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| उपचार जिसे करुणा कहते हैं |
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| मैंने आपको एक बार कहते हुए सुना है कि "मात्र करुणा ही उपचारक होती है'। कृपया करुणा के बारे में बताएं। |
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| केवल करुणा ही स्वास्थ्य प्रदान करती है। क्योंकि मनुष्य में जो भी अस्वस्थ है वह प्रेम की कमी के कारण है। जो भी मनुष्य के साथ ग़लत है, कहीं न कहीं प्रेम से जुड़ा है। वह प्रेम नहीं कर पाया, या उसे प्रेम नहीं मिल पाया। वह स्वयं को बांट नहीं पाया। सारी व्यथा यह है। इस कारण भीतर बहुत सी ग्रंथियां बन गयीं हैं।… |
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| दंत समस्याएं |
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| मानसिक समस्याएं अक्सर दांतों की समस्या के रूप में उभरती हैं, और इसके विपरीत भी होता है: जो दांतों की समस्या लगती है वह मानसिक हो सकती है; और यह भी हो सकता है कि तुम्हारी मानसिक समस्याओं का स्रोत दांतों में हो। |
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ओशो की अन्तर्दृष्टि है कि दांतों का उपयोग मन-शरीर की स्मृतियों के द्वार खोलने के लिए किया जा सकता है, जो इससे पहले यह द्वार चिकित्सा और रूपान्तरण के लिए अज्ञात था। आपकी गहरी सोच के लिए कुछ बिंदु।
यह मेरा शक है कि जहां भी बहुत ज्यादा क्रोध दबाया गया है, लोगों को दांतों की समस्याएं होती हैं। उनके दांत खराब हो जाते हैं क्योंकि वहां बहुत ऊर्जा है जिसे मुक्त नहीं किया गया है।… |
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| क्रोध का मनोविज्ञान |
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क्रोध का मनोविज्ञान है कि तुम कुछ चाहते थे और किसी ने तुम्हें वह पाने से रोक दिया। कोई राह का रोड़ा बन गया,एक रुकावट के रूप में। तुम्हारी पूरी उर्जा कुछ पाने जा रही था और किसी ने उर्जा को रोक दिया। तुम जो चाहते थे, नहीं पा सके।
अब यह कुंठित उर्जा क्रोध बन जाती है... क्रोध उस व्यक्ति के विरुद्ध जिसने तुम्हारी आकांक्षा के पूर्ण होने की सम्भावना को नष्ट कर दिया हो।
तुम क्रोध को नहीं रोक सकते क्योंकि क्रोध एक उपोत्पाद, एक बाइप्रोडक्ट है। लेकिन तुम कुछ और कर सकते हो जिससे यह बाइप्रोडक्ट फिर पैदा न हो। … |
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मैं थाईलैंड में सूचना-तकनीक के परामर्शी के रूप में काम करती थी और दस वर्ष एक प्रतिष्टित-संस्थान में बिताए। मेरे काम में मेरे से बहुत ज्यादा अपेक्षाएं होती थीं जिससे मेरे ऊपर बहुत दबाव होता था, और इसे मैंने सदा गंभीरता से लिया। जब मैं तनाव-पूर्ण होती तो दूसरे भी तनाव-पूर्ण हो जाते थे, इसलिए पिछले वर्ष मैंने अवकाश लेने का निश्चय किया। अवकाश के समय मैं पढ़ना पसंद करती हूं, सो किताब की दूकान में मुझे ओशो के "गोल्ड नगेट्स" की एक प्रति मिली। मैंने किताब खोली और "धन और प्रेम' के बारे में एक पंक्ति ने मुझे प्रभावित कर लिया, इस प्रकार मैं और अधिक पढ़ने लगी।
तब मैंने ओशो.कॉम वेब-साइट में खोजा जहां मैंने "लिविंग-इन" कार्यक्रम के बारे में जाना और जिसके कारण मै आज यहां हूं। अब मैं हंसते-खेलते, कम तनाव से कार्य करना सीख रही हूं, और साथ ही लोगों से मृदु व्यवहार भी करती हूं। मैंने अपनी नकारात्मकता को भी कम किया है। ध्यान, शांत प्राकृतिक वातावरण और ध्यानपूर्ण और सहयोगी लोगों का जोड़, स्वयं पर कार्य करने के लिए एक परिपूर्ण पैकेज है। इवनिंग मीटिंग मेरा प्रिय ध्यान है; जिबरिश और लेट-गो मुझे मृत्यु से मित्रवत होना सिखाते हैं। अब मैं मृत्यु से कम भयभीत हूं, मैं संसार में अधिक सुरक्षित महसूस कर रही हूं। मैं सीखना चाहती थी कि कार्य करते हुए ध्यान-पूर्ण कैसे हुआ जाए और मैं यहां जो अनुभव कर रही हूं, वह मैंने जो सोचा था उससे कई गुना ज्यादा है।
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Gita Darshan Vol.4
ISBN 978-81-7261-125-5
Hard Back
Size- 7.5" x 8.5"
Pages - 392
| Price: |
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300/- |
कृष्ण अर्जुन से उस क्षण, उस मार्ग, मृत्यु की उस कला की बात इन सूत्रों में करेंगे, जिस कला को जानने वाला, जिस मार्ग को पहचानने वाला, मर कर मरता नहीं, अमृत को उपलब्ध हो जाता है।
ओशो
इस पुस्तक में गीता के आठवें व नौवें अध्याय—अक्षर-ब्रह्म-योग और राजविद्या-राजगुह्य-योग—तथा विविध प्रश्नों व विषयों पर चर्चा है।
कुछ विषय-बिंदु:
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मृत्यु का भय क्यों? |
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योगयुक्त मरण के सूत्र |
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सृष्टि और प्रलय का वर्तुल |
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खोज की सम्यक दिशा |
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स्त्रैणता और पुरुषता का मनोविज्ञान |
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Jeevan Hi Hai Prabhu
ISBN 978-81-7261-047-0
Size - 5.75" x 8.25"
Paper Back
Pages - 132
| Price: |
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80/- |
ध्यान की गहराइयों में वह किरण आती है, वह रथ आता है द्वार पर जो कहता है: सम्राट हो तुम, परमात्मा हो तुम, प्रभु हो तुम, सब प्रभु है, सारा जीवन प्रभु है। जिस दिन वह किरण आती है, वह रथ आता है, उसी दिन सब बदल जाता है। उस दिन जिंदगी और हो जाती है। उस दिन चोर होना असंभव है। सम्राट कहीं चोर होते हैं! उस दिन क्रोध करना असंभव है। उस दिन दुखी होना असंभव है। उस दिन एक नया जगत शुरू होता है। उस जगत, उस जीवन की खोज ही धर्म है।
इन चर्चाओं में इस जीवन, इस प्रभु को खोजने के लिए क्या हम करें, उस संबंध में कुछ बातें मैंने कही हैं। मेरी बातों से वह किरण न आएगी, मेरी बातों से वह रथ भी न आएगा, मेरी बातों से आप उस जगह न पहुंच जाएंगे। लेकिन हां, मेरी बातें आपको प्यासा कर सकती हैं। मेरी बातें आपके मन में घाव छोड़ जा सकती हैं। मेरी बातों से आपके मन की नींद थोड़ी बहुत चौंक सकती है। हो सकता है, शायद आप चौंक जाएं और उस यात्रा पर निकल जाएं जो ध्यान की यात्रा है।
तो निश्र्चित है, आश्र्वासन है कि जो कभी भी ध्यान की यात्रा पर गया है, वह धर्म के मंदिर पर पहुंच जाता है। ध्यान का पथ है, उपलब्ध धर्म का मंदिर हो जाता है। और उस मंदिर के भीतर जो प्रभु विराजमान है, वह कोई मूर्तिवाला प्रभु नहीं है, समस्त जीवन का ही प्रभु है। ओशो
इस पुस्तक के कुछ विषय बिंदु:
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परमात्मा को कहां खोजें? |
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क्यों सबमें दोष दिखाई पड़ते हैं? |
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जिंदगी को एक खेल और एक लीला बना लेना |
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क्या ध्यान और आत्मलीनता में जाने से बुराई मिट सकेगी? |
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प्रस्तावित ओशो प्रवचन |
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प्रस्तावित ओशो ई पुस्तकें |
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आय ट्यून पर प्रस्तावित ओशो प्रवचन |
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यूट्यूब पर प्रस्तावित ओशो वीडियो |
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| सांस लो और मुस्कराओ |
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जब भी तुम बैठे हो और कुछ भी नहीं कर रहे हो, अपने निचले जबड़े को शिथिल कर लो और मुंह को थोड़ा सा खोल लो। मुंह से सांस लेना शुरु करो लेकिन बहुत गहरे नहीं। इस प्रकार यह उथली से उथली होती चली जाएगी। और जब तुम महसूस करते हो कि सांस बहुत धीमी हो गई है और मुंह खुला हुआ है और तुम्हारे जबड़े शिथिल हो गए हैं, तुम्हारा पूरा शरीर बहुत शिथिल महसूस करेगा।
उस क्षण में, एक मुस्कराहट महसूस करना शुरू करो -- मात्र चेहरे पर नहीं, बल्कि अपने पूरे आंतरिक अस्तित्व में। यह मुस्कराहट वह नहीं है जो ओठों पर आती है -- यह अस्तित्वगत मुस्कराहट है जो भीतर फैलती है।…
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| वाच ओशो टाक हियर |
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