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OSHO Times The Other: Myself मनुष्य की अमानवीयता

मनुष्य की अमानवीयता

लोग एक दूसरे से इस तरह व्यवहार क्यों करते हैं? क्या यह सिर्फ आदत वश है या कि मनुष्य में ऐसा कुछ है जो उसे भटकने पर बाध्य करता है?

यह दोनों है।

एक तो, मनुष्य में ही कुछ ऐसा है जो उसे भटकाता है। और दूसरे,ऐसे लोग हैं जो  मनुष्य को भटकाना चाहते हैं। दोनों मिलकर एक झूठा, नकली आदमी तैयार करते हैं। उसका हृदय प्रेम के लिए तरसता है लेकिन उसका संस्कारित मन उसे प्रेम से वंचित रखता है।
यह समस्या है। बच्चा पैदा होता है ऐसा हृदय लेकर जो प्रेम का प्यासा है। लेकिन उसके पास ऐसा मस्तिष्क भी
है।
समाज उसे हृदय के खिलाफ संस्कारित करना जरूरी है क्योंकि हृदय समाज के खिलाफ बगावत करेगा, वह हमेशा अपने ही रास्ते पर चलेगा।
उसे सैनिक नहीं बनाया जा सकता। वह कवि बन सकता है, गायक बन सकता है, वह एक नर्तक बन सकता है लेकिन सैनिक नहीं बन सकता।
वह अपनी वैयक्तिकता और स्वतंत्रता के लिए तकलीफ उठा सकता है, वह अपनी वैयक्तिकता और स्वतंत्रता के लिए मर सकता है लेकिन उसे गुलाम नहीं बनाया जा सकता। यह है हृदय की स्थिति।
लेकिन मन …बच्चा खाली मस्तिष्क लेकर आता है, बस एक यंत्र होता है जिसे तुम चाहो जैसा बना सकते हो।

वह वही भाषा सीखेगा जो तुम सिकहओगे, वह वही धर्म सीखेगा ज्से तुम सिखाओगे, वह वही नैतिकता सीखेगा जो तुम सिखाओगे। वह बस एक कम्यूटर है, तुम  बस जानकारी अंदर डाल दो।
प्रत्येक समाज फिक्र लेता है कि मन अधिक से अधिक मजबूत होता रहे ताकि अगर मन और हृदय में कोई संघर्ष हो तो मन जीते। लेकिन मन के ऊपर हृदय की हर जीत एक पीड़ा पैदा करती है। वह तुम्हारे स्वभाव के ऊपर विजय है, तुम्हारे अंतरतम के ऊपर विजय है,  स्वयं पर विजय है दूसरों की। और उन्होंने तुम्हारे मन को इस तरह प्रशिक्षित किया है कि तुम उनके उद्देश्य को सफल करो।

तो मन खाली है, वह मस्तिष्क है, उसमें तुम कुछ भी डाल सकते हो । और पच्चीस साल की शिक्षा के बाद तुम उसे इतना मजबूत करते हो कि हृदय को भूल ही जाते हो। तो तुम हमेशा दुखी रहोगे। सुख यह है कि केवल तुम्हारा हृदय ही तुम्हें खुशी दे सकता है , आनंद दे सकता है , तुमसे नृत्य करा सकता है।

मस्तिष्क गणीत तो हल कर सकता है लेकिन गीत नहीं गा सकता। ये मस्तिष्क की क्षमताएं ही नहीं हैं। तो तुम तुम्हारा स्वभाव जो कि तुम्हारा हृदय है और समाज जो कि तुम्हारे दिमाग में है, इनके बीच टूट जाते हो। और निश्चय ही  तुम, और सभी लोग इन दो केंद्रों के साथ पैदा होते हैं। यह कठिनाई है। 

और एक केद्र खाली है। एक बेहतर समाज में वह हृदय के अनुकूल इस्तेमाल किया जाएगा, हृदय की सेवा करेगा।
तन वह अपूर्व जीवन होगा, आनंद उत्सव से भरपूर। लेकिन अब तक हम एक कुरूप समाज में जीए हैं, सड़ी-गली अवधारणाओं के साथ। और यह कमजोरी है, मन का उपयोग किया जा सकता है।

अब कम्युनिस्ट उसे एक तरह से इस्तेमाल कर रहे हैं, फासिस्टों ने जर्मनी में अलग तरीके से इस्तेमाल किया। अन्य सभी धर्म उसे एक और ही तरीके से इस्तेमाल कर रहे हैं। लेकिन यह क्मजोरी हर व्यक्ति के साथ है कि तुम्हारे पास एक मन है जो तुम खाली ले आते हो।  वस्तुत: यह अस्तित्व का आशीष है  लेकिनगलत उपयोग किया गया है। यह तुम्हें इसलिए खाली दिया जाता है ताकि यह तुम्हारे हृदय का , तुम्हारी अभीप्साओं का सेवक बने। उसमें कुछ गलत नहीं है। लेकिन विश्व भर में निहित स्वार्थों ने इसे एक सुनहरे अवसर की भांति मन को हृदय के खिलाफ इस्तेमाल किया है। तो तुम दुखी बने रहते हो और वे लोग तुम्हारा जैसी मर्जी उपयोग कर सकते हैं।

 इसीलिए दुनिया इतनी दुखी है।

 हर कोई प्रेम करना चाहता है और हर कोई चाहता है कि कोई उससे प्रेम करे। लेकिन मन ऐसा अवरोध है कि न तो वह तुम्हें प्रेम करने देता है और न वह किसी को तुमसे प्रेम करने देता है । दोनों मामलों में  मन बीच में आता है और सब कुछ भ्रष्ट कर देता है।

 और अगर संयोग वशात तुम किसी व्यक्ति से मिलते भी हो जिससे तुम्हें प्रेम हो जाए और जो तुमसे प्रेम करे, तो भी तुम्हारे मन नहीं मिलेंगे। उन्हें अलग -अलग प्रणालियों ने प्रशिक्षित किया है , अलग धर्मों ने, अलग समाजों ने।  खुश रहना प्रत्येक का जन्मसिद्ध अधिकार है, लेकिन दुर्भाग्य वश समाज, लोग जिनके साथ तुम जीते आ रहे हो, जो हमें इस दुनिया में ले आए हैं उन्होंने इस बारे में कुछ सोचा नहीं है। वे जानवरों की तरह आदमियों को पैदा करते रहे हैं, उनसे भी बदतर क्योंकि जानवर कम से कम  संस्कारित तो नहीं हैं। यह संस्कार करने की प्रक्रिया पूरी तरह से बदलनी चाहिए। मन को हृदय का सेवक बनने के लिए तैयार करना जरूरी है।

 तर्क प्रेम की सेवा करे। और तब फिर जीवन एक दीपोत्सव बन सकता है।
 
ओशो, बियाण्ड सायकॉलॉजी