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OSHO Times Emotional Ecology जिसे आप ध्यान कह रहे हैं, उसमें और आटो-हिप्नोसिस में, आत्म-सम्मोहन में क्या फर्क है?

जिसे आप ध्यान कह रहे हैं, उसमें और आटो-हिप्नोसिस में, आत्म-सम्मोहन में क्या फर्क है?

वही फर्क है, जो नींद में और ध्यान में है। इस बात को भी समझ लेना उचित है। नींद है प्राकृतिक रूप से आई हुई, और आत्म-सम्मोहन भी निद्रा है प्रयत्न से लाई हुई। इतना ही फर्क है। हिप्नोसिस में-हिप्नोस का मतलब भी नींद होता है-हिप्नोसिस का मतलब ही होता है तंद्रा, उसका मतलब होता है सम्मोहन। एक तो ऐसी नींद है जो अपने आप आ जाती है, और एक ऐसी नींद है जो कल्टीवेट करनी पड़ती है, लानी पड़ती है।

अगर किसी को नींद न आती हो, तो फिर उसको लाने के लिए कुछ करना पड़ेगा। तब एक आदमी अगर लेटकर यह सोचे कि नींद आ रही है, नींद आ रही है, नींद आ रही है...मैं सो रहा हूं, मैं सो रहा हूं, मैं सो रहा हूं...तो यह भाव उसके प्राणों में घूम जाए, घूम जाए, घूम जाए, उसका मन पकड़ ले कि मैं सो रहा हूं, नींद आ रही है, तो शरीर उसी तरह का व्यवहार करना शुरू कर देगा। क्योंकि शरीर कहेगा कि नींद आ रही है तो अब शिथिल हो जाओ। नींद आ रही है तो श्वासें कहेंगी कि अब शिथिल हो जाओ। नींद आ रही है तो मन कहेगा कि अब चुप हो जाओ। नींद आ रही है, इसका वातावरण पैदा अगर कर दिया जाए भीतर, तो शरीर उसी तरह व्यवहार करने लगेगा। शरीर को इससे कोई मतलब नहीं है। शरीर तो बहुत आज्ञाकारी है।

अगर आपको रोज ग्यारह बजे भूख लगती है, रोज आप खाना खाते हैं ग्यारह बजे और आज घड़ी में चाबी नहीं भर पाए हैं और घड़ी रात में ही ग्यारह बजे रुक गई है और अभी सुबह के आठ ही बजे हैं और आपने देखी घड़ी और देखा कि ग्यारह बज गए हैं, एकदम पेट कहेगा भूख लग आई। अभी ग्यारह बजे नहीं हैं, अभी तीन घंटे हैं बजने में। लेकिन घड़ी कह रही है कि ग्यारह बज गए हैं, पेट एकदम से खबर कर देगा कि भूख लग आई है। क्योंकि पेट की तो यांत्रिक व्यवस्था है। ग्यारह बजे रोज भूख लगती है। तो ग्यारह बज गए तो भूख लग आई है, पेट खबर कर देगा। पेट बिलकुल खबर कर देगा कि भूख लग आई है। अगर रोज रात बारह बजे आप सोते हैं और अभी दस ही बजे हैं और घड़ी ने बारह के घंटे बजा दिए, घड़ी के घंटे देखकर आप फौरन पाएंगे कि तंद्रा उतरनी शुरू हो गई। क्योंकि शरीर कहेगा कि बारह बज गए, अब सो जाना चाहिए।

शरीर बहुत आज्ञाकारी है। और जितना स्वस्थ शरीर होगा, उतना ज्यादा आज्ञाकारी होगा। स्वस्थ शरीर का मतलब ही यह होता है, आज्ञाकारी शरीर। अस्वस्थ शरीर का मतलब होता है, जिसने आज्ञा मानना छोड़ दिया। अस्वस्थ शरीर का और कोई मतलब नहीं होता, इतना ही मतलब होता है कि आप आज्ञा देते हैं, वह नहीं मानता। आप कहते हैं, नींद आ रही है; वह कहता है, कहां आ रही है। आप कहते हैं, भूख लगी है; वह कहता है, बिलकुल नहीं लगी है। आज्ञा छोड़ दे, वह शरीर अस्वस्थ हो जाता है। आज्ञा मान ले, वह शरीर स्वस्थ है, क्योंकि वह हमारे अनुकूल चलता है, हमारे पीछे चलता है, छाया की तरह अनुगमन करता है। जब वह आज्ञा छोड़ देता है, तो बड़ी मुश्किल खड़ी हो जाती है।

तो हिप्नोसिस का मतलब, सम्मोहन का मतलब इतना है कि शरीर को आज्ञा देनी है और उसको आज्ञा में ले आना है।

हमारी बहुत-सी बीमारियां ऐसी हैं, जो झूठी हैं, जो सच्ची नहीं हैं। सौ में से अंदाजन पचास बीमारियां बिलकुल झूठी हैं। दुनिया में जो इतनी बीमारियां बढ़ती जाती हैं, उसका कारण यह नहीं है कि बीमारियां बढ़ती जाती हैं। उसका कारण यह है कि आदमी का झूठ बढ़ता जाता है, तो झूठी बीमारियां बढ़ती चली जाती हैं। इसको ठीक से खयाल में ले लें। इधर रोज बीमारियां बढ़ रही हैं, इसका मतलब यह नहीं है कि बीमारियां बढ़ती जाती हैं। बीमारियों को क्या मतलब है कि आप शिक्षित हो गए हैं तो बीमारियां बढ़ जाएं, कि गरीबी कम हो गई है तो बीमारियां बढ़ जाएं। कम होनी चाहिए बीमारियां। नहीं, आदमी के झूठ बोलने की क्षमता बढ़ती चली जाती है। तो आदमी दूसरों से ही झूठ नहीं बोलता, अपने से भी झूठ बोल लेता है। वह बीमारियां भी पैदा कर लेता है।

अगर समझ लें कि एक आदमी को बाजार जाने में कठिनाई है, दिवाला निकलने के करीब है। और उसका मन यह मानने को राजी नहीं होता कि वह दिवालिया हो सकता है। और बाजार में जाने की हिम्मत नहीं होती, दुकान पर कैसे जाए। जो देखता है, वही पैसे मांगता है। अचानक वह आदमी पाएगा कि उसको ऐसी बीमारी ने पकड़ लिया है, जिसने उसे बिस्तर पर लगा दिया। यह क्रियेटेड बीमारी है। यह उसके चित्त ने पैदा कर ली है। इस बीमारी के पैदा होने से दोहरे फायदे हो गए। एक फायदा यह हो गया कि अब वह कह सकता है कि मैं बीमार हूं, इसलिए नहीं आता हूं। उसने अपने को भी समझा लिया और दूसरों को भी समझा दिया। अब इस बीमारी को किसी इलाज से ठीक नहीं किया जा सकता है। क्योंकि यह बीमारी होती तो इलाज काम करता। यह बीमारी नहीं है, इसलिए इसको जितनी दवाइयां दी जाएंगी, यह और बीमार पड़ता जाएगा।

अगर कभी दवाइयां देने से आपकी बीमारी ठीक न हो, तो आप जान लेना कि बीमारी दवाइयों वाली नहीं है। बीमारी कहीं और है, जिसका दवाई से कोई संबंध नहीं है। आप दवाई को गाली देंगे और कहेंगे कि सब डाक्टर मूर्ख हैं, इतनी चिकित्सा कर रहे हैं और मेरा इलाज नहीं होता। और आयुर्वेद से लेकर नेचरोपैथी तक, और एलोपैथी से होम्योपैथी तक चक्कर लगाएंगे, कहीं भी कुछ नहीं होगा। कोई डाक्टर आपके काम नहीं पड़ सकता, क्योंकि डाक्टर आथेंटिक बीमारी, प्रामाणिक बीमारी को ही ठीक कर सकता है। झूठी बीमारी पर उसका कोई वश नहीं है। और मजा यह है कि जो झूठी बीमारी है, उसको पैदा आप करने में रसलीन हैं। आप चाहते हैं कि वह रहे।

स्त्रियों की बीमारियां पचास प्रतिशत से भी ऊपर झूठी हैं। क्योंकि स्त्रियों को बचपन से एक नुस्खा पता चल गया है कि जब वे बीमार होती हैं, तभी प्रेम मिलता है, और कभी प्रेम मिलता ही नहीं। जब बीमार होती हैं, तब पति दफ्तर छोड़कर उनके पास कुर्सी लगाकर बैठ जाता है। मन में कितनी ही गालियां देता हो, लेकिन बैठता है। और पति को जब भी उन्हें बिस्तर के पास बिठा रखना हो, तब उनका बीमार हो जाना एकदम जरूरी है। इसलिए स्त्रियां बीमार ही रही आएंगी। कोई मौका ही नहीं जब वे बीमार न हों, क्योंकि बीमारी में ही वे कब्जा कर लेती हैं, सब पर वे हावी हो जाती हैं। बीमार आदमी घर भर का डिक्टेटर हो जाता है, बीमार आदमी तानाशाह हो जाता है। वह कहता है, इस वक्त सब रेडियो बंद, तो सब रेडियो बंद करने पड़ते हैं। वह कहता है, सब सो जाओ, तो सबको सोना पड़ता है। वह कहता है, आज घर के बाहर कोई नहीं जाएगा, सब यहीं बैठे रहो, तो सबको बैठना पड़ता है। तो तानाशाही प्रवृत्ति जितनी होगी, उतना आदमी बीमारी खोज रहा है। क्योंकि बीमार आदमी को कौन दुखी करे! अब वह जो कहता है, मान लो। जब ठीक हो जाएगा, तब ठीक है।

लेकिन बड़ा खतरा है। हम इस तरह उसकी बीमारी को उकसावा दे रहे हैं। अच्छा है कि पत्नी जब स्वस्थ हो, तब पति पास बैठे। यह समझ में आता है। बीमार हो, तब तो कृपा करके दफ्तर चला जाए। क्योंकि उसकी बीमारी को उकसावा न दे। महंगा है यह। बच्चा जब बीमार पड़े तो मां को उसकी बहुत फ़िक्र नहीं करनी चाहिए, नहीं तो बच्चा जिंदगी भर जब भी फ़िक्र चाहेगा, तभी बीमार पड़ेगा। जब बच्चा बीमार पड़े, तब उसकी फ़िक्र कम कर देनी चाहिए एकदम। ताकि बीमारी और प्रेम में संबंध न जुड़ पाए, एसोसिएशन न हो पाए। यानी बच्चे को ऐसा न लगे कि जब मैं बीमार होता हूं तब मां को मेरे पैर दबाने पड़ते हैं, सिर दबाना पड़ता है। जब बच्चा खुश हो, प्रसन्न हो, तब उसके पैर दबाओ, सिर दबाओ, ताकि खुशी से प्रेम का संबंध जुड़े।

हमने दुख से प्रेम का संबंध जोड़ा है। और यह बहुत खतरनाक है। तब उसका मतलब यह है कि जब भी प्रेम की कमी होगी, तब दुख बुलाओ। तो दुख आएगा तो प्रेम भी पीछे से आएगा। इसलिए जिनको भी प्रेम कम हो जाएगा, वे बीमार हो जाएंगे, क्योंकि बीमारी से उनको फिर प्रेम मिलता है।

लेकिन बीमारी से कभी प्रेम नहीं मिलता, ध्यान रहे, बीमारी से दया मिलती है। और दया बहुत अपमानजनक है। प्रेम बात और है। लेकिन वह हमारे खयाल में नहीं है। तो मैं आपसे यह कह रहा हूं कि शरीर तो हमारे सुझाव पकड़ लेता है। अगर हमें बीमार होना है, तो बेचारा शरीर बीमार हो जाता है। ऐसी बीमारियों को दूर करने के लिए हिप्नोसिस उपयोगी है, सम्मोहन उपयोगी है। उसका मतलब यह है कि झूठी बीमारी है, झूठी दवा से काम होगा। सच्ची दवा काम नहीं करेगी। तो अगर हमने मान लिया है कि हम बीमार हैं तो अगर इससे विपरीत हम मानना शुरू कर दें कि हम बीमार नहीं हैं, तो बीमारी कट जाएगी। क्योंकि बीमारी हमारे मानने से पैदा हुई थी। इसलिए हिप्नोसिस बड़ी कीमती चीज है। और आज तो विकसित मुल्कों में ऐसा कोई बड़ा अस्पताल नहीं है, जहां एक हिप्नोटिस्ट न हो, जहां एक सम्मोहन करने वाला व्यक्ति न हो। अमेरिका के या ब्रिटेन के बड़े अस्पतालों में डाक्टरों के साथ एक हिप्नोटिस्ट भी रख दिया है। क्योंकि बीमारियां पचासों ऐसी हैं जिनके लिए डाक्टर बिलकुल बेकार है, तो उनके लिए हिप्नोटिस्ट काम में आता है। वह उनको बेहोश करना सिखाता है कि तुम बेहोश हो जाओ और यह भाव करो कि तुम ठीक हो रहे हो, तुम ठीक हो रहे हो। क्या आपको पता है कि दुनिया में सौ सांपों में सिर्फ तीन प्रतिशत सांपों में जहर होता है, सत्तानबे प्रतिशत सांपों में कोई जहर ही नहीं होता। लेकिन कोई भी सांप काटे, आदमी मर जाएगा। बिना जहर वाले सांप से भी आदमी मर जाता है।

इसीलिए मंत्र-तंत्र काम कर पाते हैं। मंत्र-तंत्र यानी झूठा इलाज। अब एक आदमी को ऐसे सांप ने काटा है जिसमें जहर है ही नहीं। अब इसको सिर्फ इतना विश्वास दिलाना जरूरी है कि सांप उतर गया। बस, काफी है! सांप उतर जाएगा। सांप चढ़ा ही नहीं है। और अगर इसको यह विश्वास न आए तो यह आदमी मर सकता है। अगर इसको यह पक्का बना रहे कि सांप ने मुझे काटा है, तो यह मरेगा। सांप ने मुझे काटा है, इससे मरेगा, सांप के काटने से नहीं।

मैंने सुना है, एक बार ऐसी घटना घटी कि एक आदमी एक सराय से गुजरा। और रात उस सराय में उसने खाना खाया और सुबह चला गया, जल्दी उठकर चला गया। साल भर बाद वापस लौटा उस रास्ते से, उसी सराय में ठहरा। तो सराय के मालिक ने कहा, आप सकुशल हैं? हम तो बड़े डर गए थे। उसने कहा, क्या हो गया? जिस रात आप यहां ठहरे थे, जो खाना बना था, उसमें एक सांप गिर गया था। तो चार आदमियों ने खाया, चारों मर गए। एक आप थे, जो आप जल्दी उठकर चले गए। आपके लिए हम बड़े चिंतित थे। मगर आप जिंदा हैं! उस आदमी ने कहा, सांप? और वह आदमी वहीं गिर पड़ा और मर गया, साल भर बाद। उसने कहा, सांप खा गया हूं! उसके हाथ-पैर कंपे, वह वहीं गिर पड़ा। उस सराय के मालिक ने कहा, घबराइए मत, अब तो कोई सवाल ही नहीं! पर वह आदमी तो गया, तब तक जा चुका है।

इस तरह की बीमारी के लिए हिप्नोसिस बहुत उपयोगी है। लेकिन हिप्नोसिस का मतलब ही इतना है कि जो हमने व्यर्थ ही, झूठा ही अपने चारों तरफ जोड़ लिया है, उसे हम दूसरे झूठ से काट सकते हैं। ध्यान रहे, अगर झूठा कांटा किसी के पैर में लगा हो, तो असली कांटे से कभी मत निकालना। झूठे कांटे को असली कांटे से निकालने में बड़ा खतरा होगा। एक तो झूठा कांटा न निकलेगा और असली कांटा और पैर में छिद जाएगा। झूठे कांटे को झूठे कांटे से ही निकालना होता है।

ध्यान में और हिप्नोसिस में क्या संबंध है? इतना ही संबंध है कि जहां तक झूठे कांटे गड़े हैं, वहां तक हिप्नोसिस का उपयोग किया जाता है। जैसे कि मैं आपसे कहता हूं, यह भाव करें कि शरीर शिथिल हो रहा है। यह हिप्नोसिस है, यह सम्मोहन है, यह आत्म-सम्मोहन है।

असल में आपने ही यह भाव कर रखा है कि शरीर शिथिल नहीं हो सकता है। उसको काटने के लिए इसकी जरूरत है, और कोई जरूरत नहीं है। अगर आपको यह पागलपन न हो, तो आप एक ही दफे खयाल करें कि शरीर शिथिल हो गया, शरीर शिथिल हो जाएगा। शरीर को शिथिल करने के लिए यह काम नहीं हो रहा है। आपकी जो धारणाएं हैं कि शरीर शिथिल होता ही नहीं है, उसको काटने के लिए आपके मन में यह धारणा बनानी पड़ेगी कि शरीर शिथिल हो रहा है, शरीर शिथिल हो रहा है, शरीर शिथिल हो रहा है। आपकी झूठी धारणा को इस दूसरी झूठी धारणा से काट दिया जाएगा। और जब शरीर शिथिल हो जाएगा तो आप जानेंगे कि हां, शरीर शिथिल हो गया है। और शरीर का शिथिल होना बिलकुल स्वाभाविक धर्म है। लेकिन हम इतने तनाव से भर गए हैं और तनाव हमने इतना पैदा कर लिया है कि अब उस तनाव को मिटाने के लिए भी हमें कुछ करना पड़ेगा।

तो हिप्नोसिस का इतना उपयोग है। जो आप भाव करते हैं, शरीर शिथिल हो रहा है, श्वास शांत हो रही है, मन शांत हो रहा है, यह हिप्नोसिस है। लेकिन यहीं तक। इसके बाद ध्यान शुरू होता है। यहां तक ध्यान है ही नहीं। ध्यान इसके बाद शुरू होता है, जब आप जागते हैं, जब आप द्रष्टा हो जाते हैं। जब आप देखने लगते हैं कि हां, शरीर शिथिल पड़ा है, श्वास शांत चल रही है, विचार बंद हो गए हैं या विचार चल रहे हैं। जब आप देखने लगते हैं, बस आप सिर्फ देखने लगते हैं। वह जो द्रष्टा-भाव है, वही ध्यान है। उसके पहले तो हिप्नोसिस ही है। और हिप्नोसिस का मतलब है लाई गई निद्रा, और कोई मतलब नहीं है। नहीं आती थी, हमने लाई है। प्रयास किया है, उसे बुलाया है, आमंत्रित किया है। निद्रा आमंत्रित की जा सकती है। अगर हम तैयार हो जाएं और अपने को छोड़ दें, तो वह आ जाती है।

लेकिन ध्यान और हिप्नोसिस एक ही चीज नहीं हैं। मेरी बात समझ लेना खयाल से। मैंने कहा कि यहां तक हिप्नोसिस है, यहां तक सम्मोहन है, जहां तक सब भाव कर रहे हैं हम। जब भाव करना बंद किया और जाग गए, अवेयरनेस जहां से शुरू हुई, वहां से ध्यान शुरू हुआ। जहां से द्रष्टा, साक्षी-भाव शुरू हुआ, वहां से ध्यान शुरू हुआ। और इस हिप्नोसिस की इसलिए जरूरत है कि आप उलटी हिप्नोसिस में चले गए हैं। यानी इसको अगर वैज्ञानिक भाषा में कहना पड़े, तो यह हिप्नोसिस न होकर डि-हिप्नोसिस है। यह सम्मोहन न होकर, सम्मोहन तोड़ना है। सम्मोहित हम हैं। पर हमें पता नहीं है। क्योंकि जिंदगी में हम सम्मोहित हो गए हैं। हमें पता ही नहीं है, हमको खयाल ही नहीं है कि हमने कितने तरह के सम्मोहन कर लिए हैं, और हमने किस-किस तरकीब से सम्मोहन को पैदा कर लिया है।
 

ओशो: मैं मृत्यु सिखाता हूं, # 6