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OSHO Times Emotional Ecology जब सपना टूटता है

जब सपना टूटता है

अधिकतर लोगों को तुमसे ईर्ष्या होनी चाहिए। यह जानने पर कि सब समाप्त हो गया है, एक नयी यात्रा का शुभारंभ है।

यह जानने पर कि "सब समाप्त हो गया है," एक नयी खोज का शुभारंभ है, कुछ ऐसा, जो कभी खोता नहीं
जब संसार व उसकी सफ़लताओं के सब भ्रम मिट जाते हैं तभी आध्यात्मिकता का जन्म होता है।

अभी भले ही तुम्हें इसका बोध न हो परंतु उदासी के इस पटल के पीछे से कुछ स्पंदित हुआ है, एक प्रसन्नता उभर रही है-- एक नयी खोज का उल्लास, एक नया उत्साह, एक नया जीवन, स्वयं की सत्ता को पाने की एक राह।

" कहीं भी मुझे इसका अंत दिखाई नहीं देता--याकि इसका कोई अंत है ही नहीं?"

मन का एक प्रारंभ है और अंत भी; अहंकार का प्रारंभ है और अंत भी, परंतु तुम्हारी ओर न कोई प्रारंभ है न कोई अंत। और अस्तित्व के रहस्य का कोई प्रारंभ नहीं, कोई अंत नहीं।

यह सतत प्रक्रिया है। रहस्य पर रहस्य तुम्हारी राह देख रहे हैं, फिर आगे है प्रफ़ुल्लता व आनंद।

आनंदित हों कि जीवन अंतहीन है, कि जब तुम एक शिखर तक पहुंचते हो, दूसरा शिखर तुम्हें चुनौतियां देने लगता है-- और अधिक ऊंचाई, और अधिक कठिन आरोहण, अधिक जोखम-भरा शिखर। और जब तुम दूसरे शिखर पर पहुंच जाते हो तो एक और शिखर प्रारंभ हो जाता है। यह जीवन की शाश्वत हिमालय- श्रंखला है।

बस, उस बिंदु पर सोचो जहां तुम पहुंचे हो और अब कुछ नहीं बचा तो तुम बुरी तरह ऊब जाओगे।
तब यही ऊब तुम्हारा भाग्य बन जाएगी। और जीवन ऊब नहीं, उल्लास है, आह्लाद है।

बहुत घटनाएं घट रही हैं और बहुत सी घटने वाली हैं। रहस्य का कोई अंत नहीं, हो ही नहीं सकता। तभी तो यह रहस्य कहलाता है, इसे जाना नहीं जा सकता। यह कभी ज्ञान नहीं बन सकता, तभी तो यह रहस्य कहलाता है; इसमें कुछ ऐसा है जो सदा छलता है।

और वही जीवन का सुख है। जीवन की गरिमा इसी में है कि तुम सदा तलाश में, खोज में संलग्न हो। जीवन अन्वेषण है, दुस्साहस है।

आनंद हमारा स्वभाव है; आनंदित न होना बस असंभव जैसा है।
आनंदित होना नैसर्गिक है, स्वाभाविक है। और आनंदित होने के लिये किसी परिश्रम की आवश्यकता नहीं, दुखी होने के लिये परिश्रम अनिवार्य है।

तभी तो तुम इतने थके हुए दिखते हो। क्योंकि दुख सच में बहुत बडा परिश्रम है; इसे बनाए रखना बहुत दुष्कर कार्य है। क्योंकि तुम स्वभाव के विपरीत जा रहे हो। तुम्हारा बहाव ऊपर की ओर है और यही दुख है।

और आनंद क्या है? धारा के साथ बहना-- और तो और, तुम्हारा व नदी का भेद ही मिट जाता है। तुम नदी हो जाते हो। यह कठिन कैसे हो सकता है? नदी के साथ-साथ बहने में तैरने की कोई आवश्यकता नहीं है; तुम केवल नदी के साथ तिरते हो और नदी तुम्हें सागर तक ले जाती है।

जीवन नदी है। इससे लड़ो मत, तुम दुखी नहीं होओगे।

द बुक ऑफ़ विज़्डम