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OSHO Times Emotional Ecology चिंउटी लेना बंद करो

चिंउटी लेना बंद करो

खुद के बारे में  बहुत अधिक सोचना संभवत: सबसे बड़ी  बीमारी है। तुम प्रसन्न नहीं हो सकते, तुम जीने का मज़ा नहीं ले सकते। तुम कैसे ले सकते हो मज़ा? भीतर इतनी समस्याएं हैं! समस्याएं ही समस्याएं हैं और दूसरा कुछ नहीं! -- और समाधान कोई नजर नहीं आता। क्या करें? तुम विक्षिप्त हो जाते हो। भीतर हर कोई विक्षिप्त है।  

तुम भी यदा-कदा पागल होते हो -- इसीलिए क्रोध पैदा होता है: क्रोध आकस्मिक पागलपन है।  यदि तुम यदा-कदा इसे बाहर निकलने का मौका नहीं देते हो, तुम इतना अधिक इकट्ठा कर लोगे कि यह यह फूट पड़ेगा, तुम विक्षिप्त हो जाओगे। लेकिन यदि तुम लगातार  इसकी चिंता करते रहे तो तुम विक्षिप्त हो ही चुके हो।

यह मेरा निरीक्षण रहा है कि जो लोग ध्यान, प्रार्थना, सत्य को खोजने में लगे हैं, वे अन्य लोगों की अपेक्षा पगलपन के लिए अधिक उपलब्ध हैं। और इसका कारण है: ऐसे लोग खुद से बहुत अधिक मतलब रखते हैं, अधिक अहंकार-केंद्रित, लगातर यह और वह सोचते रहते, यह रुकावट वह रुकावट, यह क्रोध, वह दुख, सिर-दर्द, पीठ-दर्द, पेट-दर्द, टांगें... वे लगातर भीतर ही लगे रहते हैं। वे कभी ठीक नहीं रहते, नहीं रह सकते, क्योंकि शरीर का दायरा बड़ा है और तमाम प्रक्रियाएं चलती रहती हैं।

यदि कुछ न हो तो भी वे चिंतित होते हैं: कुछ क्यों नहीं हो रहा है? और तुरंत वे कुछ न कुछ पैदा कर लेते हैं क्योंकि यह उनकी स्थाई आदत, धंधा बन जाता है: अन्यथा वे खोया हुआ महसूस करते हैं। क्या करें? कुछ भी नहीं हो रहा है! यह कैसे संभव है कि मुझे कुछ नहीं हो रहा है? वे अपने अहंकार को तभी महसूस कर सकते हैं जब कुछ हो रहा हो -- चाहे वह अवसाद, दुख, क्रोध या बीमारी ही क्यों न हो, लेकिन यदि कुछ हो रहा हो तो ठीक है, वे खुद को महसूस कर सकते हैं।

 क्या तुमने बच्चों को देखा है? यह महसूस करने के लिए कि वे हैं, खुद को चिंउटी काटते है। वह बचपना तुम्हारे भीतर भी मौजूद है -- तुम भी चिंउटी काटना पसंद करते हो यह देखने के लिए कि तुम हो या नहीं। वे कहते हैं कि एक बहादुर आदमी एक बार मरता है और कायर लाखों बार मरते हैं -- क्योंकि वे चिंउटी काटते हैं और महसूस करते हैं कि वे मृत हैं या नहीं।

तुम्हारी बीमारी तुम्हारे अहंकार को कायम रखने में तुम्हारी मदद करती है।

तुम महसूस करते हो कि कुछ हो रहा है -- वास्तव में यह प्रसाद नही है, आनंद नहीं है, अपितु अवसाद है और  कोई भी इतना दुखी नहीं जितना मैं', और 'कोई भी इतना अवरुद्ध नहीं जितना मैं' और 'किसी आदमी को इतना ज्यादा सिर-दर्द नहीं जितना मुझे।' तुम खुद को बड़ा महसूस करते हो, दूसरे छोटे हैं।

यदि तुम खुद के बारे में बहुत अधिक सोचते हो, याद रखो, तुम मंज़िल पर पहुंच नहीं सकते। यह अधिक मतलब रखना तुम्हें अवरुद्ध कर देगा, और रास्ता तुम्हारी आंखों के सामने साफ है। तुम्हें अपनी आंखें खोलनी हैं, उन्हें बंद नहीं करनी हैं।

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