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Osho Osho On Topics जॉर्ज गुरजिएफ

जॉर्ज गुरजिएफ

जॉर्ज गुरजिएफ

गुरजिएफ कहता है, "तुम मात्र शरीर के और कुछ नहीं, और जब शरीर मरेगा तुम भी मरोगे। कभी एकाध दफा कोई व्यक्ति मृत्यु से बच पाता है--केवल वही जो अपने जीवन में आत्मा का सृजन कर लेता है मृत्यु से बचता है--सब नहीं। कोई बुद्ध; कोई जीसस, पर तुम नहीं। तुम बस मर जाओगे, तुम्हारा कोई निशान नहीं बचेगा।"
 
गुरजिएफ क्या करना चाह रहा था? वह तुम्हें तुम्हारी जड़ों से हिला रहा था; वह तुम्हारी हर तरह की सांत्वना और मूर्खता भरे सिद्धांत छीन लेना चाहता था जो तुम्हें खुद पर काम को स्थगित करने में सहायता करते हैं। अब यदि लोगों को यह बताना, "तुम्हारे पास कोई आत्मा नहीं है, तुम केवल भाजी तरकारी हो, फूलगोभी या फिर पत्तागोभी"-- फूलगोभी भी कॉलेज से शिक्षित एक पत्तागोभी है--" उससे अधिक कुछ भी नहीं।" वह वाकई में एक सर्वोत्कृष्ट सद्गुरु था। वह तुम्हारे पांव तले जमीन खींच रहा था। वह तुम्हें ऐसा झटके दे रहा था कि तुम्हें पूरी स्थिति के बारे में सोचना पड़ता: क्या तुम पत्तागोभी बन के रहना चाहते हो? वह तुम्हारे आस-पास ऐसी परिस्थिति खड़ी कर रहा था जिसमें तुम्हें आत्मा को पाने के लिए खोजबीन करनी पड़े, क्योंकि मरना कौन चाहता है?
 
और इस विचार ने कि आत्मा अमर है लोगों को बहुत सांत्वना दी है कि वे कभी मरेंगे नहीं, कि मृत्यु केवल एक झलक है, केवल एक लंबी नींद, एक शांतिप्रद नींद, और तुम फिर से जन्म लोगे। गुरजिएफ कहता है, "यह सब बकवास है, पूरी बकवास। मरे कि तुम हमेशा के लिए मरे--जब तक कि तुम आत्मा को निर्मित नहीं कर लेते..." 
 
अब अंतर देखें: तुम्हें कहा गया है कि पहले से ही एक आत्मा हो, और गुरजिएफ पूरी तरह से इसे बदल देता है। वह कहता है, "तुम पहले से आत्मा नहीं हो, परंतु एक संभावना मात्र हो। तुम इसका उपयोग कर सकते हो, या चूक सकते हो।"
 
और मैं तुम्हें बताना चाहूंगा कि गुरजिएफ केवल एक युक्ति का उपयोग कर रहा था। यह सच नहीं है। हर एक व्यक्ति आत्मा के साथ पैदा होता है। पर उन लोगों के साथ क्या किया जाए जो उसे सांत्वना की तरह प्रयोग करते आए हैं? कभी- कभी एक महान सद्गुरु को झूठ बोलना पड़ता है--और केवल एक महान सद्गुरु को ही झूठ बोलने का अधिकार है-- तुम्हें नींद से जगाने के लिए।
 
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गुरजिएफ की बहुत आलोचना हुई क्योंकि वह झूठा था--और झूठ सूफियों द्वारा आया; वह एक सूफी था। उसका शिक्षण सूफी आश्रमों और स्कूलों में हुआ था। और असल में, अपने समय में, पश्चिम में उसने सूफीवाद को एक नए रूप में शुरू किया था। परंतु तब एक साधारण ईसाई मन के लिए उसे समझ पाना असंभव था क्योंकि सत्य मूल्यवान है, और कोई सोच नहीं सकता कि कोई संबुद्ध सद्गुरु झूठ बोल सकता है।
 
क्या तुम सोच सकते हो कि जीसस झूठ बोलेंगे? और मुझे पता है कि उन्होंने झूठ कहा--लेकिन ईसाई इसके बारे में सोच भी नहीं सकते: "जीसस झूठ कह रहे हैं? नहीं, वे सबसे सच्चे व्यक्ति थे।" लेकिन फिर तुम्हें पता नहीं--ज्ञान का प्रश्न बहुत-बहुत खतरनाक होता है। उन्होंने बहुत सी बातों के बारें में झूठ बोला--एक सद्गुरु को बोलना पड़ता है, अगर वह तुम्हारी मदद करना चाहता है। अन्यथा, वह एक संत हो सकता है, लेकिन उसके द्वारा कोई मदद संभव नहीं। और बिना मदद किये एक संत मुर्दा होता है। और यदि कोई संत मदद नहीं कर सकता, उसके यहां होने का क्या फायदा? इसमें कोई अर्थ नहीं।जो कुछ भी वह जीवन से अर्जित कर सकता था, उसने कर लिया। वह मदद के लिए यहां है। 
 
गुरजिएफ की बहुत आलोचना हुई क्योंकि पश्चिम उसे समझ नहीं पाया, एक साधारण ईसाई मन उसे समझ नहीं पाया। तो पश्चिम में गुरजिएफ के बारे में दो तरह की सोच है। एक सोचता है कि वह एक बहुत ही शरारती व्यक्ति था--संत तो बिल्कुल नहीं, बस शैतान का अवतार। दूसरा कि वह एक महान संत था जिसके बारे में पश्चिम को पिछली कुछ सदियों से पता चला है। यह दोनों बातें सच हैं, क्योंकि वह बिल्कुल मध्य में था। वह एक 'po' व्यक्तित्व था। ना तो तुम उसके बारे में हां कह सकते हो और ना ही ना कह सकते हो। तुम कह सकते हो कि वह एक पवित्र पापी था, या फिर पापी संत। पर तुम विभाजन नहीं कर सकते, तुम उसके बारे में सरल नहीं हो सकते। जो ज्ञान उसे था वह बहुत ही जटिल था।
 
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गुरजिएफ कहता है: द्रष्टा को याद रखो--आत्म-स्मृति। बुद्ध कहते हैं: द्रष्टा को भूल जाओ बस दृश्य को देखो। यदि तुम्हें बुद्ध और गुरजिएफ में से किसी एक को चुनना पड़े, तो मैं कहूंगा बुद्ध को चुने। गुरजिएफ के साथ एक खतरा है की तुम अपने प्रति सचेत होने कि बजाय अपने प्रति संकोची हो सकते हो, तुम अहंकारी हो सकते हो। मैंने महसूस किया कि कई गुरजिएफ के शिष्यों में, वे अत्यधिक अहंकारी हो गए। ऐसा नहीं की गुरजिएफ अहंकारी था--वह अपने समय के गिने-चुने संबुद्ध व्यक्तियों में से एक था; परंतु उसकी इस विधि में एक खतरा है, स्वयं के प्रति सचेत होने में और आत्म-स्मृति में भेद करना अति कठिन है। यह इतना सूक्ष्म है कि इसमें भेद करना लगभग नामुमकिन है; अनजान लोगों के लिए यह लगभग पूरी संभावना है की उन्हें आत्म-संकोच घेर ले; यह आत्म-स्मृति नहीं होगी।
 
यह शब्द "आत्मा" खतरनाक है-- तुम आत्मा के विचार में ज्यादा से ज्यादा स्तिथ होने लगते हो। और आत्मा का ख्याल तुम्हें आस्तित्व से दूर कर देता है।
 
बुद्ध कहते हैं आत्मा को भूल जाओ, क्योंकि आत्मा है ही नहीं; आत्मा बस एक व्याकरण का शब्द है, भाषागत शब्द है--यह अस्तित्वगत नहीं है। तुम बस तत्व को गौर से देखो। तत्व को देखने पर, तत्व विलीन होने लगता है। जब तत्व विलीन हो जाता है, अपने क्रोध को देखो--और उस देखने में, तुम उसे विलीन होते हुए देखोगे--जैसे ही क्रोध विलीन होता है मौन आ जाता है। वहां कोई आत्मा नहीं होती, कोई देखने वाला नहीं बचता और ना ही कुछ देखने के लिए; तब मौन आता है। मौन विपस्सना द्वारा लाया जाता है, बुद्ध द्वारा दी गई जागरूकता की विधि।
 
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एक बूढ़ी औरत आस्पेंस्की से बहुत ज्यादा प्रभावित हो गई, और फिर वह गुरजिएफ से मिलने चली गई। केवल एक सप्ताह के भीतर वह लौट आई, और उसने आस्पेंस्की से कहा, "मुझे लगता है कि गुरजिएफ महान है, पर यह मुझे पक्का नहीं है कि वह अच्छा है या बुरा, कि वह शैतान है या संत। इसका मुझे पक्का नहीं है। वह महान है - इतना तो पक्का है। लेकिन वह एक महान शैतान, या एक महान संत हो सकता है - इसका पक्का नहीं है।" और गुरजिएफ ने इस तरह से व्यवहार किया कि वह का ऐसा प्रभाव छोड़े।
 
एलन वाट ने गुरजिएफ के बारे में लिखा है और उसे एक बदमाश संत कहा है--क्योंकि कभी-कभी वह एक बदमाश की तरह व्यवहार करता, पर वह सब एक अभिनय होता था और जानबूझ कर किया गया था, उन सब से बचने के लिए जो अनावश्यक समय और ऊर्जा ले लेते थे। ये सब उनको वापस भेजने के लिए किया गया था जो केवल तभी काम करते थे जब उन्हें पक्का हो। केवल उन्हें ही अनुमति दी जाती जो तब भी कर सकते जब भले जिन्हें गुरु के ऊपर भरोसा ना हो लेकिन खुद पर भरोसा होता।
 
और गुरजिएफ के प्रति समर्पण, तुम्हें रमण महर्षि के प्रति समर्पण की तुलना में ज्यादा रूपांतरित कर देगा, क्योंकि रमण महर्षि इतने सरल और इतने सीधे हैं कि वहां समर्पण कुछ अर्थ नहीं रखता। तुम उसके सिवा कुछ कर भी नहीं सकते। वे इतने खुले हैं--बिल्कुल एक बच्चे के सामान-- इतने पवित्र कि समर्पण घट ही जाएगा। किन्तु यह समर्पण रमण महर्षि की वजह से होगा, तुम्हारी वजह से नहीं। जहां तक तुम्हारा प्रश्न है इसके कोई मायने नहीं। यदि गुरजिएफ के प्रति तुम्हारा समर्पण होता, तब यह तुम्हारे कारण हुआ, क्योंकि गुरजिएफ किसी भी प्रकार से इसका समर्थन नहीं करने वाला।
 
बल्कि, वह इस में सब तरह की बाधाएं खड़ी करेगा। अगर तब भी तुम समर्पण कर देते हो, यह तुम्हें रूपांतरित कर देगा। तो उसके बारे में पूरी तरह से निश्चित होने की जरुरत नहीं--और यह असंभव है--किन्तु तुम्हें खुद के बारे में निश्चित होना जरुरी है।
 
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