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OSHO Times Emotional Ecology क्रांति यानी आनंद

पहला भाग:

यह मनुष्य की समस्याओं में सब से क्लिष्ट समस्या है। इसे गहरे में सोचना होगा, और यह किताबी बात नहीं है। इसका संबंध आपसे है। हर व्यक्ति इसी तरह का व्यवहार कर रहा है। सदा गलत ही चुनने का, सदा उदास, अवसाद से भरे हुए, दुखी रहने का व्यवहार। इसके गहरे कारण रहे होंगे और हां, कारण हैं।

पहली बात, व्यक्ति की परवरिश की उसके जीवन में बहुत बड़ी भूमिका है। अगर आप दुखी हैं तो उससे आपको कुछ मिलता है। अगर आप प्रसन्न है तो आप कुछ खोते हैं।

शुरुआत में ही एक सचेत बच्चा इस अंतर को समझने लगता है। वह जब भी दुखी होता है, हर व्यक्ति उससे सहानुभूति जतलाता है, उसे सहानुभूति मिलती है। हर व्यक्ति उससे प्रेमपूर्ण होने का प्रयास करता है, उसे प्रेम मिलता है। और इससे भी अधिक :वह जब भी उदास होता है, हर व्यक्ति उसकी ओर ध्यान देता है उसे सभी का ध्यान मिलता है। और यह ध्यान अहंकार की खुराक है। बल्कि यूं कहें कि यह एक नशा है। यह आपको बल देता है। और आप सोचते हैं कि आप कुछ हो। तभी अपनी ओर ध्यान आकर्षित करने की इतनी आवश्यकता, इतनी प्रबल इच्छा रहती है।

अगर हर व्यक्ति आपको देख रहा है, आप बड़े हो जाते हैं, अगर आपकी ओर कोई ध्यान नहीं देता तो आपको लगता है जैसे आप हैं ही नहीं, आप नहीं रहे, आप नाकुछ हो गए। लोगों का आपकी ओर ध्यान देने का अर्थ है कि वे आपका ध्यान रखते हैं। इससे आपको बल मिलता है। अहंकार रिश्तों में जीता है। जितने अधिक लोग आपकी ओर ध्यान देंगे उतना आपका अहंकार बढ़ेगा। अगर कोई आपकी ओर नहीं देखता तो अहंकार विसर्जित हो जाता है। अगर कोई आपको भूल गया है तो अहंकार कैसे जिएगा? तो आपको कैसे लगेगा कि आप हैं। तभी तो समाज-संस्थाओं, क्लबों इत्यादि की जरूरत रहती है। क्ल्ब पूरे विश्व में मौजूद हैं, रोटरी, लायंस, मेसोनिक....लाखों क्लब, लाखों ग्रुप, सोसायटी व क्लब केवल इसलिए हैं कि जिन व्यक्तियों की ओर कभी ध्यान न जा सका उनको ध्यान मिल सके।

किसी देश का राष्ट्रपति होना तो संभव नहीं है, हां कोर्पोरेशन का मेयर तो हुआ ही जा सकता है। लायंस क्लब का प्रेसिडेंट होना आसान है। तब विशेष समूह आपकी ओर ध्यान देता है। आप बड़े महान हो जाते हैं-बिना कुछ किए। लायंस क्लब, रोटरी क्लब ..बिना कुछ भी किए और फिर भी वे सोचते हैं कि वे कुछ हैं। प्रेसिडेंट बदलते रहते हैं, एक इस वर्ष, दूसरा अगले वर्ष। हरेक को ध्यान मिलता है, यह एक परस्पर व्यवस्था है, और हर कोई महान महसूस करता है।

शुरू में ही बच्चा यह चालाकी समझ जाता है, और यह चालाकी है: दुखी दिखो, तो सहानुभूति मिलेगी, बीमार दिखो तो तुम महान हो जाओगे। एक बीमार बच्चा तानाशाही दिखाता है, पूरा परिवार उसकी बात मानता है। वह जो भी कहे वह नियम है।

जब वह प्रसन्न होता है तो उसकी कोई नहीं सुनता, जब वह स्वस्थ है तो कोई उसकी ओर ध्यान नहीं देता, जब वह बिलकुल ठीक है, कोई भी उसकी ओर ध्यान नहीं देता, तो शुरू से ही हम दुखी, उदास निराशावादी व जीवन का अंधकारमय छोर चुनते हैं। यह तो हुई एक बात।

इससे संबंधित दूसरी बात है: जब भी आप प्रसन्न होते हैं जब भी आप उल्लासपूर्ण होते हैं, जब भी आप भाव-विभोर व आनंदित होते हैं, हर कोई आपसे ईर्ष्या करता है। ईर्ष्या का अर्थ है कि हर व्यक्ति आपके विरोध में है, कोई भी आपका मित्र नहीं है इस घड़ी, हर कोई आपका दुश्मन है। तो आपने अब तक सीखा है कि आनंदविभोर न हुआ जाए क्योंक़ि हर कोई आपसे दुश्मनी निभाएगा--तो हंसे क्यों, आनंदित क्यों हों?

लोगों को देखें जब वे हंसते हैं, वे बहुत संभल कर हंसते हैं। यह हंसी पेट से नहीं उठती, यह उनके भीतर से नहीं आती। पहले वे आपकी ओर देखेंगे फिर निरीक्षण करेंगे.. और तब हंसेंगे। और उनके हंसने की भी एक सीमा है, एक हद तक आप उसे सहेंगे, उस हद तक जहां तक आप बुरा नहीं मानते जहां तक आप ईर्ष्यालु नहीं होते।

यहां तक कि हमारी मुस्कान भी झूठी है। हंसी तो गायब हो चुकी है, प्रसन्नता का कहीं भी पता नहीं, और आनंदित हो जाना तो लगभग असंभव है, क्योंकि उसकी तो आज्ञा ही नहीं है। अगर आप दुखी हैं तो कोई आपको पागल नहीं कहेगा। अगर आप आनंदित हैं और नाच रहे हैं तो हर कोई आपको पागल समझेगा। नृत्य तो नकारा गया है, गाना स्वीकृत नहीं । एक आनंदपूर्ण व्यक्ति...हमें लगता है कि कहीं कुछ गड़बड़ है।

यह कैसा समाज है? अगर कोई दुखी है तो सब ठीक है, वह स्वीकृत है क्योंकि पूरा समाज कम या ज्यादा दुखी ही है। वह हमारे समाज का सदस्य है, हमारा हिस्सा है। अगर कोई आनंदित होता है तो हम सोचते हैं कि उसका दिमाग खराब हो गया है, वह पागल हो गया है। वह हमारा हिस्सा नहीं है..और हम ईर्ष्या से भर जाते हैं।

पश्चिम में पूरा समाज नशीली दवाओं के विरोध में है। कानून प्रशासन, न्याय-विद, उच्च न्यायालय, विधायक ,पंडित पुरोहित हर कोई उनके विरोध में जा रहा है। वे वास्तव में नशीली दवाओं के विरोध में नहीं है, वे लोगों के आनंदित होने के विरोध में हैं। वे शराब के विरोध में नहीं, वे उन सब चीजों के विरोध में नहीं जिन्हें ड्रग्स कहते हैं लेकिन वे उन सभी नशीली वस्तुओं के विरोध में हैं जो आपके भीतर रासायनिक बदलाव लाती है। और एक पुरानी पर्त जो समाज ने आपके आस-पास निर्मित की है, दुख की एक पर्त, उसे तोड़ा जा सकता है, एक नया द्वार खुल सकता है। आप इससे बाहर आ सकते हैं-- चाहे कुछ पलों के लिए ही सही-- और आनंदित हो सकते हैं। समाज आनंदपूर्ण होने की आज्ञा नहीं देता। आनंद एक क्रांति है। मैं एक बार फिर दोहराता हूं: आनंद एक महा क्रांति है। अगर लोग आनंदित होने लगते हैं तो पूरे समाज को बदलना होगा, क्योंकि समाज तो दुख के ऊपर खड़ा है। अगर लोग प्रसन्न हैं तो आप उन्हें युद्ध में नहीं धकेल सकते-वियतनाम, मिस्त्र, इजरायल, बिलकुलनहीं। कोई जो आनंद से भरा है एकदम हंसेगा और कहेगा -यह क्या बकवास है!

अगर लोग आनंदित हैं तो वे धन से आविष्ट न हो पाएंगे। वे धन इकट्‌ठा करने में जीवन नहीं गंवाएंगे। यह उन्हें पागलपन जैसा लगेगा कि कोई व्यक्ति मृत धन के बदले में अपना पूरा जीवन बर्बाद कर रहा है, मर रहा है। और धन इकट्ठा कर रहा है। और धन यहीं रह जाएगा जब वह मरेगा। यह सरासर पागलपन है। मगर यह पागलपन तब तक दिखाई नहीं दे सकता जब तक आप आनंदित नहीं होते। अगर लोग आनंदित हैं तो समाज का पूरा ढांचा बदल जाएगा। यह समाज दुख पर जीता है। दुख समाज का बहुत बड़ा निर्वेश है। तो हम बच्चों को पालते हैं.. शुरू से ही हमारा झुकाव दुख की ओर रहता है। तभी तो वे दुख चुनते हैं।

हर सुबह व्यक्ति के लिए एक चुनाव है। हर सुबह ही नहीं, हर पल व्यक्ति के पास यह चुनाव है कि वह दुखी हो या प्रसन्न। आप दुखी होना ही चुनते हैं क्योंकि इसमें आपका निर्वेश है। आप सदा दुखी होना चुनते हैं क्योंकि वह आपकी आदत आपका ढांचा हो चुका है। आपने सदा यही किया है। आप यह करने में कुशल हो गए हैं, यह आपकी बंधी-बंधाई लकीर हो चुका है। जिस घड़ी भी आपका मन चुनाव करता है, इसका बहाव दुख की ओर ही जाता है।

दुख का मार्ग सुगम दिखाई देता है और आनंद का मार्ग दुर्गम। आनंद कठिन लगता है मगर ऐसा है नहीं। वास्तविकता इससे विपरीत है।आनंद का मार्ग सुगम है, दुख का मार्ग दुर्गम। दुख को हासिल करना कठिन है परंतु आपने ऐसा कर दिखाया है, आपने तो असंभव कर दिखाया है..क्योंकि दुख प्रकृति विरोधी है। कोई भी व्यक्ति दुखी होना नहीं चाहता और प्रत्येक व्यक्ति दुखी है।

समाज ने बहुत महान कार्य किया है-शिक्षा, संस्कृति, संस्कारित करने वाली एजंसियां , मात-पिता शिक्षक सभी ने बहुत बड़ा काम किया है। उन्होंने आनंदपूर्ण सर्जकों को दुखी जीवों में परिवर्तित कर दिया है। हर बच्चा आनंदित पैदा होता है। हर व्यक्ति दिव्य पैदा होता है और हर व्यक्ति पागल होकर मरता है।

जब तक आप पुन: स्वस्थ नहीं होते, जब तक आप पुन: अपने बचपन को पुन: प्राप्त नहीं करते, आप कभी भी वे सफेद बादल नहीं हो सकते, जिनकी मैं चर्चा कर रहा हूं। आपकी समूची साधना यही होनी चाहिए कि अपने बचपन में कैसे लौटा जाए, उसे फिर से कैसे पाया जाए। अगर आप फिर से बच्चे हो जाते हैं तो फिर कोई दुख शेष नहीं रह जाता।

मैं ऐसा नहीं कहता कि बच्चे के लिए दुख की घड़ियां नहीं होतीं--अवश्य होती है। मगर फिर भी दुख नहीं होता। इसे समझने की कोशिश करें। बच्चा दुखी हो सकता है, वह अप्रसन्न हो सकता है, किसी एक घड़ी में अत्यंत दुखी हो सकता है मगर वह उस दुख में इतना समग्र हो जाता है, दुख से उसका इतना एकात्म हो जाता हि कि कहीं कोई अलगाव ही नहीं। दुख के अतिरिक्त बच्चा कहीं नहीं है। बच्चा अपने दुख को अपने से अलग बंटा हुआ नहीं देख रहा, बच्चा दुख ही हो गया है। वह इसमें इतना डूब गया है। जब आप दुख के साथ एक हो जाते हैं तो दुख, दुख नहीं रह जाता। अगर आप दुख के साथ इतने जुड़ जाते हैं तो उसका अपना ही एक सौंदर्य होता है।

तो एक बच्चे को देखें, मेरा अभिप्राय है, एक निर्दोष बच्चे को -अगर वह क्रोध में है तो उसकी पूरी ऊर्जा क्रोध बन जाती हैं, पीछे कुछ नहीं बचता, कोई पकड़ नहीं। वह अपने स्थान से हटा और क्रोध हो गया; उसे कोई चला नहीं रहा , नियंत्रित नहीं कर रहा। पीछे कोई मन नहीं है। बच्चा क्रोध हो गया है। वह क्रोधित नहीं हो गया है। और तब उसका सौंदर्य देखें, क्रोध के खिलने का सौंदर्य। यहां तक कि क्रोध में भी वह सुंदर दिखाई देता है। वह और अधिक जोशीला, और अधिक ताजगीपूर्ण और अधिक प्राणवान दिखाई देता है। जैसे एक लावा हो- फूटने को तैयार। इतना छोटा बच्चा इतनी ऊर्जा, ऐसा आणविक अंतस, संपूर्ण ब्रह्मांड में विस्फोट करनेवाला!

और इस क्रोध के बाद बच्चा चुप हो जाएगा, इस क्रोध के बाद बच्चा बहुत शांत हो जाएगा, इस क्रोध के बाद बच्चा शिथिल हो जाएगा। हम भले ही सोचें कि ऐसे क्रोध में होना बच्चे के लिए बहुत दुखदायी है। मगर उसके लिए यह सब आनंदपूर्ण रहा। अगर आप किसी भी चीज के साथ एक हो जाते हैं तो आप आनंदपूर्ण हो जाते हैं। जब आप किसी भी चीज से अपने को अलग कर लेते हो वह भले ही सुख क्यों न हो, बाद में आप दुखी हो जाओगे। तो यही गुर है। अहंकार के सपने को अलग करना दुख का आधार है; और जीवन जो भी आपके लिए लाए उसके साथ एक होना, उसके साथ बहना उसमें पूरी त्वरा से पूरी समग्रता से होना कि आप नहीं बचे, आप खो गए, तो हर चीज आनंदपूर्ण है।

चुनाव आपके हाथ में है,मगर आप तो चुनाव के प्रति भी अनभिज्ञ हैं। आप निरंतर गलत का चुनाव इस प्रकार करते रहे हैं कि यह एक जड़ आदत हो गई है। जो आप बिना सोचे-समझे चुन लेते हो। कोई और चुनाव करते ही नहीं।

जागरुक बनें। जिस घड़ी भी आप दुखी होने का चुनाव करते हैं तो सोचें कि यह आपका ही चुनाव है, इतनी सोच इतना होश भी आपकी मदद करेगा कि चुनाव भी आपका है और जिम्मेवारी भी आपकी है और यह सब आप अपने लिए कर रहे हैं। और यह आपका ही कृत्य है। आप अचानक एक बदलाव महसूस करेंगे। मन की गुणवत्ता बदल चुकी होगी। तो प्रसन्नता की ओर कदम बढ़ाना आपके लिए और आसान हो जाएगा।

एक बार आप जान गए कि यह आपका ही चुनाव है, तो पूरी बात एक खेल जैसी हो जाती है। तब अगर आप दुखी होने में सुख लेते हैं तो अवश्य लें मगर इतना स्मरण रहे कि चुनाव आपका है। तो शिकायत मत करें। कोई दूसरा इसके लिए जिम्मेदार नहीं है। यह आपकी ही रचना है। अगर आप इसी ढंग को पसंद करते हैं, दुखी ढ़ंग को पसंद करते हैं और अपने जीवन को दुखी होकर ही काटना चाहते हैं तो यह आपका ही चुनाव, आपकी ही रचना है। आप ही इसमें अपनी भूमिका निभा रहे हैं। तो शौक से निभाएं ।

तब दूसरे लोगों के पास पूछने मत जाएं कि दुखी हुए बिना कैसे जीयें! वह बेतुकी बात है। किन्हीं गुरुओं के पास यह पूछने मत जाएं कि दुखी हुए बिना कैसे जीयें। तथा-कथित गुरु इसीलिए हैं क्योंकि आप मूढ़ हैं। दुख आप पैदा करते हैं और यह पूछने के लिए दूसरों के पास जाते हैं कि दुखी कैसे न हों। और आप दुख को निर्मित करते चले जाते हैं क्योंक़ि आपको होश ही नहीं है कि आप क्या कर रहे हैं। तो इसी पल से प्रयास करें कि सुखी व आनंदित कैसे हुआ जाए।

 

ओशो, माइ वै दि वै ऑफ दि वाइट क्लाउड्स,, प्र # 3
 
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