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Osho Books I Have Loved ईशावास्य उपनिषद

ईशावास्य उपनिषद

मालिक को घोषणा करने की जरूरत नहीं होनी चाहिए। मालिक अघोषित मालिक है। घोषणा सिर्फ नौकर करते हैं। जितने जोर से कोई घोषणा करता है, समझना कि उतना ही शक है। कोई जोर से कहे कि नहीं, मेरी है, तब आप पक्का समझ लेना कि इसकी नहीं हो सकती। घोषणा क्यों इतने जोर से की जा रही है?

घोषणा हम सदा ही, जो नहीं है हमारा, उसे सिद्ध करने के लिए करते हैं। परमात्मा घोषणा नहीं करता। किसके लिए घोषणा करे? क्यों घोषणा करे? व्यर्थ होगी घोषणा। घोषणा बताएगी कि नहीं है उसकी। नहीं, उसका ही है सब, जिसने कभी नहीं कहा। जिन-जिनने कहा है, उन-उन का बिलकुल नहीं है।

दूसरे के धन की वांछा मत करना, क्योंकि धन किसी का भी नहीं है, परमात्मा का है। न अपना मानना उसे, न दूसरे का मानना उसे। उसे जानना प्रभु का। और दूसरे भी उतने ही प्रभु के हैं जितने हम प्रभु के हैं। इसलिए छीन-झपट बेकार है। इसलिए छीन-झपट बेमानी है, अर्थहीन है, असंगत है। उसमें कोई युक्ति नहीं है। व्यर्थ की हम मेहनत कर रहे हैं। ऐसा श्रम उठा रहे हैं जो पानी में खींची गई लकीरों जैसा खो जाएगा।

और भी एक बात: तेन त्यक्तेन भुञ्जीथाः। कहा कि जो छोड़ते हैं, वे ही भोग पाते हैं।

नहीं, ऐसा हमारा जानना नहीं है। हम तो जानते हैं कि जो पकड़ते हैं, वे ही भोग पाते हैं। यह ऋषि उलटी बात कहता है। कहता है, जो छोड़ते हैं-तेन त्यक्तेन-वे ही भोग पाते हैं। बड़ी उलटी बात है। जो छोड़ देते हैं, वे ही भोग पाते हैं। जो नहीं मालिक बनते, वे ही मालिक बन जाते हैं। जिनकी कोई पकड़ नहीं, उनके हाथ में सब आ जाता है।

कुछ-कुछ ऐसा है जैसे कोई हवा को मुट्ठी में पकड़े। हवा को मुट्ठी में पकड़िए तब खयाल आएगा-तेन त्यक्तेन भुञ्जीथाः। पकड़िए मुट्ठी में जोर से, बांधिए मुट्ठी को-और हवा बाहर निकली। बांधते चले जाइए, आखिर में मुट्ठी ही रह जाएगी, हवा उसमें नहीं बचेगी। खोल दें मुट्ठी को, मत बांधें। और हवा बड़ी प्रगाढ़ होकर बहती है। खुली मुट्ठी में हवा होती है, बंद मुट्ठी में हवा खो जाती है। जिसने जितने जोर से बांधा, उतनी ही खाली हो जाती है। जिसने पूरी खोल दी, कभी खाली नहीं होती, सदा भरी होती है। और प्रतिपल ताजी हवाएं, प्रतिपल ताजी हवाएं भरती चली जाती हैं। कभी देखा, खुली मुट्ठी कभी खाली नहीं होती। बंधी मुट्ठी सदा खाली हो जाती है। कुछ थोड़ा-बहुत बच भी जाए तो गंदा और बासा और पुराना और जरा-जीर्ण हो जाता है। सड़ जाता है।
 

ईशावास्य उपनिषद पुस्तक से