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OSHO Times Emotional Ecology परिपक्व व्यक्ति के गुण

परिपक्व व्यक्ति के गुण

परिपक्व व्यक्ति के क्या गुण हैं?

परिपक्व व्यक्ति के गुण बड़े विचित्र हैं|
सर्वप्रथम, वह व्यक्ति नहीं होता| वह अब एक अहंकार नहीं है| उसकी उपस्थिति है, किन्तु वह व्यक्ति नहीं है|
दूसरा, वह बच्चे जैसा अधिक होता है... सरल और निर्दोष|

इसीलिए मैंने कहा कि एक परिपक्व व्यक्ति के गुण बड़े विचित्र हैं, क्योंकि परिपक्वता ऐसा आभास देती है जैसे की वह अनुभवी हो गया है, जैसे कि वह आदमी बूढ़ा होता है| शारीरिक दृष्टि से वह बूढ़ा हो सकता है, मगर आत्मिक दृष्टि से वह एक निर्दोष बालक होता है| उसकी परिपक्वता मात्र जीवन से इकठ्ठा किया गया अनुभव नहीं है| फिर वह बच्चा नहीं होगा, और फिर वह एक उपस्थिति नहीं होगा; वह एक अनुभवी व्यक्ति होगा — ज्ञानवान किन्तु परिपक्व नहीं|

परिपक्वता का तुम्हारे जीवन के अनुभवों से कोई संबंध नहीं है| उसका संबंध तुम्हारी अंतर्यात्रा से होता है, भीतर के अनुभव|
जितना अधिक वह अपने भीतर जाता है, उतना अधिक परिपक्व वह होता है| जब वह अपनी चेतना के केंद्र पर पहुंच गया है, तो वह पूर्णतया परिपक्व होता है| किन्तु उस क्षण व्यक्ति लुप्त हो जाता है, और मात्र उपस्थिति बचती है|

अहंकार लुप्त हो जाता है, मात्र मौन बचता है|
ज्ञान लुप्त हो जाता है, मात्र निर्दोषता बचती है|

मेरे लिए, परिपक्वता आत्मानुभूति का दूसरा नाम है: तुम अपनी क्षमता के चरम पर आ गए हो, वह वास्तविक हो गई है| बीज एक लम्बी यात्रा से लौटा है, और खिल गया है|

परिपक्वता की एक सुगंध होती है| यह व्यक्ति को एक विराट सौंदर्य प्रदान करती है| यह प्रज्ञा देती है, जो भी सबसे तीक्ष्ण प्रज्ञा संभव है वह| यह उसको मात्र प्रेम बना देती है| उसका कर्म प्रेम होता है, उसका अकर्म प्रेम होता है; उसका जीवन प्रेम होता है, उसकी मृत्यु प्रेम होती है| वह मात्र प्रेम का एक पुष्प होता है|

पश्चिम के पास परिपक्वता की परिभाषाएं हैं जो बहुत बचकानी हैं| पश्चिम का अर्थ परिपक्वता से यह है कि तुम अब निर्दोष नहीं रहे, कि तुम जीवन के अनुभवों से पक गए हो, कि तुम्हें आसानी से धोखा नहीं दिया जा सकता, कि तुम्हारा शोषण नहीं किया जा सकता, कि तुम्हारे भीतर कुछ सशक्त पत्थर जैसा है —एक रक्षा कवच, एक सुरक्षा|

यह परिभाषा बहुत साधारण है, बहुत सांसारिक| हां, संसार में तुम इस प्रकार के परिपक्व लोग पाओगे| मगर जिस प्रकार मैं परिपक्वता को देखता हूं वह पूर्णतया भिन्न है, इस परिभाषा का चरम विपरीत| परिपक्वता तुम्हें एक सुदृढ़ पत्थर नहीं बनाएगी; यह तुम्हें अति कोमल, अति भेद्य, अति सरल बनाएगी|

मुझे स्मरण आता है... एक चोर एक सदगुरु की झोंपड़ी में घुसा| पूर्णिमा की रात थी, और ग़लती से वह प्रवेश कर गया था; अन्यथा, एक सदगुरु के घर में तुम्हें क्या मिलेगा? चोर देख रहा था, और आश्चर्यचकित हुआ कि वहां कुछ नहीं था| और अचानक उसने एक आदमी को आते देखा जो हाथ में एक मोमबत्ती लेकर आ रहा था|

आदमी ने कहा,' तुम अंधेरे में क्या खोज रहे हो? तुमने मुझे उठाया क्यों नहीं? मैं मुख्य द्वार के पास ही सोया था, और मैंने तुम्हें पूरा मकान दिखा दिया होता|' और आदमी इतना सरल और निर्दोष दिख रहा था, जैसे कि वह समझ ही नहीं सकता कि कोई चोर भी हो सकता है!

उसकी सरलता और निर्दोषता के समक्ष, चोर ने कहा,'शायद आप नहीं जानते कि मैं एक चोर हूं|'

गुरु ने कहा,' उससे फर्क नहीं पड़ता, हर किसी को कुछ होना होता है| बात यह है कि मैं मकान में तीस वर्षों से हूं और मुझे कुछ नहीं मिला है, तो चलो हम मिल कर ढूंढते हैं! और यदि हमें कुछ मिलता है, तो हम साझेदार हो जाएंगे| मुझे इस घर में कुछ नहीं मिला है; यह मात्र रिक्त है|

चोर थोड़ा डरा: आदमी विचित्र मालूम होता है| या तो यह पागल है या...कौन जाने किस प्रकार का आदमी है यह? वह जाना चाहता था, क्योंकि वह दूसरे दो घरों से कुछ वस्तुएं लाया था जो उसने मकान के बाहर छोड़ दी थीं|

गुरु के पास मात्र एक कंबल था — मात्र यही उसके पास था — और ठंडी रात थी, तो उसने चोर से कहा, 'इस तरह से मत जाओ, मुझे इस तरह से अपमानित मत करो, अन्यथा मैं कभी भी स्वयं को क्षमा नहीं कर पाऊंगा, कि मेरे घर एक निर्धन व्यक्ति आया, मध्य रात्रि, और उसे खाली हाथ जाना पड़ा| यह कंबल ले जाओ| और यह अच्छा रहेगा — बाहर बहुत ठण्ड है| मैं घर के भीतर हूं; यहां अधिक गर्म है|'
उसने चोर को अपने कंबल से ढंक दिया| चोर का सर चकराने लगा! उसने कहा,'तुम क्या कर रहे हो? मैं एक चोर हूं!'

गुरु ने कहा,' उससे फर्क नहीं पड़ता| इस संसार में हर किसी को कुछ ना कुछ होना होता है, कुछ करना होता है| तुम चोरी कर रहे होंगे; उससे फर्क नहीं पड़ता, व्यवसाय व्यवसाय है| बस इसको अच्छे ढंग से करो, मेरे सारे आशीष तुम्हारे साथ हैं| इसको उत्तमता से करो, पकड़े मत जाओ नहीं तो तुम समस्या में पड़ोगे|'

चोर ने कहा,' आप विचित्र हैं| आप नग्न हैं और आपके पास कुछ नहीं है!' गुरु ने कहा,'चिंता मत करो, क्योंकि मैं तुम्हारे साथ आ रहा हूं! मात्र यह कम्बल मुझे घर में रखे हुए था; अन्यथा इस घर में कुछ नहीं है — और कम्बल मैंने तुम्हें दे दिया है| मैं तुम्हारे साथ आ रहा हूं — हम साथ रहेंगे| ऐसा प्रतीत होता है तुम्हारे पास बहुत सी वस्तुएं हैं; यह अच्छी साझेदारी रहेगी| मैंने अपना सर्वस्व तुम्हें दे दिया है| तुम मुझे थोडा दे सकते हो; यह अच्छा रहेगा|'

चोर इस पर विश्वास नहीं कर सका! वह उस स्थान से और उस व्यक्ति से भी भागना चाहता था| उसने कहा,' नहीं, मैं आपको अपने साथ नहीं ले जा सकता| मेरी पत्नी हैं, बच्चे हैं, और मेरे पड़ोसी, वे क्या कहेंगे?— 'तुम एक नग्न आदमी लाए हो!''

उसने कहा, ' यह सही है| मैं तुम्हे किसी शर्मनाक परिस्थिति में नहीं लाऊंगा| तो तुम जा सकते हो, मैं इस घर में रहूंगा|' और जब चोर जा रहा था, गुरु चिल्लाया, 'सुनो! वापस आओ!' चोर ने ऐसी शक्तिशाली आवाज़ कभी न सुनी थी; वह छुरी की तरह भेद गई| उसको वापस आना पड़ा| गुरु ने कहा,' विनम्रता के कुछ तरीके सीखो| मैंने तुम्हें कम्बल दिया है और तुमने मुझे धन्यवाद भी नहीं दिया| तो पहले, मुझे धन्यवाद दो; यह तुम्हें बहुत सहायता करेगा| दूसरा, बाहर जा कर — तुमने भीतर आते समय द्वार खोला था — द्वार बंद कर दो! क्या तुम देख नहीं सकते की रात ठंडी है, और क्या तुम देख नहीं सकते कि मैंने तुम्हें कम्बल दे दिया है और मैं नग्न हूं? तुम्हारा चोर होना ठीक है, किन्तु जहां तक शिष्टाचार का प्रश्न है, मैं एक कठिन व्यक्ति हूं| मैं इस प्रकार का व्यवहार बर्दाश्त नहीं कर सकता| कहो धन्यवाद!'
चोर को कहना पड़ा,' धन्यवाद श्रीमान!' और उसने दरवाज़ा बंद कर दिया और भाग गया| वह विश्वास नहीं कर सका जो घटा था! वह पूरी रात नहीं सो सका| बार-बार उसे स्मरण आता रहा.. उसने ऐसी शक्तिशाली आवाज़ कभी नहीं सुनी थी, इतना ओज| और उस व्यक्ति के पास कुछ नहीं था!

उसने अगले दिन जानकारी निकाली और पाया कि वह एक महान गुरु था| उसने अच्छा नहीं किया था| यह एकदम वीभत्स था कि वह उस निर्धन व्यक्ति के पास गया; उसके पास कुछ नहीं था| किन्तु वह एक महान गुरु था|

चोर ने कहा,' यह मैं स्वयं समझ सकता हूं — कि वह एक विचित्र प्रकार का व्यक्ति है| अपने जीवन में मैं अनेक प्रकार के व्यक्तियों से संपर्क में आता रहा हूं, सबसे निर्धन व्यक्तियों से लेकर सबसे धनवान व्यक्तियों तक, किन्तु कभी भी..... उसको याद करके भी, मेरे शरीर में झुरझुरी आ जाती है|

' जब उसने मुझे वापस बुलाया, मैं भाग नहीं सका| मैं पूर्णतया स्वतन्त्र था, मैं वस्तुएं लेकर भाग सकता था, मगर मैं नहीं जा सका| उसकी आवाज़ में कुछ ऐसा था जिसने मुझे वापस खींच लिया|'
कुछ महीनों बाद चोर पकड़ा गया, और कचहरी में न्यायधीश ने उससे पूछा,' क्या तुम कोई व्यक्ति बता सकते हो जो तुम्हें इस क्षेत्र में जानता हो?'
उसने कहा, ' हां एक व्यक्ति मुझे जानता है'.. और उसने गुरु का नाम बताया|

न्यायाधीश ने कहा,' यह पर्याप्त है — गुरु को बुलाओ| उसका वक्तव्य दस हज़ार व्यक्तियों के मूल्य का है| जो वह तुम्हारे बारे में कहेगा पर्याप्त होगा निर्णय देने के लिए|
न्यायाधीश ने गुरु से पूछा, ' क्या आप इस व्यक्ति को जानते हैं?'

उसने कहा, ' जानता हूं? हम साझेदार हैं| यह मेरा मित्र है| यह मुझसे मिलने एक रात मध्य रात्रि भी आया था| बाहर बहुत ठण्ड थी और मैंने इसे अपना कम्बल दिया| यह उसे उपयोग कर रहा है, आप देख सकते हैं| यह कम्बल सारे देश में प्रसिद्ध है; सब जानते हैं कि यह मेरा है|'

न्यायाधीश ने कहा, ' यह आपका मित्र है? और क्या यह चोरी करता है?'
गुरु ने कहा,' कभी नहीं! यह कभी चोरी नहीं कर सकता| यह इतना सज्जन है कि जब मैंने इसको अपना कम्बल दिया इसने मुझ से कहा, 'धन्यवाद श्रीमान'| जब यह घर से बाहर गया, इसने चुपचाप द्वार बंद कर दिया| यह बहुत विनम्र, अच्छा व्यक्ति है|'

न्यायाधीश ने कहा,' यदि तुम ऐसा कहते हो, तो सारे गवाहों के बयान जिन्होंने कहा है कि यह चोर है, मैं रद्द करता हूं| इसको मुक्त किया जाता है|' गुरु बाहर चला गया और चोर ने उसका पीछा किया|
गुरु ने कहा, ' तुम क्या कर रहे हो? तुम मेरे साथ क्यों आ रहे हो?'

उसने कहा,' अब मैं आपको कभी नहीं छोड़ सकता| आपने मुझे अपना मित्र कहा है, आपने मुझे अपना साझेदार कहा है| किसी ने भी मुझे कोई सम्मान नहीं दिया है| आप पहले व्यक्ति हैं जिन्होंने कहा है कि मैं एक सज्जन व्यक्ति हूं, एक अच्छा व्यक्ति हूं| मैं आपके चरणों में बैठ कर सीखूंगा कि आपके जैसा कैसे हुआ जाए| आपने यह परिपक्वता कहां से पाई, यह शक्ति, यह ओज, यह चीज़ों को बिलकुल भिन्न रूप से देखना?'

गुरु ने कहा, ' क्या तुम जानते हो उस रात मुझे कितना बुरा लगा? तुम जा चुके थे; बहुत ठण्ड थी| कम्बल के बिना सोना असंभव था| मैं खिड़की के पास बैठ कर पूर्णिमा के चांद को देख रहा था, और मैंने एक कविता लिखी:'यदि मैं धनी होता तो मैंने उस ग़रीब व्यक्ति को यह पूर्ण चन्द्रमा दे दिया होता, जो अंधेरे में एक निर्धन व्यक्ति के घर में कुछ खोजने आया था| मैंने चांद दे दिया होता, यदि मैं इतना धनवान होता, किन्तु मैं स्वयं निर्धन हूं|' मैं तुम्हें कविता दिखाऊंगा, मेरे साथ आओ|'

' मैं उस रात रोया, कि चोरों को कुछ चीज़ें सीखनी चाहिएं| कम से कम उन्हें एक या दो दिन पहले सूचना दे देनी चाहिए जब वे मेरे जैसे व्यक्ति के पास आएं, तो हम कुछ व्यवस्था कर लें, ताकि वे खाली हाथ न जाएं|'

'यह अच्छा हुआ कि तुमने मुझे कचहरी में याद किया, नहीं तो वे लोग खतरनाक हैं, वे तुम्हारे साथ दुर्व्यवहार कर सकते थे| मैंने तुम्हें उसी रात न्यौता दिया था तुम्हारे साथ आने का और तुम्हारा साझेदार बनने का, किन्तु तुमने मना कर दिया| अब तुम चाहते हो.. कोई समस्या नहीं है, तुम आ सकते हो| जो भी मेरे पास है, मैं तुमसे बांट लूंगा| किन्तु यह कोई पदार्थ नहीं है: यह कुछ अदृश्य है|'
चोर ने कहा,' यह मैं महसूस कर सकता हूं; यह कुछ अदृश्य है| किन्तु आपने मेरा जीवन बचाया है, और अब यह आपका है| जो कुछ भी आप इसका बना सकते हैं, बना लीजिये| मैं मात्र इसको बर्बाद करता रहा हूं| आपको देख कर, आपकी आंखों में देख कर, एक बात निश्चित है — की आप मुझे रूपांतरित कर सकते हैं| मैं प्रेम में पड़ गया हूं उसी रात से|'

परिपक्वता मेरे लिए एक आध्यात्मिक घटना है|”

ओशो, बियोंड साइकोलॉजी , Talk #37

 
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