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OSHO Times Emotional Ecology हैपीनेस: सायकॉलॉजिकल हैलीटोसिस

हैपीनेस: सायकॉलॉजिकल हैलीटोसिस

तुम्हारे दुख से तादात्म्य होने के तमाम कारण हैं। अपने दुख का मात्र अवलोकन करो, निरीक्षण करो और तुम खोजने में समर्थ हो पाओगे कि कारण क्या हैं। और तब उन क्षणों को देखो जब यदा-कदा तुमने आनंदित होने का आनंद लिया था। और फिर देखो, दोनों में क्या फर्क है। यह कुछ चीजें ध्यान में आएंगी...

जब तुम दुखी हो, तुम एक समझौतावादी होते हो।

समाज इसे पसंद करता है, लोग तुम्हारा आदर करते है, तुम अधिक सम्मानित समझे जाते हो, यहां तक कि तुम एक तथाकथित संत भी हो सकते हो; इसीलिए तुम्हारे सभी संत दुखी होते हैं। यह दुख पूरी तरह से उनके चेहरों पर, उनकी आंखों में लिखा हुआ है। क्योंकि वे दुखी हैं, वे सभी सुखों के विरूद्ध हैं। वे सभी सुखों की निंदा करते हैं, वे सुखों की हर संभावना को पाप के रूप में देखते हैं व उसकी निंदा करते हैं। वे दुखी हैं, और वे पूरे संसार को दुखी देखना पसंद करते हैं। वास्तव में केवल दुखी संसार में ही वे महात्मा समझे जा सकते हैं। एक सुखी संसार में उन्हें अस्पताल में भरती किया जाएगा, उनका मानसिक इलाज किया जाएगा। वे मानसिक रूप से बीमार हैं।

तुम अपने दुखों के अंदर झांको और तुम कुछ मूलभूत चीजें वहां पाओगे। एक: इससे तुम्हें आदर मिलता है। लोग तुम्हारे प्रति अधिक मित्रवत, अधिक सहानुभूतिपूर्ण मालूम पड़ते हैं। यदि तुम अधिक दुखी हो तो तुम्हें अधिक मित्र मिल जाएंगे।

यह विचित्र संसार है, इसमें कुछ मूलभूत गलती है। ऐसा नहीं होना चाहिए; प्रसन्न आदमी के अधिक मित्र होने चाहिए। परंतु यदि तुम प्रसन्न हो, लोग तुम्हारे प्रति ईर्ष्या से भर जाएंगे, वे अब मित्रवत नहीं होंगे। वे ठगे मसूस करेंगे, तुम्हारे पास कुछ है जो उन्हें उपलब्ध नहीं है। तुम प्रसन्न क्यों हो? इसलिए सदियों से हमने एक सूक्ष्म तंत्र सीख लिया है: प्रसन्नता को दबाओ और दुख को प्रकट करो। यह हमारा दूसरा स्वभाव हो गया है। मेरे संन्यासी को इस पूरे तंत्र को गिरा देना है। तुम्हें यह सीखना है कि कैसे प्रसन्न रहें, और तुम्हें प्रसन्न लोगों का आदर करना सीखना है और तुम्हें प्रसन्न लोगों की ओर अधिक ध्यान देना सीखना है, इसे याद रखो। यह मनुष्यता की महान सेवा है।

दुखी लोगों के प्रति बहुत अधिक सहानुभूति प्रकट न करो।

यदि कोई दुखी है तो उसकी सहायता करो, परंतु सहानुभूति प्रकट मत करो। उसे यह धारणा न दो कि दुख कुछ महत्वपूर्ण है। उसे अच्छी तरह आभास होने दो कि तुम  उसकी सहायता कर रहे हो, इसमें कुछ आदर जैसा नहीं है, यह केवल इसलिए कि तुम दुखी हो। और तुम और कुछ नहीं कर रहे हो मात्र उसे दुख से बाहर लाने का प्रयास कर रहे हो, क्योंकि दुख एक कुरुपता है। उस व्यक्ति को यह आभास होने दो कि दुख कुरुपता है, कि दुखी होना कोई धार्मिक गुण नहीं है, कि तुम मानवता की कोई बड़ी सेवा नहीं कर रहे हो।
प्रसन्न रहो, प्रसन्नता का आदर करो, और लोगों को यह समझने में सहयोगी बनो कि प्रसन्नता जीवन का लक्ष्य है: सच्चिदानंद
पूरब के मनीषियों ने ईश्वरत्व के तीन गुण कहे हैं। वह सत है: सत्य है, होना है। वह चित है: होशपूर्ण होना है, सजगता है। और आखिर में, उच्चतम शिखर है आनंद: परमानंद।
जहां भी आनंद है, वहीं ईश्वरत्व है।
जब भी तुम किसी आनंदपूर्ण व्यक्ति को देखो, उसका आदर करो, वह पवित्र है।
और जहां कहीं भी किसी समूह को देखो जो आनंदित हो, उत्सवपूर्ण हो, उस स्थान को पवित्र स्थान समझो।
हमें पूरी तरह एक नई भाषा सीखनी होगी, सिर्फ तभी इस पुरानी सड़ी हुई मानवता को बदला जा सकता है। हमें स्वास्थ्य की, पूर्णता की, प्रसन्नता की भाषा सीखनी होगी।
यह कठिन है क्योंकि पुराने से हमारा लगाव अधिक है।
इसीलिए प्रसन्न होना इतना कठिन है और दुखी होना इतना आसान है।

ओशो, द बुक आफ विसडम प्रवचन =20