|

मेजबान तुम्हारे स्वयं का ही साक्षीभाव है| पीड़ा आती है--हर्ष भी उसके पीछे आता है; यहां खुशी भी है, दुख भी| और प्रत्येक क्षण--जो भी आता है, तुम उस सबके साथ, अपना तादात्म्य बना लेते हो, तुम मेहमान बन जाते हो| मेजबान को याद रखो| जब मेहमान आए तो मेजबान को याद रखो|

बहुत प्रकार के मेहमान हैं: आनंददायक, पीड़ादायक; कुछ मेहमान तुम्हें पसंद होंगे, कुछ मेहमान तुम्हें पसंद नहीं भी होंगे; कुछ मेहमान ऐसे होंगे, जिनके साथ तुम रहना चाहोगे, कुछ मेहमान ऐसे भी होंगे, जिनसे तुम बचना चाहोगे, पर ये सब मेहमान ही हैं|

मेजबान को याद रखो| लगातार ही मेजबान को याद रखो| मेजबान मे ही केंद्रित रहो| अपने मेजबान-भाव में ही रहो, तब  अलगाव होगा| तब दूरी होती है, अंतराल होता है, तब वह पुल टूट चुका| जिस क्षण वह पुल टूटता है, त्याग की घटना घटती है| तब तुम उसके भीतर हो, पर वह नहीं हो| तब तुम मेहमान के साथ हो, पर मेजबान की तरह| तुम्हें मेहमानों से भागने की आवश्यकता नहीं, इसकी कोई जरूरत भी नहीं|   

ओशो दि पैशन फॉर दि इम्पॉसिबुल
ओशो के अनुरोध पर यह किताब अब उपलब्ध नहीं है।
 
 

दैट आर्ट दाऊ