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ओशो
इँटरनेशनल न्यूज़लेटर
दिसंबर 2 0 0 9
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"ध्यान रहे, केवल वही महत्वपूर्ण है जो कि तुम शरीर को छोड़ते समय अपने साथ ले जा सकते हो हैं। इसका मतलब है, ध्यान को छोड़कर कुछ भी महत्वपूर्ण नहीं है। जागरूकता के अलावा कुछ भी महत्वपूर्ण नहीं है, क्योंकि केवल जागरूकता को मौत नहीं ले जा सकती। बाकी सब कुछ छीन लिया जाएगा, क्योंकि सब कुछ बाहर से आता है।
केवल जागरूकता भीतर से उमगती है। इसे छीना नहीं जा सकता। और जागरूकता की छाया - करुणा, प्रेम - वे भी छीने नहीं जा सकते। वे जागरूकता के आंतरिक हिस्से हैं। तुम अपने साथ सिर्फ जागरूकता ले जाओगे जितनी भी तुमने अर्जित की होगी। वह तुम्हारा असली धन है।" ओशो

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सभी प्रेम चाहते हैँ फिर भी प्रेम का अकाल क्योँ है?
सभी प्रेम चाहते हैँ फिर भी प्रेम का अकाल क्योँ है?
"मैं आपको एक सूत्र की बात कहूं: जिस मनुष्य के पास प्रेम है उसकी प्रेम की मांग मिट जाती है। और यह भी मैं आपको कहूं: जिसकी प्रेम की मांग मिट जाती है वही केवल प्रेम को दे सकता है। जो खुद मांग रहा है वह दे नहीं सकता है।"
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ध्यान शरीर की आदत नहीं है।
ध्यान शरीर की आदत नहीं है।
"ध्यान इसलिए कठिन मालूम होता है क्योंकि शरीर की बंधी हुई आदतों को तोड़कर उसमें नई व्यवस्था निर्मित करनी होती है । शरीर की बंधी हुई आदतें कौन सी हैं और उन्हें कैसे तोड़ा जा सकता है इस पर पढ़िए ओशो का मार्गदर्शन जो उन्होंने एक ध्यान शिविर में साधकों को किया है।"
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शिक्षा में क्राँति - दुनिया में ईमानदारी क्योँ नहीं है?
शिक्षा में क्राँति - दुनिया में ईमानदारी क्योँ नहीं है?
"अगर मनुष्य-जाति के लिए कोई भी आपके हृदय में प्रेम है और आप सच में चाहते हैं कि एक नई दुनिया, एक नई संस्कृति और नया आदमी पैदा हो जाए तो यह सारी पुरानी बेवकूफी छोड़नी पड़ेगी, जलानी पड़ेगी, नष्ट करनी पड़ेगी और विचार करना पड़ेगा कि क्या विद्रोह हो, कैसे हो सकता है इसके भीतर से। यह सब गलत है इसलिए गलत आदमी पैदा होता है।"
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  ओशो इंटरनैशनल मैडिटेशन रिज़ॉर्ट ओशो 	इंटरनैशनल मैडिटेशन रिज़ॉर्ट
ओशो इंटरनैशनल मैडिटेशन रिज़ॉर्ट ओशो इंटरनैशनल मैडिटेशन रिज़ॉर्ट ओशो इंटरनैशनल मैडिटेशन रिज़ॉर्ट
सन 2006 में, मेरे जीवन में सब कुछ बिखरना शुरू हुआ: मेरा दस साल का रिश्ता डांवाडोल था, मैं अपने काम से पूरी तरह से थक गई थी और फिर भी मैं नौकरी छोड़ने से डर रही थी। एक दोस्त ने मुझे बताया कि उसके जान पहचान की ओशो चिकित्सक के लिए स्विट्जरलैंड में कुछ कोर्सेस आयोजित करने की संभावना है। साथ में कुछ पैसे भी कमाए जा सकते हैं। यह निमंत्रण मुझे घने अंधेरे में प्रकाश की तरह नजर आया।

मुझे डर था क्योंकि इतालवी का एक शब्द भी नहीं बोल सकती थी। लेकिन इटली में मैं चिकित्सक से मिलने गई । क्योंकि नीचे गहरे में मैं महसूस कर रही थी कि कुछ बड़ा होने वाला है। वहां जाने पर मैं ऐसे हो गई जैसे पानी में मछली! मुझे तुरंत पता चला कि मैं चिकित्सक से मिलने नहीं आई थी बल्कि इसका एक और उद्देश्य है जो मेरा जीवन बदल देगा।

बाद में, मैं अपना काम, प्रेमी और घर छोड़कर एक ओशो केंद्र में काम करने लगी। वह एक शून्य में छलांग थी। फिर मेरी एक नए प्रेमी से मुलाकात हुई। और हमारे मन में ओशो के ध्यान बांटने की इच्छा पैदा हुई। ओशो.कॉम पर, मैंने पाया कि ध्यान और केंद्र के लिए प्रशिक्षण पुणे में दिया जाता है। एक बार वहां जाने पर मैं आवासीय कार्यक्रम में शामिल हुई।

मुझे दफ्तर का काम सौंपा गया था, ठीक वैसा ही जैसा मैंने छोड़ दिया था और शपथ ली थी कि फिर कभी नहीं करूंगी। इससे बहुत सी बातें उभरकर आईं। इनर स्किल्स कार्यक्रम में मैंने यह सीखा कि मैं क्या काम कर रही हूँ इसकी जगह मैं कैसे कर रही हूं इस पर ध्यान दूं। काम में हर मौका एक अवसर होता है वर्तमान में समग्र और जागरूक रहने का। मेरी यह भी समझ में आया कि मेरे जीवन में जो भी होता है उसे मैं ही पैदा करती हूं। और यह ... आजादी देता है। क्योंकि मैं अपने भीतर परिवर्तन कर सकती हूँ और मेरे चारों ओर हालात बदल जाते हैं।

एक वर्ष के बाद यहां मैं अभी भी विकसित हो रही हूं: मैं अधिक लचीली हो रही हूं, अब काम और खाली समय दो अलग बातें नहीं हैं, जीवन आसान हो गया है, और मैं रचनात्मकता का आनंद ले रही हूं।

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  ओशो मल्टीवर्सिटी ओशो मल्टीवर्सिटी
ओशो मल्टीवर्सिटी
  मैं को विदा करने का सबसे अच्छा तरीका है , रचनात्मकता और खेलपूर्ण भाव । उसका कौशल सीखिए दिसम्बर 14 - 17 के दरमियां डिसएपियर इंटु द पेंटिंग में। 17 से 21 दिसंबर तक एक बार फिर से लविंग एण्ड रिस्पेक्टिंग योरसेल्फ में सहभागी होकर खुद को सम्मान दें, जिस तरह से आप एक नवजात बच्चे के रूप में खुद को दिया करते थे। 20 - 22 दिसंबर के बीच द आर्ट ऑफ मूवमेण्ट का मजा लें। 22 - 24 दिसंबर को ए टेस्ट ऑफ द ओशो आर्ट थेरेपिस्ट एडवांस्ड प्रोग्राम में सहभागी होकर जान लें कि कोई अन्य माध्यम हमारे अचेतन में इस तरह सीधे प्रवेश नहीं कर सकता जैसे चित्र करते हैं। 23 - 25 दिसंबर के बीच फ्रीयिंग द इनर ऐक्टर में चुलबुले नाटकीय क्षणों को जीयें। 24 - 28 दिसंबर को फाइंडिंग योर वॉयस, फाइंडिंग योर सांग में आपको निमंत्रण है, आपका अपना गीत ढूंढकर उसे गाने का। स्वयं पर संदेह करने और स्वयं का मूल्यांकन करने से बाहर कदम रखें 29 - 31 दिसंबर तक ओपनिंग टु सेल्फ लव में।

काम और जीवन के लिए कारगर आंतरिक कौशल को सीखें और अनुभव करें इनर स्किल्स फॉर वर्क एण्ड लाइफ में 5 - 7 जनवरी के बीच। और फिर जनवरी 9 को फास्ट ट्रैक टु य़ोरसेल्फ पर चल पडें। अनुभव करें कि आप अपनी इंद्रियों से कहीं अधिक विशाल हैं। ओशो ध्यान विधियों को सीखकर दूसरों को सिखाने की कला आत्मसात करें ओशो मेडिटेशन ट्रैनिंग में, 6 - 11 जनवरी के दौरान। जनवरी 6 - 7 के बीच आपके भीतर की जीवन ऊर्जा को महसूस करें जैसे पहले कभी नहीं की होगी, एक्युएनेर्जेटिक्स -- स्विमिँग इन द सी ऑफ क्यूई में । और 11 - 15 जनवरी तक खोज, और अनुभव करें अंतर्ज्ञान की विस्तीर्ण अवस्था को इंट्युशन एण्ड चैनेलिंग एडवांस्ड प्रोग्राम में।
 
 
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  पुस्तक विमोचन पुस्तक विमोचन
संभोग से समाधि की ओर’
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संभोग से समाधि की ओर


प्रकाशक: Rebel Publishing House, India

आई एस बी एन:  81-7261-042-4

आई एस बी एन:  978-81-7261-042-5

आकार - 6.5" x 8.5"

पृष्‍ठ संख्‍या - 360

हार्ड बाउंड


पुस्तक के बारे में:

‘जो उस मूलस्रोत को देख लेता है...’ यह बुद्ध का वचन बड़ा अदभुत है: ‘वह अमानुषी रति को उपलब्ध हो जाता है।’ वह ऐसे संभोग को उपलब्ध हो जाता है, जो मनुष्यता के पार है। जिसको मैंने ‘संभोग से समाधि की ओर’ कहा है, उसको ही बुद्ध अमानुषी रति कहते हैं।
एक तो रति है मनुष्य की—स्त्री और पुरुष की। क्षण भर को सुख मिलता है। मिलता है?—या आभास होता है कम से कम। फिर एक रति है, जब तुम्हारी चेतना अपने ही मूलस्रोत में गिर जाती है; जब तुम अपने से मिलते हो।
एक तो रति है—दूसरे से मिलने की। और एक रति है—अपने से मिलने की। जब तुम्हारा तुमसे ही मिलना होता है, उस क्षण जो महाआनंद होता है, वही समाधि है।
संभोग में समाधि की झलक है; समाधि में संभोग की पूर्णता है।

 
ओशो
   
जिन खोजा तिन पाइयां
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जिन खोजा तिन पाइयां


प्रकाशक: Rebel Publishing House, India

आई एस बी एन:  81-7261-045-9

आई एस बी एन:  978-81-7261-045-6

आकार - 7.5" x 8.5"

पृष्‍ठ संख्‍या - 400

हार्ड बाउंड

 

पुस्तक के बारे में:

कुंडलिनी-यात्रा पर ले चलने वाली इस अभूतपूर्व पुस्तक के कुछ विषय बिंदु:
 - शरीर में छिपी अनंत ऊर्जाओं को जगाने का एक आह्वान
 - सात चक्रों व सात शरीरों के रहस्यों पर चर्चा
 - आधुनिक मनुष्य के लिए ध्यान की सक्रिय विधियों का जन्म
 - तंत्र के गुह्य आयामों से परिचय

 
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अष्‍टावक्र : महागीता--भाग एक
अष्‍टावक्र : महागीता अष्टावक्र और राजा जनक के बीच इस अदभुत संवाद की गरिमा को ओशो ने अपनी अमृत वाणी द्वारा उसकी पूर्णता में प्रकट किया है। अष्टावक्र-जनक संवाद एवं प्रश्नोत्तर के माध्यम से ओशो धर्म, साधना, तथा चेतना की अतल गहराई में हमें ले चलते हैं। इस अपूर्व संवाद को महागीता कहकर ओशो ने उसमें अनूठी प्राण-प्रतिष्ठा की है।
शीर्षकोँ मेँ शामिल है:
जैसी मति वैसी गति
जागो और भोगो
हरि ॐ तत्सत्
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अपने माहिं टटोल
अपने माहिं टटोल मृत्यु क्या है? इसे सीखने के लिए जीवन को समझना होगा, उसके हर आयाम को, उसकी हर ॠतु से मैत्री करके। हम जीवन से अपरिचित हैं, इसीलिए मृत्यु से भयभीत हैं। ओशो कहते हैं: जीवन क्या है, मनुष्य इसे भी नहीं जानता है। और जीवन को ही हम न जान सकें, तो मृत्यु को जानने की तो कोई संभावना ही शेष नहीं रह जाती। जीवन ही अपरिचित और अज्ञात हो, तो मृत्यु परिचित और ज्ञात नहीं हो सकती है।
शीर्षकोँ मेँ शामिल है:
जीवन का लक्ष्य
यांत्रिक जीवन से मुक्ति
अहंकार का भ्रम
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Music Tracks पिछले महीने के सर्वाधिक लोकप्रिय संगीत ट्रैक
च्वांगत्ज़ुस ड्रीम
च्वांगत्ज़ुस ड्रीम क्या यह विख्यात ताओ सद्गुरु च्वांगत्ज़ु है या कि एक तितली जो इन मदभरी बांसुरियों और गिटार के गीतों से जीवित हो उठती है?
इसे सुनें और सातवें आसमान पर उड़ान भरें।

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अवेकेनिंग
बोधिधर्मास शू
डॅन्स ऑफ द ड्रॅगनफ्लाइस
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  माह का ध्यान MONTHLY MEDITATION
मध्यस्थ से बचें
माह का ध्यान
"प्रयास करो कि छोटी-छोटी बातों में मन ना आये। तुम फूल देख रहे हो, तो बस देखो। ´सुंदर´, ´कुरूप´- ऐसा मत कहो। तुम कुछ कहो ही मत! शब्दों को बीच में मत लाओ, शाब्दिक अभिव्यक्ति मत करो। बस देखो। मन बेचैनी महसूस करेगा, व्याकुल होगा। यह कुछ न कुछ कहना चाहेगा। मन हमेशा कुछ न कुछ कहना चाहता है। तुम बस इससे कह दो:´ चुप रहो! मुझे देखने दो। मैं केवल देखूंगा।´"
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कोयंबतुर (तमिलनाडु)
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25-28 दिसँबर
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अपना बचपन पुन: पाने की कामना सभी करते हैं लेकिन उसके लिए कुछ प्रयास नहीं करते। प्रस्तुत आलेख में ओशो कुछ खास गुर बता रहे हैं कि कैसे इस खोये हुए स्वर्ग को वापिस लौटाया जा सकता है। दैनिक जागरण में छपे हुए इस आलेख को पढ़िए और फिर से बच्चे हो जाइए।
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"होना और बनना, इन दो शब्दोँ मेँ तुम्हारा पूरा जीवन समाहित है। होना बुद्धत्व है, बनना अज्ञान है।"  ओशो
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