प्राय: पूछे जाने वाले प्रश्न

विचार की ऊर्जा भाव में कैसे रूपांतरित होती है?


चित्त की दो अवस्थाएं हैं। एक—आंदोलित, तरंगायित, चंचल; वही विचार है। दूसरी—शांत, तरंग-शून्य, मौन, थिर; वही भाव-समाधि है। जैसे झील तरंगों से भरी हो, तो विचार; और झील शांत हो, निस्तरंग हो, तो भाव। चित्त दोनों अवस्थाओं में हो सकता है। साधारणतः चित्त विचार की अवस्था में है, क्योंकि वासना की हवाएं बह रही हैं। झील तरंगित होती है हवाओं के कारण। हवाओं के थपेड़े झील को डांवांडोल कर जाते हैं। ऐसे ही चित्त तरंगित होता है वासना की हवाओं के कारण—यह पाऊं वह पाऊं, ऐसा हो जाऊं वैसा हो जाऊं। वह जो भीतर निरंतर कुछ होने की, कुछ पाने की तीव्र ज्वाला जल रही है, वही तरंगित करती है। जैसे ही वासना चली जाती है, हवाएं बंद हो गयीं, झील शांत हो गयी, भाव सम्हल गया।

इसलिए समस्त ज्ञानियों ने कहा है: वासना को समझ लो, सब समझ में आ जायेगा। क्योंकि जिसने वासना को समझ लिया, उसने अपने भीतर विक्षिप्तता के पैदा होने का मूल कारण समझ लिया। और जिसे समझ में आ गया है मूल कारण, वह उसे फिर सहयोग नहीं देगा। कौन पागल होना चाहता है! कौन विचार की उधेड़बुन, आपाधापी में पड़ा रहना चाहता है! कौन झेलना चाहता है रोग विचार का! विचार रोग है क्योंकि निरंतर बेचैनी है, अशांति, तनाव है। विचार संताप है। विचार के कारण ही तो आनंद नहीं अनुभव हो रहा है। आनंद अनुभव हो जाये उसी क्षण, जिस क्षण विचार विदा हो जाये। और विचार तब तक विदा न होगा जब तक वासना की हवाएं बहती हैं।

तुम पूछते: विचार की ऊर्जा भाव में कैसे रूपांतरित होती है? वासना को समझो। तुम जो हो, उससे ही राजी हो जाओ; वासना विदा हो गयी। तुम जैसे हो, उससे ही संतुष्ट हो जाओ। और की मांग न हो। जो है, परम आह्लादकारी है। जैसा है, उससे भिन्न होने की कोई आवश्यकता नहीं। तो इसी क्षण, देखो कहां गये विचार! भाव सम्हल गया...। धीरे-धीरे भाव का रस अनुभव होगा। और जब भाव का रस अनुभव होगा तो कौन विचार में जाना चाहेगा! जिसका फूलों से संबंध जुड़ने लगा वह फिर कांटों की तलाश नहीं करता।

लेकिन यह पूरा समाज, यह भीड़, ये लोग, तुम्हारे भीतर वासना को उत्तेजित करते हैं। बचपन से ही वासना की दीक्षा दी जाती है, महत्वाकांक्षा सिखाई जाती है। बाप भी चाहता है बेटा कुछ हो जाये—धन कमाये, पद कमाये, यश-प्रतिष्ठा...घर का नाम, कुल का नाम उजागर करे—पकड़ाई तुमने वासना। छोटे-छोटे बच्चे जिन्हें हम स्कूल भेजते हैं, हम वासना की दीक्षा लेने भेज रहे हैं। पच्चीस वर्ष, जीवन का एक तिहाई हिस्सा, हम लोगों को महत्वाकांक्षा सिखाते हैं! कैसे तुम प्रथम हो जाओ, कैसे दूसरों को पीछे छोड़ दो। चाहे कुछ भी कीमत चुकानी पड़े, चाहे जीवन ही खो जाये इस दौड़ में, मगर दौड़ कर आगे हो जाना...। मरना तो आगे जाकर मरना, पीछे मत रह जाना।

जीसस के वचन पर विचार करो: धन्यभागी हैं वे जो अंतिम हैं, क्योंकि वे ही मेरे प्रभु के राज्य में प्रथम होंगे; और जो प्रथम हैं, वे अंतिम पड़ जायेंगे।

महत्वाकांक्षी प्रभु के राज्य से जुड़ेगा कैसे? उसने तो नरक से अपना नाता बना लिया। फिर जीवन-भर की आपाधापी के बाद, न मालूम कितने घाटों का गंदा पानी पीने के बाद, न मालूम कितने रास्तों की धूल-धवांस से लद जाने के बाद, जब जिंदगी का सूरज अस्त होने लगता है, और जब लगता है कि हाथ कुछ लगा नहीं, खाली के खाली रह गये; दौड़े बहुत, पहुंचे नहीं कहीं—तब पश्चात्ताप घेरता है। तब मन सोचता है अब समाधि कैसे पा लें; अब परमात्मा को कैसे पा लें। और फिर तुम्हें मन ने धोखा दिया; वही पाने की भाषा...। अब तुम्हें नयी महत्वाकांक्षा पकड़ेगी। इस महत्वाकांक्षा का रूप भर धार्मिक है, ढंग भर धार्मिक है; इसकी आत्मा तो वही की वही है। तुम चाहे धन चाहो चाहे धर्म, पद चाहो चाहे परमात्मा, जब तक चाह है तब तक हवाएं बहती रहेंगी और चित्त तरंगित होता रहेगा। जो धन चाहता है उसके चित्त में धन के विचार उठते हैं; जो परमात्मा चाहता है उसके मन में परमात्मा के विचार उठते हैं—लेकिन विचार तो जारी रहेंगे। इससे क्या फर्क पड़ता है कि विचार किसके हैं, धन के हैं कि धर्म के हैं? धार्मिक विचार हो कि अधार्मिक विचार हो, विचार विचार है। और जहां विचार है वहां अशांति है। इसलिए मैं तुम्हें धार्मिक विचार नहीं सिखा रहा हूं। मैं तुम्हें निर्विचार की दीक्षा दे रहा हूं। आमतौर से यही चल रहा है मंदिर-मस्जिदों में: जो लोग सांसारिक विचारों से भरे हैं, उन्हें हम कैसे आध्यात्मिक विचारों से भर दें, बस...। मगर क्या फर्क पड़ता है? रोग का नाम धार्मिक रख लिया, अच्छा-प्यारा नाम रख लिया, इससे क्या फर्क पड़ता है? जब तक तुम कुछ भी होना चाहते हो, जब तक तुम भविष्य में कुछ होने की आकांक्षा रखते हो, जब तक तुम कल के प्रति आतुर हो, आकांक्षी हो, अभीप्सु हो, तब तक तुम अशांत रहोगे। विचार की धारा बहती रहेगी। और विचार की धारा बहती रहेगी, तुम परमात्मा से टूटे रहोगे।

मैं तुमसे यह कह रहा हूं कि धार्मिक विचार भी अस्तित्व के और तुम्हारे बीच उतनी ही बड़ी बाधा है जितनी सांसारिक विचार की। विचार बाधा है, निर्विचार मिलन है।

ओशो: , #4



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