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| मृत्यु |
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"ध्यान करो, क्योंकि यह क्षण तुम्हारे लिए महत्व का होगा। जब कोई मरता है, कोई जिससे तुम गहराई से सम्बंधित रहे हो, कोई जिसके तुम बहुत निकट रहे हो, कोई जिसके साथ तुम सुखी और दुखी रहे हो, उदास और क्रोधित, कोई जिसके साथ तुमने जीवन की समस्त ऋतुएं जानी हैं और कोई जो एक प्रकार से तुम्हारा अंग बन गया है और तुम उसका अंग बन गए हो; जब ऐसा कोई मरता है, यह मात्र एक बाहर की मृत्यु नहीं है, यह एक मृत्यु है जो भीतर भी घटती है।…"
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| स्वास्थ्य के चार स्तंभ |
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स्वास्थ्य केवल एक शारीरिक घटना नहीं है। वह उसके आयामों का केवल एक ही आयाम है, और सबसे सतही आयाम क्योंकि मूल रूप से शरीर मरने ही वाला है-- स्वस्थ हो या अस्वस्थ, यह क्षणिक है।
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| लोभ |
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| लोभ कहां से आता है? क्या उससे छुटकारे के लिए आप मुझे कुछ उपकरण दे सकते हैं? |
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लोभ की प्रकृति को समझना ही पर्याप्त है। तुम्हें उससे छुटकारे के लिए और कुछ करने की आवश्यकता नहीं है; समझ ही सारे उलझाव को सरल कर देगी।
मनुष्य परिपूर्ण है यदि वह अस्तित्व के साथ तारतम्य में है; यदि वह अस्तित्व के साथ तारतम्य में नहीं है तो वह रिक्त है, पूर्णतया रिक्त। और उस खालीपन से लोभ आता है। |
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शिव-सूत्र
ISBN 81-7261-053-X
ISBN 978-81-7261-053-1
Paper Back
Size : - 6.5" x 8.5"
Pages - 244
Hard Back
Price - Rs.180/-
इस पुस्तक से:
अपनी तरफ देखो—न तो पीछे, न आगे। कोई तुम्हारा नहीं है। कोई बेटा तुम्हें नहीं भर सकेगा। कोई संबंध तुम्हारी आत्मा नहीं बन सकता। तुम्हारे अतिरिक्त तुम्हारा कोई मित्र नहीं है।
जैसे कि आग को तुम उकसाते हो—राख जम जाती है, तुम उकसा देते हो; राख झड़ जाती है, अंगारे झलकने लगते हैं। ऐसी तुम्हें कोई प्रक्रिया चाहिए, जिससे राख तुम्हारी झड़े और अंगारा चमके; क्योंकि उसी चमक में तुम पहचानोगे कि तुम चैतन्य हो। और जितने तुम चैतन्य हो, उतने ही तुम आत्मवान हो।
तुम्हारी महत यात्रा में, जीवन की खोज में, सत्य के मंदिर तक पहुंचने में—ध्यान बीज है। ध्यान क्या है?—जिसका इतना मूल्य है; जो कि खिल जाएगा तो तुम परमात्मा हो जाओगे; जो सड़ जाएगा तो तुम नारकीय जीवन व्यतीत करोगे। ध्यान क्या है? ध्यान है निर्विचार चैतन्य की अवस्था, जहां होश तो पूरा हो और विचार बिलकुल न हों।
ओशो
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साधना पथ
ISBN 81-7261-051-3
ISBN 978- 81-7261-051-7
Size : - 6.5" x 8.5"
Pages - 388
Hard Back
Price - Rs.230/-
यह पुस्तक ओशो की तीन अदभुत कृतियों का संकलन है—साधना पथ, अंतर्यात्रा व प्रभु की पगडंडियां।
‘साधना पथ’ में ओशो के वे प्रवचन व ध्यान-निर्देश समाहित हैं जो उन्होंने पहला साधना-शिविर संचालित करते हुए दिए थे। इन प्रवचनों में ओशो ध्यान की भूमिका व पूर्व तैयारी को समझाते हुए हमें मार्ग की कठिनाइयों से अवगत भी कराते हैं और उनका निवारण भी करते हैं।
‘अंतर्यात्रा’ में ओशो हमें ध्यान के मार्ग पर तय होने वाली यात्रा पर लिए चलते हैं—शरीर से मस्तिष्क, मस्तिष्क से हृदय, हृदय से नाभि, और अंततः शून्य में।
‘प्रभु की पगडंडियां’ में ओशो हमारे भीतर छिपे चार गुप्त द्वारों—करुणा, मैत्री, मुदिता, और उपेक्षा—से हमें परिचित करवाते हैं और उन्हें खोलने की कुंजियां हमें देते हैं।
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| चेतना ही प्रत्येक प्राणी के रूप में है, अन्य कुछ भी नहीं है। |
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| यदि तुम अपने शरीर में प्रवेश करो तो वहां भी ये तीन पर्तें हैं। केवल सतह पर तुम्हारा शरीर है। शरीर भौतिक दिखाई पड़ता है, पर उसके भीतर प्राण की, जीवंत ऊर्जा की धाराएं बहती हैं। उस जीवंत ऊर्जा के बिना तुम्हारा शरीर बस एक लाश रह जाएगा। इसके भीतर कुछ बह रहा है, उसके कारण ही यह जीवित है। वही ऊर्जा है। लेकिन गहरे और गहरे में तुम द्रष्टा हो, साक्षी हो। तुम अपने शरीर और ऊर्जा दोनों को देख सकते हो। वह द्रष्टा ही तुम्हारी चेतना है। |
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| ओशो
के प्रवचन यहां देखें |
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