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| इंटरनेशनल न्यूज़लेटर |
| फरवरी 2 0 1 0 |
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"प्रेम तुम्हारी समस्या नहीं है। तुम्हारी समस्या है कि तुम अपने आपको स्वीकार नहीं कर पाये हो, अपने पैरों पर खड़े नहीं रह पाये हो, अपना सम्मान नहीं कर पाये, कुछ ऐसा नहीं कर पाये जिससे तुम्हें लगे कि तुम्हारा कोई मूल्य है। तुम्हारा मूल्य तुम्हारे भीतर होना चाहिए, तुम्हें किसी ने दान में न दिया हो। उधार का मूल्य खतरनाक होता है, वह व्यक्ति उसे वापिस ले सकता है। और तथाकथित प्रेम-संबंधों में यही होता रहता है। सिर्फ़ स्वतंत्र व्यक्ति ही प्रेम कर सकता है और प्रेम ले सकता है। और प्रेम उसके लिए कोई समस्या खड़ी नहीं करेगा।
" ओशो |
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| ध्यान और आटो-हिप्नोसिस |
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जिसे आप ध्यान कह रहे हैं, उसमें और आटो-हिप्नोसिस में, आत्म-सम्मोहन में क्या फर्क है? |
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| "वही फर्क है, जो नींद में और ध्यान में है। इस बात को भी समझ लेना उचित है। नींद है प्राकृतिक रूप से आई हुई, और आत्म-सम्मोहन भी निद्रा है प्रयत्न से लाई हुई। इतना ही फर्क है। हिप्नोसिस में-हिप्नोस का मतलब भी नींद होता है-हिप्नोसिस का मतलब ही होता है तंद्रा, ....” |
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| सुखी समाज |
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सुखी समाज के लिए दुख की ईंटें हटाकर सुख की ईंटें रखिये |
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| "यदि नये समाज को जन्म देना हो तो दुख की ईंटों को हटा कर सुख की ईंटें रखनी जरूरी हैं। और वे ईंटें तभी रखी जा सकती हैं जब हम जीवन के सब सुखों को सहज स्वीकार कर लें और सब सुखों को सहज निमंत्रण दे सकें।....” |
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| शरीर की शक्ति का ध्यान में उपयोग |
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शरीर की बंधी हुई आदतें कौन सी हैं और उन्हेँ कैसे तोड़ा जा सकता है इस पर पढ़िए ओशो का मार्गदर्शन जो उन्होँने एक ध्यान शिविर में साधकोँ को किया है। |
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| "शरीर को इतना शिथिल छोड़ देना है कि ऐसा लगने लगे कि वह दूर ही पड़ा रह गया है, हमारा उससे कुछ लेना-देना नहीं है। शरीर से सारी ताकत को भीतर खींच लेना है।...." |
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मैं 54 साल की हूं और जब मैं 17 साल की थी तब से एक बौद्ध नन बनी हूं. उस समय से सुबह जल्दी उठना , मंदिर में पूजा करना , मंत्र पढना, ध्यान में कई घंटे बैठना और मठ में काम करना इस सबमें मुझे बहुत मज़ा आता था। इसमें बहुत प्रयास लगता था लेकिन प्रबुद्ध होने की महत्वाकांक्षा मुझे प्रेरित करती थी ।
मैं पुणे में सन 2000 में ध्यान रिज़ॉर्ट में आई और मुझे ओशो कुंडलिनी ध्यान कर अच्छा लगा, लेकिन मैंने वापिस जाने के बाद ध्यान जारी नहीं रखा। फिर दो साल पहले मुझे कैंसर हुआ और रसायन चिकित्सा और विकीरण चिकित्सा लेनी पडी। उसने मुझे अपने आपको देखने पर बाध्य किया और मैं सोचने लगी कि क्या कमी है । मैंने एक ब्रेक लिया और ध्यान रिज़ॉर्ट में लौटने का फैसला किया। मैंने ओशो कुंडलिनी ध्यान फिर से शुरू किया और ओशो सक्रिय ध्यान भी करने लगी, और तब पता चला कि लंबे समय से मेरे शरीर में दमित ऊर्जा है, जिससे शरीर में भारीपन बन गया था। वह कम होने लगा और ऊर्जा और मन में अधिक संतुलन आने लगा।
इन ओशो सक्रिय ध्यान विधियों के दौरान यह संतुलन जिसकी मुझे लंबे समय से तलाश थी, एक सरल तरीके से अपने आप घटने लगा।
मैंने ओशो के बारे में "सेक्स गुरु" होने की अफवाहें सुन रखी थीं लेकिन प्रति दिन ओशो सक्रिय ध्यान करने के बाद, मैं समझने लगी कि उन्होंने क्यों इस विषय के बारे में बात की थी। मैंने अपने अंदर बढ़ती यौन ऊर्जा का अनुभव किया किसी और वह भी किसी के साथ शारीरिक संपर्क के बिना। इस ध्यान के दौरान अब मैं पल-पल, सहजता से जागरूकता का और समयातीत का अनुभव ले रही हूं। यह पूरी तरह से अद्भुत है।
अब मैं प्रबुद्ध होने की पुरानी महत्वाकांक्षा को छोड़कर अकारण वर्तमान क्षण का आनंद ले सकती हूं।
मैं अक्सर मन ही मन हंसते हुए ओशो से कहती हूं, "आप वाकई जीनियस हैं!"
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पता लगाएं कि आप फरवरी 15-19 से किस तरह
आफ्रो एनर्जी डान्स: चक्र मोशन्स एनर्जी अवेयरनेस में शामिल होकर,जानेंगे कि अ-मन की अवस्था का अनुभव करने के लिए नृत्य आसान तरीका है, और इसमें आप अपने मौलिक स्वभाव का भी स्वाद ले सकते हैं।
डाय बिफोर यू डाय : ए सूफी सेंटरिंग थ्रू लाइफ एण्ड डेथ -- यह एक सूफी कोर्स है जिसमें 19 से 22 फरवरी तक आप सूफी संगीत के विरोधाभासों के माध्यम से, अपनी ऊर्जा को पकड़ से वापस लाकर अपने केंद्र पर ले आते हैं।
कीज़ टु हैपीनैस: वैज्ञानिक सबूतों से पता चलता है कि खुश रहनेवाले लोग लंबे जीते हैं, अधिक स्वस्थ होते हैं, लचीले होते हैं और जीवन में बेहतर कार्य करते हैं उनकी अपेक्षा जो खुश नहीं होते । तो हमें खुश रहने से कौन सी चीज रोक रही है? अक्सर खुशी की कुंजी को गलत समझा गया है। हम सुख को खुशी समझते हैं जो कि अस्थायी होता है , अपने बाहर होता है और दूसरों पर निर्भर होता है। इस दिन, फ़रवरी 25 को, अपनी आंतरिक खुशी को विकसित करने के लिए, आप 4 ओशो कुंजियां खोज लेंगे जो आपके जीवन में स्थायी परिवर्तन लाएंगी। फ़रवरी 25 से मार्च 10 तक
स्टारलाईट ट्रान्ससोमैटिक डायलाग एडवान्स्ड प्रोग्राम : बारदो कार्मिक मॉड्यूलज् के साथ पिछले जन्मों में निहित मुद्दों के समाधान खोजिये। फरवरी 26-28 से आप जिस तरह से अचेतन प्रतिक्रिया करते हैं उसे समझने के लिए
चेंजिंग द वे वी लिव अवर लाइव्ज़ में सहभागी हो सकते हैं। फरवरी 27 से 2 मार्च,
जेन ट्रान्स्फार्मेशन इंटेन्सिव - 4 दिन : इन चार दिनों से आप ज़ेन परिवर्तन का सार सीखेंगे। कुछ भी करने की जरूरत नहीं है, बस सुनिये। 5-7 मार्च से ध्यान के कौशल सीखने का आनंद और आत्मविश्वास पाने के लिए
ओशो ध्यान प्रशिक्षण में दूसरों को ओशो ध्यान का परिचय कराएं। फिर मार्च 8-10 तीन दिन तक रोज के जीवन के लिए एक रचनात्मक और प्रेरणादायक गाइड -ह्यूमन डिजाइन सिस्टम: ए फार्मूला फॉर डिस्कवरिंग एण्ड लविंग द पर्सन यू वेयर बॉर्न टु बी। |
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ध्यानयोग: प्रथम और अंतिम मुक्ति
प्रकाशक: OSHO Media International
आई एस बी एन: 978-81-7261-117-0
आकार - 7.5" x
8.5"
पृष्ठ संख्या -
332
हार्ड बाउंड
पुस्तक के बारे में:
‘इक्कीसवीं सदी का जीवन जितनी तेज गति से भाग रहा है उतनी ही तेज गति से व्यक्ति के लिए तनाव बढ़ता जा रहा है। शांत बैठकर ध्यान में उतर जाना अब उतना सरल नहीं है जितना कि बुद्ध के समय में था।
ध्यानयोग: प्रथम और अंतिम मुक्ति ओशो द्वारा सृजित अनेक ध्यान विधियों का विस्तृत व प्रायोगिक विवरण है, विशेषतः ओशो सक्रिय ध्यान विधियों व ओशो मेडिटेटिव थेरेपीज़ का, जो कि आधुनिक जीवन के तनावों से सीधे निपटती हैं व हमें ताजा व ऊर्जावान कर जाती हैं। ओशो बहुत सी प्राचीन विधियों की भी चर्चा करते हैं: विपस्सना व झाझेन, केंद्रीकरण की विधियां, प्रकाश व अंधकार पर ध्यान, हृदय के विकास की विधियां...।
साथ ही ओशो ध्यान संबंधी प्रश्नों के उत्तर भी देते हैं व हमें बताते हैं कि ध्यान क्या है, कैसे ध्यान करना शुरू करें। और कैसे अपनी अंतर-यात्रा को निर्बाध रूप से जारी रख सकें।
‘ध्यान की शुरुआत तो है, पर उसका कोई अंत नहीं है। वह अंनत तक अनवरत चलता चला जाता है। मन तो छोटी सी चीज है, ध्यान तुम्हें पूरे अस्तित्व का हिस्सा बना देता है। यह तुम्हें स्वतंत्रता देता है कि तुम पूर्ण के साथ एक हो जाओ।’ |
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ईशावास्योपनिषद
प्रकाशक: OSHO Media International
आई एस बी एन: 978-81-7261-171-2
आकार - 6.5" x
8.5"
पृष्ठ संख्या -
272
राज संस्करण
ईशावास्योपनिषद की पृष्ठभूमि में ओशो का समयातीत आह्वान:
एक ही मार्ग है कि मनुष्य जीते-जी कर्म से गुजरते हुए भी कर्म में लिप्त न हो। वह मार्ग है, जीवन को एक अभिनय के रूप में रूपांतरित कर लेना।
तेन त्यक्तेन भुंजीथाः, जिसने छोड़ा उसने पाया। जिसने खोल दी मुट्ठी, भर गई। जो बन गया झील की तरह, वह भर गया। जो हो गया खाली, वह अनंत संपदा का मालिक है।
मैं चाहता हूं कि आप खुद अपने भीतर जानें और अपने से कह पाएं कि मैं अपने को बिना जाने जी रहा हूं। क्योंकि स्वयं को जानने की पीड़ा इतनी घनी है कि वही आपको प्रयोग में ले जाएगी, अन्यथा नहीं ले जाएगी।
आंख से बहुत देखा, वह दिखाई नहीं पड़ा। जन्म-जन्म देखा, वह दिखाई नहीं पड़ा। अब आंखें बंद करके देखें।
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दैनिक अमर उजाला में प्रकाशित ओशो प्रवचन का अंश।
ओशो का कहना है कि उस ज़िद को छोड़ दो जो मनुष्यता को दु:ख देती है। समाधान ढूंढना ही पड़ेगा। यह दुनिया तभी सुंदर होगी जब पश्चिम धर्म को अत्मसात करेगा और पूरब अपनी दरिद्रता को मिटाने के लिए विज्ञान का सहारा लेगा।
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| इस महीने हमने आप के लिए क्या
चुना .... |
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पिछले महीने के सर्वाधिक लोकप्रिय ऑडियो पुस्तकें |
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मैं मृत्यु सिखाता हूं
मृत्यु क्या है—इसे सीखने के लिए जीवन को समझना होगा, उसके हर आयाम को, उसकी हर ॠतु से मैत्री करके। हम जीवन से अपरिचित हैं, इसीलिए मृत्यु से भयभीत हैं। ओशो कहते हैं:“जीवन क्या है, मनुष्य इसे भी नहीं जानता है। और जीवन को ही हम न जान सकें, तो मृत्यु को जानने की तो कोई संभावना ही शेष नहीं रह जाती।...." |
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दरिया कहै सब्द निरवाना
दरिया के शब्द सुनो, जिंदगी की थोड़ी तलाश करो: दरिया कहै सब्द निरबाना! ये प्यारे सूत्र हैं। इनमें बड़ा माधुर्य है, बड़ी मदिरा है। मगर पिओगे तो ही मस्ती छाएगी। इन्हें ऐसे ही मत सुन लेना जैसे और सब बातें सुन लेते हो, इन्हें बहुत भाव-विभोर होकर सुनना। आंखें गीली हों तुम्हारी, और आंखें ही नहीं, हृदय भी गीला हो।
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पिछले
महीने के
सर्वाधिक
लोकप्रिय
संगीत
ट्रैक |
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दिस! कमेंटरीज़ ऑफ दि बाम्बूज़
इन संगीतमय झलकियों में सौम्य स्वरमेल एक पृष्ठभूमि तयार करते हैं, और बीच-बीच में स्वर लहरियां ऐसी उभरती हैं जैसे वृक्षों के बीच से गूंजती हुई पक्षियों की चहचहाहट। यह संगीत चुपके से आपके भीतर प्रवेश करता है, मंद बयार की तरह फुसफुसाता है। यदि आप ध्यान से सुनते हैं तो बांस वन की धड़कनें भी सुनाई देंगी। |
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पिछले
महीने के
सर्वाधिक
लोकप्रिय
ऑडियो
ग्रीटिंग |
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| अपने विचारों से तादात्मय तोड़ें |
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अपनी आंखें बंद करें, फिर दोनों आंखों को दोनों भवों के बीच में एकाग्र करें, ऐसे जैसे तुम दोनों आंखों से देख रहे हों। अपनी संपूर्ण एकाग्रता वहां ले जाएं।
एक सही बिंदु पर तुम्हारी आंखें स्थिर हो जाएंगी। और अगर तुम्हारी एकाग्रता वहां है तो तुम्हें अजीब सा अनुभव होगा: पहली बार तुम्हारा साक्षात्कार तुम्हारे विचारों से होगा; तुम साक्षी हो जाओगे। यह चित्रपट की तरह है: विचार दौड़ रहे हैं और तुम साक्षी हो। |
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मित्रो, यदि आप हमारे इंटरनेशनल सर्वर नेटवर्क के किसी भी हिस्से को धीमा पाते हैँ तो इस असुविधा के लिए हमेँ खेद है। इस मसले को हम शीघ्र ही ठीक करेँगे। |
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