|
|
 |
| धर्म सम्राट बनने की कला है |
|
| मनुष्य के जीवन में इतना दुख है, इतनी पीड़ा, इतना तनाव कि ऐसा मालूम पड़ता है कि शायद पशु भी हमसे ज्यादा आनंद में होंगे, ज्यादा शांति में होंगे। समुद्र और पृथ्वी भी शायद हमसे ज्यादा प्रफुल्लित हैं। रद्दी से रद्दी जमीन में भी फूल खिलते हैं। गंदे से गंदे सागर में भी लहरें आती हैं--खुशी की, आनंद की। लेकिन मनुष्य के जीवन में न फूल खिलते हैं, न आनंद की कोई लहरें आती हैं। |
| और पढ़ें » |
| |
|
|
|
 | | ध्यान के दौरान दर्द |
| इसे करते जाओ! यह दर्द चला जाएगा।
कारण स्पष्ट हैं। दो कारण हैं। पहला, यह एक जोरदार व्यायाम है और तुम्हारा शरीर इसे करने के लिए अभ्यस्त हो जाना चाहिए। इसलिए तुम्हें तीन या चार दिनों के लिए तो लगेगा कि पूरा शरीर दर्द कर रहा है। किसी भी नए व्यायाम के साथ यह होगा। लेकिन चार दिनों के बाद तुम उससे पार हो जाओगे और तुम्हारा शरीर पहले से कहीं ज्यादा मजबूत महसूस करेगा। |
| और पढ़ें » |
|
|
|
|
|
 |
| भावनाओं के तूफान में |
|
मुझे लगता है जैसे मैं हमेशा भावों के तूफान से घिरा रहता हूं। इससे कैसे उबरूं?
मैंने उन्हें साक्षीभाव से देखने की कोशिश की है लेकिन जैसे ही एक चला जाता है, दूसरा उभरता है।
हर उस भाव को जीयो जिसे तुम महसूस करते हो। वह तुम ही हो।
घृणा से भरे, कुरूप, अपात्र –– जो भी हो, उसमें रहो। पहले भावों को एक मौका दो पूरी तरह चेतन मन में आने का। अभी जागरूकता के प्रयास में तुम उन्हें अवचेतन में दबा रहे हो । फिर तुम अपने रोजमर्रा के कामों में उलझ जाते हो और उन्हें जबरदस्ती दबा देते हो। उनसे निजात पाने का यह तरीका नहीं है। |
|
|
|
|
|
|
 |
|
|
|
 |
| तारो |
|
मैं चिली में एक अंतरराष्ट्रीय कंपनी में लीडरशिप और प्रबंधन के बारे में प्रशिक्षण देने का काम करती थी। इस सिलसिले में कई देशों में घूमी। इस सबके बावजूद मुझे जीवन में कोई सार्थकता नजर नहीं आती थी। एक बार एक मित्र के पास मैंने ओशो की एक पुस्तक देखी, आई ऐम दि गेट। उसे पढ़ते ही मुझे फौरन लगा कि मैं जो खोजती थी वह मुझे मिल गया। मेरे अंदर एक किस्म का विस्फोट हुआ और मेरे आंसू बहने लगे। मैं बाहर बगीचे में चली गई, शरीर में कंपन होने लगा और आंसू बहते रहे, इस ख्याल से कि जिसे मैं खोजती थी वह मौजूद है। |
|
|
उसके बाद मैंने ओशो की ध्यान विधियां करनी शुरू कीं; अपने काम में भी मैं ओशो ध्यान करवाती थी। उसके बाद मैं पुणे आई और मेडिटेशन रिज़ार्ट में लिविंग इन कार्यक्रम में दाखिल हुई। आज तक मैं दिन में बारह घंटे काम करने की आदी थी, यहां पर सिर्फ छह घंटे काम था। मुझे रिलैक्स करना सीखना पड़ा। फिर कार्य और ध्यान के बीच यहां पर जो संतुलन है वह अपने पास लौट आने का, प्रकृति के साथ और अन्य लोगों के साथ जुड़ने का बेहतरीन तरीका है।
यह एक जादुई जगह है –– बहुत व्यावहारिक और साथ ही एक रहस्य विद्यालय भी। यहां आप अपने भीतर की समस्याओं का सामना करने से बच नहीं सकते। यह आसान नहीं है, लेकिन हर मुश्किल से गुज़रने के बाद जागरूकता और बढ़ जाती है।
|
|
 |
|
|
|
| |
|
|
ध्यान विज्ञान
ISBN 978-81-7261-169-9
Size - 6.5" x 8.5"
Paper Back
Pages - 192
| Price: |
 |
135/- |
जो लोग शरीर के तल पर ज्यादा संवेदनशील हैं, उनके लिए ऐसी विधियां हैं जो शरीर के माध्यम से ही आत्यंतिक अनुभव पर पहुंचा सकती हैं। जो भाव-प्रवण हैं, भावुक प्रकृति के हैं, वे भक्ति-प्रार्थना के मार्ग पर चल सकते हैं। जो बुद्धि-प्रवण हैं, बुद्धिजीवी हैं, उनके लिए ध्यान, सजगता, साक्षीभाव उपयोगी हो सकते हैं।
लेकिन मेरी ध्यान की विधियां एक प्रकार से अलग हट कर हैं। मैंने ऐसी ध्यान-विधियों की संरचना की है जो तीनों प्रकार के लोगों द्वारा उपयोग में लाई जा सकती हैं। उनमें शरीर का भी पूरा उपयोग है, भाव का भी पूरा उपयोग है और होश का भी पूरा उपयोग है। तीनों का एक साथ उपयोग है और वे अलग-अलग लोगों पर अलग-अलग ढंग से काम करती हैं। शरीर, हृदय, मन—मेरी सभी ध्यान विधियां इसी श्र्ृंखला में काम करती हैं। वे शरीर पर शुरू होती हैं, वे हृदय से गुजरती हैं, वे मन पर पहुंचती हैं और फिर वे मनातीत में अतिक्रमण कर जाती हैं।
ओशो
|
|
| |
|
|
विज्ञान, धर्म और कला
ISBN 978-81-7261-231-3
Size - 6.5" x 8.5"
Paper back
Pages - 196
| Price: |
 |
Rs.165/- |
विज्ञान, धर्म और कला के अंतर-संबंध को समझाते हुए ओशो कहते है:
'ये तीन बातें मैंने कहीं। विज्ञान प्रथम चरण है। वह तर्क का पहला कदम है। तर्क जब हार जाता है तो धर्म दूसरा चरण है, वह अनुभूति है। और जब अनुभूति सघन हो जाती है तो वर्षा शुरू हो जाती है, वह कला है। और इस कला की उपलब्धि सिर्फ उन्हें ही होती है जो ध्यान को उपलब्ध होते हैं। ध्यान की बाई-प्रॉडक्ट है। जो ध्यान के पहले कलाकार है, वह किसी न किसी अर्थों में वासना केंद्रित होता है। जो ध्यान के बाद कलाकार है, उसका जीवन, उसका कृत्य, उसका सृजन, सभी परमात्मा को समर्पित और परमात्मामय हो जाता है।'
|
| इस पुस्तक के कुछ विषय बिंदु: |
| • | सत्य की खोज, सत्य का अनुभव, सत्य की अभिव्यक्ति |
| • | सर्विस अबॅव सेल्फ, सेवा स्वार्थ के ऊपर |
| • | क्या हम ऐसा मनुष्य पैदा कर सकेंगे जो समृद्ध भी हो और शांत भी? जिसके पास शरीर के सुख भी हों और आत्मा के आनंद भी? |
| • | जीवन क्रांति के तीन सूत्र |
| • |
धर्म का विधायक विज्ञान |
| |
|
|
|
|
|
 |
| |
|
|
 |
 |
|
| अपनी श्वास का स्मरण रखें |
 |
| अगर तुम अपनी सांस पर काबू पा सको तो अपनी भावनाओं पर काबू पा सकोगे। अवचेतन सांस की लय को बदलता रहता है, अत: अगर तुम इस लय के प्रति और उसमें होने वाले सतत बदलाव के बारे में होश से भर जाओगे तो तुम अपनी अवचेतन जड़ों के बारे में, अवचेतन की गतिविधि के बारे में सजग हो जाओगे।" |
| और पढ़ें » |
|
|
 |
 |
 |
|
 | |  | | अभी बुक करें |
 |
 |
 |
|  | | | वाच ओशो टाक हियर |  |
|
 |
|