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| वर्तुल के बाहर रहना |
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| मुझे हमेशा लगता है कि मैं प्यार के लायक नहीं हूं। मुझे लगता है कि इससे मेरे दिल के द्वार बंद रहते हैं। और अब मेरा दिल पीड़ा से गुजर रहा है लेकिन मैं भूल गया हूं कि द्वार कहां है। |
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| "मानव समाज में हर जगह हर व्यक्ति के खिलाफ यह अपराध किया गया है: तुम्हें लगातार संस्कारित किया गया है और कहा गया है कि तुम अपात्र हो।…" |
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| ऊर्जा-शरीर |
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| "दूसरा शरीर, प्राणमय कोष आपको एक नई आजादी देता है, आपको और अधिक अवकाश देता है। यह दूसरा शरीर पहले से भी बड़ा होता है, यह आपके भौतिक शरीर के भीतर सीमित नहीं है। यह भौतिक शरीर के अंदर है और यह शरीर के बाहर है।…" |
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| मान्यता की जरूरत |
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| मुझे ऐसा क्यों लगता है कि विशेष रूप से मेरे काम में, मुझे दूसरों का अनुमोदन और मान्यता प्राप्त होने की आवश्यकता है? |
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| "यह याद रखना जरूरी है कि अनुमोदन और मान्यता की जरूरत हर किसी का सवाल है। हमारे पूरे जीवन की संरचना ऐसी है कि हमें सिखाया जाता है कि जब तक हमें कोई मान्यता नहीं देता, हम बेकार हैं, ना-कुछ हैं। काम महत्वपूर्ण नहीं है, लेकिन मान्यता!…" |
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गीता-दर्शन भाग दो
प्रकाशक: OSHO Media International
आई एस बी एन: 978-81-7261-087-6
साइज : 7.5" x 8.5"
पृष्ठ संख्या : ४६०
Price - Rs. 250/-
Hard Back
कृष्ण कहते हैं: ‘जब मनुष्य आसक्तिरहित होकर कर्म करता है, तो उसका जीवन यज्ञ हो जाता है—पवित्र। उससे, मैं का जो पागलपन है, वह विदा हो जाता है। मेरे का विस्तार गिर जाता है। आसिक्त का जाल टूट जाता है। तादात्म्य का भाव खो जाता है। फिर वह व्यक्ति जैसा भी जीए, वह व्यक्ति जैसा भी चले, फिर वह व्यक्ति जो भी करे, उस करने, उस जीने, उस होने से कोई बंधन निर्मित नहीं होते हैं।’
ओशो
कुछ विषय-बिंदु:
• निष्काम कर्म का विज्ञान
• जन्मों-जन्मों में कैसे निर्मित होता है मन
• आत्म-ज्ञान के लिए सूत्र
• काम-क्रोध से मुक्ति
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तृषा गई एक बूंद से
प्रकाशक: OSHO Media International
आई एस बी एन: 978-81-7261-092-0
साइज : 5.75" x 8.25"
पृष्ठ संख्या : 180
PaperBack
Price - Rs. 65/-
ओशो कहते हैं: ‘अशांति को दूर करने की कोशिश मत करिए। अशांति को समझिए और जीवन को बदलिए।’ और इसके साथ ही हमें जीवन को बदलने की यात्रा पर लिए चलते हैं। इस पुस्तक में वे हमारे शरीर और मन के रहस्यों को खोलते हैं और आमंत्रित करते हैं हमें हमारे तीसरे—आत्मा के—तल पर।
पुस्तक के कुछ विषय-बिंदु:
• हम अशांत क्यों हैं?
• सात चक्रों की साधना
• संकल्प के प्रयोग
• जागरण के तीन सूत्र
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| सब काल्पनिक है |
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कभी सिनेमाघर में इसका प्रयोग करें। यह एक अच्छा ध्यान है। बस इतना स्मरण रखने की चेष्टा करें कि यह काल्पनिक है, यह काल्पनिक है...स्मरण रखें कि यह काल्पनिक है और पर्दा खाली है। और आप चकित हो जाएंगे--केवल कुछ सेकेंड के लिए आप स्मरण रख पाते हैं और फिर भूल जाते हैं, फिर यह यथार्थ लगने लगता है।
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| ओशो
के प्रवचन यहां देखें |
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