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Osho Osho On Topics डायोजनीज

डायोजनीज

डायोजनीज

एक दिन, जब प्लेटो समुद्र किनारे सुबह की सैर पर निकला, उसने एक आदमी देखा। वो भोर का समय था, तब सूरज ऊगा नहीं था-- हल्का अंधियारा था। और वह समझ नहीं पा रहा था कि यह आदमी कौन था। यह आदमी डायोजनीज था और एक चम्मच में वह कुछ ला रहा था... वह समुद्र में जाता, चम्मच में पानी भरता--उसने रेत में एक छेद बनाया हुआ था--उसमे वो पानी डालता, और वापिस चला जाता।
 
प्लेटो ने वहां खड़े होकर उसे यह सब करते देखा। वह एक पागल आदमी की तरह जान पड़ता था। घड़ी भर के लिए उसने सोचा, "मुझे इसमें दखल नहीं देना चाहिए।" पर मन कुछ ऐसा ही होता है--वह  जाता है: "हो सकता है वो पागल ना हो; हो सकता है वह कुछ अर्थपूर्ण कर रहा हो और मैं इससे अवगत नहीं हूं। और यदि मैं उससे पूछ भी लूं तो इसमें बुराई क्या है?" तो उसने कहा, " मैं दखल देने के लिए माफी चाहता हूं। मैं तुम्हारे काम में कोई रुकावट नहीं डालना चाहता--जरूर तुम किसी महान कार्य में व्यस्त हो--परंतु तुम यह कर क्या रहे हो?"
 
डायोजनीज ने कहा, "मैं सागर खाली करने की कोशिश कर रहा हूं।"
 
प्लेटो ने कहा, "हे भगवान, इस चम्मच से?"
 
सूरज उग रहा था, डायोजनीज हंसने लगा और बोला , "प्लेटो, तुम कर क्या रहे हो?" तब प्लेटो ने डायोजनीज को पहचाना। वह नग्न ही रहता था, परंतु उस दिन उसने खुद को कपड़े से ढांका हुआ था, बस अपने आप को छिपाने के लिए ताकि प्लेटो उसे पहचान ना पाए। अन्यथा वह उसे टोकता ही नहीं।
 
प्लेटो बस अवाक रह गया था, वह जवाब नहीं दे सका। डायोजनीज ने कहा, "यही तो तुम भी करने की कोशिश कर रहे हो। तुम्हारा मन और कुछ नहीं बस एक चम्मच है और उसके द्वारा तुम सागर जैसे आस्तित्व को खाली करने की चेष्ठा कर रहे हो। मैं यह जो कर रहा हूं वो तुम्हे बस स्मरण दिलाने के लिए है... मुझे पता है कि यह संभव नहीं है। तुम्हें भी याद रखना चाहिए की तुम जो कुछ भी कर रहे हो वह मुमकिन नहीं है।
 
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