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शरीर और मन दो अलग चीजें नहीं हैं। |
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"योग का कहना है कि हमारे भीतर शरीर और मन, ऐसी दो चीजें नहीं हैं। हमारे भीतर चेतन और अचेतन, ऐसी दो चीजें नहीं हैं। हमारे भीतर एक ही अस्तित्व है, जिसके ये दो छोर हैं। और इसलिए किसी भी छोर से प्रभावित किया जा सकता है। " |
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प्रीति रूपांतरकारी रसायन है। |
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"एक तत्व हमारे भीतर है, जिसको प्रीति कहें। यह जो तत्व हमारे भीतर है--प्रीति, इसी के आधार पर हम जीते हैं। चाहे हम गलत ही जीएं, तो भी हमारा आधार प्रीति ही होता है। कोई आदमी धन कमाने में लगा है; धन तो ऊपर की बात है, भीतर तो प्रीति से ही जी रहा है--धन से उसकी प्रीति है। कोई आदमी पद के पीछे पागल है; पद तो गौण है, प्रतिष्ठा की प्रीति है। जहां भी खोजोगे, तो तुम प्रीति को ही पाओगे।" |
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नैतिकता (मॉरेलिटी) की कितनी महत्ता है? |
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"मैं आपसे कहना चाहूंगा कि मॉरेलिटी तो कोई मार्ग ही नहीं है। नीति तो कोई मार्ग ही नहीं है।
नीति मार्ग नहीं है। नीति मार्ग है इस तरह की बातें हजारों साल से प्रचलित हैं। और लोगों को यह भी खयाल है कि नैतिक हुए बिना कोई धार्मिक नहीं हो सकता, नैतिक होगा तब धार्मिक होगा।
मैं आपसे कहना चाहूंगा, नैतिक होने से कोई कभी धार्मिक नहीं होता है।" |
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मेरे बचपन से मैं सोच रहा था कि लोग सत्य को कैसे पाते हैं। इसलिए मैं पारंपरिक धर्म का अध्ययन करने के लिए जर्मनी गया। लेकिन वहां जाकर मुझे पता चला कि यह सब दिमागी कसरत है।
तो मैंने कुछ व्यावहारिक करने का फैसला किया और मैं कुकिंग स्कूल में खाना पकाना सीखने के लिए गया। लेकिन वहां भी मैंने पाया कि हर कोई एक जबरदस्त तनाव में था, सब लोग ड्रग्स या शराब ले रहे थे, और एक बहुत बुरा माहौल था।
इसी बीच मैं ओशो को पढ़ने लगा था॥ मैंने ध्यान करना शुरू किया और मुझे बहुत अच्छा लगा। मेरे बिना कुछ किये चीजें मेरे जीवन में आसान होने लगीं। एक दिन
ओशो.कॉम ब्राउज़िंग करते हुए मैंने ध्यान रिसॉर्ट के आवासीय कार्यक्रम के बारे में पढ़ा। मैं इतना प्रभावित हुआ कि मैंने कुकिंग क्लास छोड़ दिया और तीन महीने के लिए जनवरी 2007 में पुणे आने का निर्णय लिया।
आते ही इस जगह से प्यार हो गया। यहां हर दिन कुछ न कुछ नया सीखने मिलता है। मैं खुद पर हैरान हूं कि मैं बार-बार आ रहा हूं और हर बार ज्यादा लंबे समय तक रहता हूं। अब मैं भविष्य में क्या करने वाला हूं इसके बारे में नहीं सोचता, क्योंकि आज क्या हो रहा है यह मेरे लिए अधिक महत्वपूर्ण है।
यहां वास्तविकता से कोई भाग नहीं सकता। इसके विपरीत, दुनिया तुम्हारी दिशा में जो भी फेंकती है उसका वहीं प्रतिसंवेदन करना होता है।
इनर स्किल्स फॉर वर्क एण्ड लाइफ का प्रशिक्षण मेरे लिए बहुत उपयोगी रहा, उससे मुझे एक ही समय जागरूक और विश्रामपूर्ण रहने की कला आयी--जिसका अर्थ हुआ एक साथ पांच लोगों से निपटना जो पांच अलग-अलग चीज़ों के बारे में पूछ रहे हैं, दो लंबित ईमेल
पड़े हैं और लगातार फोन बज रहा है, और इस सबके बीच शांत रहना ! हर बात का आधार जागरूकता है, नियंत्रण नहीं है। इसलिए जब आप नये-नये कौशल सीखते हैं, तब आप स्वयं में और अन्य लोगों में सत्ता की ललक, क्रोध, आक्रामकता अनुभव करते हैं। लेकिन लोग उन्हें तुम्हारे खिलाफ ढोते नहीं हैं। यह उन लोगों के बारे में नहीं है, तुम्हारे अपने बारे में है।
मुझे लगता है कि संध्या ध्यान इस रिसॉर्ट की कुंजी है। उस ध्यान में सब कुछ धुल जाता है। उस समय आप अपने आप के संपर्क में आते हैं, और इस स्थान के सार तत्व से जुड़ते हैं। आप जान लेते हैं कि जो कुछ भी दिन के समय होता है वह गंभीर नहीं है। यह ईमानदार तो है लेकिन गंभीर नहीं है। अपने आपको जीवन का खेल खेलते हुए देखना इस जगह की सुंदरता है।
इसे बांटें: |
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अमृत कण
प्रकाशक: OSHO Media International
आई एस बी एन: 978-81-7261-117-0
आकार - 5.75" x 6.25"
पृष्ठ संख्या -
224
हार्ड बाउंड
पुस्तक के बारे में:
‘ओशो की अमृत अनुभूति के विराट गंगा-सागर में से कुछ अमृत बूंदें चुन कर इस छोटी सी पुस्तिका में समाहित की गई हैं।
ओशो कहते हैं ‘मैं एक गहरे अंधेरे में था, फिर मुझे सूर्य के दर्शन हुए और मैं आलोकित हुआ। मैं एक दुख में था, फिर मुझे आनंद की सुगंध मिली और मैं उससे परिवर्तित हुआ। मैं संताप से भरा था और आज मेरी श्वासों में आनंद के अतिरिक्त और कुछ भी नहीं है। मैं एक मृत्यु में था—मैं मृत ही था और मुझे जीवन उपलब्ध हुआ और अमृत ने मेरे प्राणों को एक नये संगीत से स्पंदित कर दिया। आज मृत्यु मुझे कहीं भी दिखाई नहीं देती। सब अमृत हो गया है। और सब अनंत जीवन हो गया है। अब एक ही स्वप्न देखता हूं कि वही आलोक, वही अमृत, वही आनंद आपके जीवन को भी आंदोलित और परिपूरित कर दे, जिसने मुझे परिवर्तित किया है। वह आपको भी नया जन्म और जीवन दे, जिसने मुझे नया कर दिया है।’
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ओशो |
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गीता-दर्शन, भाग एक
प्रकाशक: Rebel Publishing House, India
आई एस बी एन:
978-81-7261-062-3
आकार - 7.5" x 8.5"
पृष्ठ संख्या - 508
हार्ड बाउंड
पुस्तक के बारे में:
इस पुस्तक में गीता के प्रथम तीन अध्यायों--विषादयोग, सांख्ययोग एवं कर्मयोग--तथा विविध प्रश्नों व विषयों पर चर्चा है।
कुछ विषय बिंदु:
*विषाद और संताप से आत्म-क्रांति की ओर
*आत्म-विद्या के गूढ़ आयामों का उदघाटन
*निष्काम कर्म और अखंड मन की कीमिया
*मन के अधोगमन और ऊर्ध्वगमन की सीढ़ियां
*परधर्म, स्वधर्म और धर्म
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ओशो |
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इस महीने हमने आप के लिए क्या
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भारत, जिसे ओशो एक भूखंड नहीं पूरी मनुष्यता का एक सपना, एक अभीप्सा, एक प्यास कहते हैं--उसे इस पुस्तक में वे आमंत्रित करते हैं इक्कीसवीं सदी की दहलीज लांघ कर उन शिखरों पर चलने के लिए जहां कभी इसका बसेरा था। |
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ओशो द्वारा दिए गए ये अमृत प्रवचन भगवान महावीर के वचनों में छिपे हुए सत्य को 2500 वर्ष पश्चात पुन: उदघाटित करते हैं। जैन धर्म एवं जैन साधना का पुनरावलोकन ओशो ने किया है जिससे हम अध्यात्म के विज्ञान का नए सिरे से अनुशीलन कर सकें। ओशो का आवाहन है, महावीर के निमंत्रण को अनुभव करो। इन प्रवचनों द्वारा ओशो ने गूढ़ से गूढ़ तत्वों को महावीर के सूत्रों द्वारा सरल एवं सुगम बना दिया है। |
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इस सुरीली जलधारा की लहरों पर स्वयं को सवार होने दें। कभी आप हौले से ऊपर-नीचे जाएंगे, कभी एक जोरदार प्रवाह होगा, और आप इन लहराती हुई लहरों से विमुग्ध होंगे।
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