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OSHO Times Emotional Ecology कुछ ऐसा जो तुम्हारे भीतर प्रवेश कर सके

कुछ ऐसा जो तुम्हारे भीतर प्रवेश कर सके

कुछ ऐसा जो तुम्हारे भीतर प्रवेश कर सके

क्रोध का तुम्हारे भीतर गतिशील होना बुरा है, क्योंकि इसका मतलब हुआ कि इससे तुम्हारा पूरा शरीर और मन का पूरा ढांचा ही विषाक्त हो गया। और तब यदि तुम इसे लंबे समय तक किए चले गए जैसे कि प्रत्येक व्यक्ति करता आ रहा है, क्योंकि समाज तुम्हें रूपांतरण नहीं, नियंत्रण करना ही सिखाता है।

समाज कहता हैः “स्वयं पर नियंत्रण रखो,” और नियंत्रण के द्वारा सभी नकारात्मक चीजों को अचेतन के गहन से गहनतम तल में फेंकते रहो—तब वे सब तुम्हारे भीतर निरतंर बहने वाली चीजें हो जाती हैं। तब यह प्रश्न तुम्हारे कभी क्रोधित होने या कभी नहीं होने का नहीं रह जाता; तब तुम केवल क्रोध ही रह जाते हो। और फिर कभी तुम्हारे भीतर भयंकर विस्फोट जैसा होता है और कभी नहीं भी हो़ता। क्योंकि वहां कोई बहाना नहीं होता या तब तुम्हें कोई बहाना खोजना होता है। और स्मरण रहे कि तुम कहीं भी बहाना खोज ले सकते हो।

तुम क्रोधित हो। क्योंकि तुमने क्रोध का इतना अधिक दमन किया है, कि अब ऐसा कोई भी क्षण नहीं होता, जब तुम क्रोधित नहीं होते; ज्यादा से ज्यादा ऐसा होता है कि कभी तुम कम क्रोधित होते हो या कभी अधिक क्रोधित होते हो, बस इतना ही। दमन के द्वारा तुम्हारा पूरा ढांचा ही विषाक्त हो गया है।

तुम क्रोध में ही भोजन करते हो, और जब कोई व्यक्ति बिना क्रोध के भोजन करता है, तब उसका निरीक्षण करना अत्यंत सुन्दर होता है—  क्योंकि तब वह अहिंसक रूप से भोजन कर रहा होता है, और यह भी हो सकता है कि वह मांसाहार ही कर रहा हो, पर तब भी वह अहिंसक रूप से ही भोजन करता है, और यह भी हो सकता है कि तुम केवल फल और सब्जियां ही खा रहे हो, और यदि तुमने क्रोध का दमन किया है, तब तुम भोजन को हिंसक रूप से खाते हो।

केवल भोजन के द्वारा ही तुम्हारे दांत तुम्हारा मुंह क्रोध को बाहर निकाल पाता है। तुम भोजन को पीसते हुए ऐसे चबाते हो, जैसे वह शत्रु हो। और स्मरण रहे, जब कभी कोई जानवर क्रोधित होता है, तो वह क्या करता है? केवल दो ही चीजें संभव है, जो वह कर सकता है, क्योंकि उसके पास कोई हथियार तो होता नहीं और न ही कोई अणु बम होता है, तो फिर वह क्या कर सकता है? या तो अपने नाखूनों से या अपने दांतों से तुम पर हिंसा करता है।

नाखून और दांत—ये ही उनके शरीर के प्राकृतिक हथियार हैं। तुम्हारा अपने नाखूनों के द्वारा कुछ भी करना बहुत कठिन होगा, क्योंकि लोग कहेंगे—“तुम कोई जानवर हो क्या?” तब तुम्हारे पास केवल एक ही उपाय बचता है, जिससे तुम अपने क्रोध और हिंसा को सरलता से प्रकट कर सकते हो, और वह है—तुम्हारा मुंह। और किसी व्यक्ति को काटने में भी तुम उसका प्रयोग नहीं कर सकते। इसी कारण हम कहते है—“ए बाइट ऑफ ब्रेड”, “ए बाइट ऑफ फूड, “ए फ्यू बाइट्स।”

तुम हिंसक रूप से भोजन करते हो, जैसे भोजन कोई शत्रु हो। और स्मरण रहे, अगर भोजन शत्रु है, तब वह वास्तव में तुम्हारा पोषण नहीं करता, बल्कि वह तुम्हारे भीतर की रुग्णता का पोषण करता है। जो लोग क्रोध का गहराई तक दमन करते हैं, वे ज्यादा भोजन करते हैं, और इससे वे अपने शरीर में अनावश्यक चर्बी को इकट्ठा किए चले जाते हैं। और क्या तुमने यह निरीक्षण किया है कि मोटे लोग अनावश्यक रूप से मुस्कुराते रहते हैं। बिना किन्हीं कारणों के। क्यों? उनका यह चेहरा ही उनका मुखौटा है। वे अपने क्रोध और हिंसा से इतने अधिक भयभीत होते हैं कि उन्हें अपने चहरे पर हमेशा ही मुस्कुराहट बनाए रखनी होती है। और वे लगातार ज्यादा भोजन किए जाते हैं।

अधिक भोजन करना क्रोध और हिंसा है। और तब यह तुम्हारे जीवन की प्रत्येक गतिविधि और प्रत्येक मार्ग में गतिशील होगी।

तुम भोजन करते समय भी क्रोधित होते हो: कभी भोजन करते हुए किसी व्यक्ति का निरीक्षण करो। प्रेम करते हुए किसी व्यक्ति को देखो–उसके भीतर क्रोध इतनी गहराई तक प्रवेश कर गया है कि क्रोध के पूर्ण विपरीत की भी सारी सक्रियता भी विषैली हो गई है। भोजन करने जैसी बिलकुल स्वभाविक क्रिया भी जहरीली हो गई है। जब तुम अपना द्वार भी खोलते हो, तब भी वहां क्रोध होता है। तुम मेज पर पुस्तक भी रखते हो, तब भी वहां क्रोध ही होता है, तुम जूते भी उतारते हो तब भी वहां क्रोध होता है, तुम किसी से हाथ भी मिलाते हो तब भी वहां क्रोध होता है। क्योंकि अब तुम केवल क्रोध के ही साक्षात रूप हो।

दमन के द्वारा मन विभाजित हो जाता है, जिस भाग को तुम स्वीकार कर लेते हो—वह तुम्हारा चेतन बन जाता है, और जिस भाग को तुम अस्वीकार करते हो—वह तुम्हारा अचेतन बन जाता है। यह विभाजन स्वाभाविक नहीं है। यह विभाजन दमन के कारण होता है। और जिस भी भाग को समाज अस्वीकार करता है, उस भाग को तुम कूड़े-कर्कट की भांति अपने अचेतन में फेंकते जाते हो। लेकिन स्मरण रहे, जो कुछ भी तुम वहां फेंकते जाते हो, वह तुम्हारा ही और भी ज्यादा हिस्सा बन जाता है। वह तुम्हारे हाथों में, तुम्हारी अस्थियों में, तुम्हारे रक्त में और तुम्हारी हृदय की धड़कनों में चला जाता है। अब तो मनोवैज्ञानिक भी कहते हैं कि लगभग अस्सी प्रतिशत बीमारियां दमित मनो-भावों के कारण ही होती हैं। इतने अधिक हृदयघातों के होने का मतलब ही यही है कि क्रोध का इतना अधिक दमन किया गया है कि हृदय ही विषाक्त हो गया है।

क्यों? आखिर क्यों मनुष्य इतना ज्यादा दमन करता है कि वह बीमार हो जाए? क्योंकि समाज दमन ही सिखाता है—रूपांतरण नहीं। और रूपांतरण का मार्ग बिलकुल ही भिन्न है। यह किसी भी चीज को नियंत्रण करना नहीं, पर इसके बिलकुल ही विपरीत है।

पहली बातः नियंत्रण करने के लिए द्वारा तुम किसी चीज का दमन करते हो और रूपांतारण के लिए उसे तुम अभिव्यक्त करते हो। लेकिन यह अभिव्यक्ति किसी अन्य व्यक्ति पर करने की कोई जरूरत नहीं, वह बिलकुल असंगत है। अगली बार जब तुम क्रोध का अनुभव करो, तब तुम अपने घर के चारों ओर दौड़ते हुए सात चक्कर लगाओ और उसके बाद किसी वृक्ष के नीचे बैठ कर निरीक्षण करो कि क्रोध कहां गया। तुमने इसका दमन नहीं किया, तुमने उस पर नियंत्रण नहीं किया, तुमने उसे किसी अन्य व्यक्ति पर भी नहीं फेंका—क्योंकि अगर तुम उसे किसी अन्य व्यक्ति पर फेंकते हो, तब एक श्रृंखला बनती जाती है, क्योंकि दूसरा भी उतना ही मूर्ख है, जितने तुम। वह भी उतना ही अचेतन है—जितने तुम। और अगर तुम उसे किसी ऐसे व्यक्ति पर फेंकते हो और जो बुद्धत्व को उपलब्ध हो, तब वहां कोई भी कठिनाई नहीं होगी और तब वह तुम्हें उससे मुक्त होने एवं निकलने में सहायता करेगा। और उसे रेचन द्वारा बाहर निकालो। पर दूसरा भी उतना ही अज्ञानी है, जितने तुम। यदि तुम उस पर क्रोध फेंकते हो तो वह भी प्रतिक्रिया करेगा—वह तुम पर और अधिक जोर से क्रोध को फेंकेगा। वह भी उतना ही दमित है—जितने तुम। तब वहां एक श्रृंखला बनती जाती है, तुम उस पर फेंकते हो और वह तुम पर फेंकता है और तब दोंनो शत्रु बन जाते हो।

इसे किसी अन्य पर मत फेंको, यह बिलकुल उसी तरह से है, जैसे कि तुम्हें वमन करने जैसा अनुभव होता है, तब तुम बाहर जाकर किसी अन्य व्यक्ति पर वमन नहीं करते। क्रोध को वमन करने की जरूरत है, तुम बाथरूम में जाते हो और वहां जाकर क्रोध का वमन कर देते हो। इससे पूरा शरीर शुद्ध हो जाता है। और अगर तुमने वमन का दमन किया तो वह खतरनाक होगा। और यदि तुम वमन कर देते हो तब तुम ताजा अनुभव करते हो। तुम बिलकुल भार-मुक्त, हलका शुद्ध और स्वस्थ अनुभव करते हो। तुमने भोजन लिया, उसमें कुछ चीज गलत आ गई और शरीर उसे अस्वीकार कर देता है, तब उसे अंदर जाने को मजबूर मत करो।

क्रोध केवल एक मानसिक वमन है। कुछ ऐसी गलत चीज जो तुमने अपने भीतर ले ली है, जिसे तुम्हारा पूरा मानसिक अस्तित्व फेंकना चाहता है, लेकिन उसे बाहर किसी अन्य व्यक्ति पर फेंकने की कोई आवश्यकता नहीं। क्योंकि लोग उसे दूसरों पर फेंकते हैं, इसलिए समाज उसे नियंत्रण के लिए कहता है।

क्रोध को किसी अन्य व्यक्ति पर फेंकने की कोई आवश्यकता नहीं है। तुम अपने बाथरूम जा सकते हो, तुम थोड़ी लंबी दूरी तक टहलने जा सकते हो, इसका मतलब है कि तुम्हारे अंदर कुछ ऐसी चीज थी, जिसे तीव्र क्रियाशीलता की जरूरत है, जिससे उसे छोड़ा जा सके। केवल थोड़ी देर तक जॉगिंग करो और तब तुम्हें अनुभव होगा कि वह मुक्त हो गई। या एक तकिया लेकर उसे पीटना शुरू करो, तकिए के साथ लड़ना शुरू करो, तकिए को पीटो, तकिए को काटो, जब तक कि तुम्हारे हाथ और दांत विश्राममय विश्रांत  न हो जाएं। पांच मिनट के रेचन से तुम भार-मुक्ति का अनुभव करोगे और एक बार अगर तुम इसे जान लो, तब तुम अपने क्रोध को किसी अन्य पर नहीं फेंकोगे, क्योंकि यह पूर्ण रूप से मूर्खतापूर्ण है।

रूपांतरण के लिए पहली चीज है—क्रोध को अभिव्यक्त करना, लेकिन किसी अन्य व्यक्ति पर नहीं। क्योंकि अगर किसी अन्य व्यक्ति पर तुम इसे अभिव्यक्त करते हो तो तब तुम समग्रता से उसे अभिव्यक्त नहीं कर सकते। तुम उसे जान से मारना चाह सकते हो, तुम उसे दांतों से काटना चाह सकते हो, लेकिन ऐसा करना संभव नहीं है। लेकिन ऐसा एक तकिए के साथ किया जा सकता है। एक तकिए का अर्थ है जो पहले ही बुद्धत्व को उपलब्ध हो चुका। तकिया बोध को उपलब्ध हुआ एक बुद्ध है। तकिया कोई भी प्रतिक्रिया नहीं करेगा और न ही शिकायत करने कोर्ट-कचहरी जाएगा और न ही तकिया तुम्हारे लिए कोई शत्रुता लाएगा, तकिया कुछ भी नहीं करेगा। तकिया प्रसन्न होगा और तुम पर हंसेगा।

दूसरी बात जो स्मरण रखनी हैः सजग होना। नियंत्रण के लिए किसी सजगता की आवश्यकता नहीं है, तुम इसे बस एक यांत्रिक क्रिया की तरह करते हो। एक रोबोट की तरह। क्रोध आता है, तब वहां एक यांत्रिक व्यवस्था है—तब तुरंत ही तुम सिकुड़ कर बंद हो जाते हो। यदि तुम सजग होकर निरीक्षण करोगे तो नियंत्रण इतना सरल नहीं हो सकता

समाज कभी तुम्हे सजग होकर निरीक्षण करने की शिक्षा नही देता, क्योकि जब कोई व्यक्ति सजग होकर निरीक्षण करता है तब वह पर्याप्त खुला होता है। वह सजगता का ही एक भाग है, कि कोई एक खुला हुआ है। और यदि तुम किसी चीज का दमन करना चाहते हो और तुम खुले हुए हो, तो यह एक विरोधाभास है, वह चीज बाहर आ सकती है। समाज तुम्हें यह सिखाता है कि कैसे तुम स्वय को भीतर से बन्द कर लो, कैसे तुम स्वय के अन्दर गुफा बना कर स्वय को छिपा लो और किसी भी चीज को बाहर आने के लिए एक छोटी सी खिड़की तक खोलने की भी अनुमति न दो।

लेकिन याद रखोः अगर कोई चीज बाहर नही जा सकती, तब कोई चीज भीतर भी नहीं आ सकेगी। जब क्रोध बाहर नही जा सकता, क्योंकि तुम बन्द हो। अगर तुम एक सुन्दर चट्टान का भी स्पर्श करते हो, तो कुछ भी भीतर प्रवेश नही करता, तुम एक सुन्दर फूल की ओर देखते हो, भीतर कुछ भी प्रवेश नहीं करता, क्योंकि तुम्हारी आंखें बन्द और मुर्दा हैं। तुम किसी व्यक्ति का चुम्बन भी लेते हो, कुछ भी भीतर नहीं जाता, क्योंकि तुम बन्द हो। तुम एक संवेदनाशून्य जीवन जी रहे हो।

सजगता के साथ ही संवेदनशीलता विकसित होती है। नियंत्रण के द्वारा तुम मंद और मुर्दा हो जाते हो। यह नियंत्रण करने का एक यांत्रिक ढंग है। यदि तुम मंद और मुर्दा हो तो कुछ भी तुम्हे प्रभावित नही कर सकता। तुम्हारा शरीर मानो एक बंद किला हो जाता हो। तब तुम्हें कुछ भी प्रभावित नहीं करता, न तो अपमान और न ही प्रेम।

लेकिन इस नियंत्रण की बहुत भारी कीमत चुकानी पड़ती है, बिल्कुल अनावश्यक कीमत। तब केवल यही पूरे जीवन भर का प्रयास होकर रह  जाता है कि कैसे स्वय पर नियंत्रण रखा जाए। और ऐसे ही करते हुए मृत्यु को पाया जाए। नियंत्रण करने का प्रयास ही तुम्हारी सारी जीवन-ऊर्जा को सोख लेता है और ऐसे ही तुम मृत्यु को प्राप्त हो जाते हो।

क्रोध सुन्दर है, सेक्स भी सुन्दर है, पर सुन्दर चीजें भी कुरूप हो सकती हैं। यह तुम पर निर्भर है। अगर तुम इसका तिरस्कार करते हो—तब वे कुरूप हो जाती हैं। और यदि तुम उनका रूपांतरण करते हो, तब वे दिव्य हो जाती हैं।

नियंत्रण नहीं, किसी अन्य पर अभिव्यक्ति भी नहीं, केवल और अधिक सजगता—तब चेतना परिधि से केन्द्र पर आ जाती है।

ओशो, एंड दि फ्लॉवर शॉवर्ड, तीसरा प्रवचन

 

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