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Osho Osho On Topics त्वरा

त्वरा

यह तुम्हारी त्वरा ही है जिसके द्वारा तुम पहुंचते हो। जब तुम्हारी सारी इच्छाएं, लालसाएं एक लपट बन जाती हैं, यह त्वरा होती है। जब तुम्हारे भीतर एकमात्र इच्छा बचती है और तुम्हारी सारी चेतना उसका समर्थन करे, यह त्वरा है। यह शब्द इन-टेन्सिटी ठीक यही बात कहता है। यह एक्स-टेन्सिटी का ठीक उल्टा है। तुम बाहर बिखरे हुए हो, तुम्हारे पास हजारों-हजार इच्छाएं हैं अनेक छोटी-छोटी इच्छाएं--एक उत्तर जाती, एक दक्षिण जाती। तुम चारों तरफ खींचे जा रहे हो। तुम एक नहीं हो, तुम भीड़ हो। और यदि तुम भीड़ हो तो तुम दुखी होओगे। यदि तुम भीड़ हो तो तुम कभी भी तृप्त नहीं महसूस करोगे। तुम्हारा कोई केंद्र नहीं है। त्वरा का मतलब होता है, स्वयं में केंद्र का निर्माण करना।

जब सारे तीर केंद्र की तरफ जाते हैं, जब सभी खंड एक साथ जुड़ जाते हैं, अखंडता पैदा होती है। केंद्रित होना, भीतर की ओर एकाग" होना, यह त्वरा का अर्थ है। कभी-कभी तुम ऐसे पल अनुभव करते हो, किसी खतरे के समय जब सारे विचार खो जाते हैं, भीड़ एक हो जाती है। उस क्षण में तुम एक व्यक्ति हो जाते हो, बिना बंटे हुए। तुम अविभक्त होओगे, एक इकाई। मौत का सामना तुम्हारे भीतर त्वरा पैदा करता है। या कभी-कभी प्रेम में त्वरा होती है। बाकी सब कुछ अप्रसांगिक हो जाता है, सतही। सिर्फ प्रेम सब कुछ हो जाता है और तुम्हारे हृदय की पूर्णता।

जब ऐसी त्वरा ध्यान में पैदा होती है, तो यह तुम्हें अंतिम तक ले जाता है। तुम घर आ जाते हो।