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। जुलाई 2006 |
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“जीवन विरोधाभासोँ से बना है। तुम्हेँ दिन, इसके
सौँदर्य को जानना होगा; तुम्हेँ रात व इसके
सौँदर्य को जानना होगा।
और स्मरण रहे, वे दोनो अलग नहीँ
है। हर दिन
तुम्हारे लिए नई रात लाता है, और हर रात
तुम्हारे लिये नया दिन लाती है। यह एक चक्र है,
वर्तुल है, एक पूर्ण इकाई है। एक
बार यदि तुम इसे समझ लो तो तुम्हारे जीवन मेँ
पूर्णता आ जायेगी: कोई निषेध नहीँ, बस, हर बात
के लिये स्वीकार-भाव। और मेरे लिये,
समग्रता मेँ जीवन का अनुभव ही एकमात्र अध्यात्म
है। ओशो |
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प्रेम इतना पीड़ादायी
क्योँ है? |
क्या आप क्रोध से
उदासी की ओर बढ़ रहे है? |
क्या कहीँ कोई
कर्म-सिद्धाँत है? |
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प्रेम इसलिये
पीड़ादायी है क्योँकि यह आनँद के
लिये मार्ग बनाता है। प्रेम
पीड़ादाई है क्योँकि यह
रूपाँतरित करता है; प्रेम डबरा
है। हर रूपाँतरण पीड़ा देगा
क्योँकि पुराने को नये के लिये
स्थान बनाना होगा। पुराना
जाना-पहचाना है, सुरक्षित है,
सँभला हुआ
है... |
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क्रोध और
उदासी, दोनो एक ही हैँ। उदासी
निष्क्रिय क्रोध है और क्रोध
सक्रिय उदासी।
क्योँकि
उदासी आसानी से आती हैऔर क्रोध
कठिन भासता है। क्योँकि
निष्क्रियता से तुम्हारा
ताल-मेल बहुत है... |
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पहली बात, कर्म
कोई सिद्धाँत नहीँ है। यह शब्द
वैज्ञानिक पुट जैसा भासता
है,जैसे कि गुरुत्वाकर्षण का
सिद्धाँत। यह
केवल आशा है, सिद्धाँत कतई
नहीँ। सदियोँ
से आशा की जाती रही है कि यदि
तुम पुण्य करोगे तो तुम
पाओगे... |
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