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उदासी को उत्सव बना लें! |
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जीवन जो भी लाए उसे उत्सव बनाएं--
सुख या दुख-- और
समझो,
तुमने अपना स्वर्ग स्वयं ही निर्मित कर लिया। |
| ""दुख
के बारे में भी उत्सव की द्रष्टि ही रखें।
जैसे कि: तुम उदास हो-- तो उदासी के साथ
तादात्म्य न बनाएं…" |
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स्वास्थ्य, ध्यान और स्वप्न |
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.होशपूर्ण श्वसन-क्रिया किस प्रकार तुम्हारे शरीर
में नयी संवेदनाएं निर्मित करती है और तुम्हारे
सपनों को प्रभावित करती है… |
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"यह सच है कि ध्यान के बाद शरीर हल्का
अनुभव करेगा। यह इसलिए कि हमें शरीर का
बोध बोझीलेपन का है। जिसे हम बोझीलापन
कहते हैं वह कुछ और नहीं अपितु…" |
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आपकी मुख्य मनोग्रस्ति |
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मुझे अपने मित्र की मद्यपान की आदत
के बारे में बहुत चिंता
है। |
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"वह सब कुछ मत सोचें जिसका लेना-देना
दूसरों से हो। और तुम वही सोचते रहते हो।
निन्यानबे प्रतिशत जो तुम सोचते हो…" |
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ओशो मल्टीवर्सिटी |
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पुन:प्रकाशित हिन्दी पुस्तकें |
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मैं मृत्यु सिखाता हूं
समाधि में साधक मरता है स्वयं, और चूंकि वह स्वयं
मृत्यु में प्रवेश करता है, वह जान लेता है इस सत्य को
कि मैं हूं अलग, शरीर है अलग। और एक बार यह पता चल जाए
कि मैं हूं अलग, मृत्यु समाप्त हो गई। और एक बार यह पता
चल जाए कि मैं हूं अलग, और जीवन का अनुभव शुरू हो गया।
मृत्यु की समाप्ति और जीवन का अनुभव एक ही सीमा पर होते
हैं, एक ही साथ होते हैं। जीवन को जाना कि मृत्यु गई,
मृत्यु को जाना कि जीवन हुआ। अगर ठीक से समझें तो ये
एक ही चीज को कहने के दो ढंग हैं। ये एक ही दिशा में
इंगित करने वाले दो इशारे हैं।
ओशो
मृत्यु से अमृत की ओर ले चलने वाली इस पुस्तक के कुछ
विषय बिंदु:
- मृत्यु और मृत्यु-पार के रहस्य
- सजग मृत्यु के प्रयोग
- निद्रा, स्वप्न, सम्मोहन व मूर्च्छा के पार — जागृति
- सूक्ष्म शरीर, ध्यान व तंत्र-साधना के गुप्त आयाम
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संभोग से समाधि की ओर ‘जो उस मूलस्रोत को
देख लेता है...’ यह बुद्ध का वचन बड़ा अदभुत है:
‘वह अमानुषी रति को उपलब्ध हो जाता है।’ वह ऐसे
संभोग को उपलब्ध हो जाता है, जो मनुष्यता के पार
है। जिसको मैंने ‘संभोग से समाधि की ओर’ कहा है,
उसको ही बुद्ध अमानुषी रति कहते हैं।
एक तो रति है मनुष्य की—स्त्री और पुरुष की। क्षण
भर को सुख मिलता है। मिलता है?—या आभास होता है कम
से कम। फिर एक रति है, जब तुम्हारी चेतना अपने ही
मूलस्रोत में गिर जाती है; जब तुम अपने से मिलते
हो।
एक तो रति है—दूसरे से मिलने की।
और एक रति है—अपने से मिलने की। जब तुम्हारा तुमसे
ही मिलना होता है, उस क्षण जो महाआनंद होता है, वही
समाधि है। संभोग में समाधि की झलक है; समाधि में
संभोग की पूर्णता है।
ओशो
‘एस धम्मो सनंतनो’ से
उद्धृत |
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आपुई गई हिराय
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सांच सांच सो सांच
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न को हां में बदलने के लिये कल्पना का
उपयोग: |
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सुबह उठते ही पहली बात, कल्पना करें कि तुम बहुत
प्रसन्न हो। बिस्तर से प्रसन्न-चित्त उठें--
आभा-मंडित, प्रफुल्लित, आशा-पूर्ण-- जैसे कुछ
समग्र, अनंत बहुमूल्य होने जा रहा हो। अपने
बिस्तर से बहुत विधायक व आशा-पूर्ण चित्त से, कुछ
ऐसे भाव से कि आज का यह दिन सामान्य दिन नहीं
होगा-- कि आज कुछ अनूठा, कुछ अद्वितीय तुम्हारी
प्रतीक्षा कर रहा है; वह तुम्हारे करीब है। |
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ओशो प्रवचन यहां देखें |
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