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अक्टूबर 2005 |
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"तुम जो भी मान लेते हो,उसका प्रक्षेपण कर लेते
हो. मान्यता प्रक्षेपण है. यह सिनेमा-घर में लगे प्रक्षेपक की तरह
है: तुम प्रक्षेपक पर वह देखते हो जो वहां है ही नहीं.
प्रक्षेपक पीछे छुपा है, परंतु तुम प्रक्षेपक को कभी नहीं देखते,
तुम पर्दे पर देखते हो. प्रक्षेपक तो पीछे है, और सारा खेल वहीं चल
रहा है, परंतु तुम उसे पर्दे पर देखते हो. सारा खेल तुम्हारे चित्त
पर चल रहा है, और मान्यता से भरा चित्त हमेशा संसार में चीज़ों को
प्रक्षेपित करता चला जाता है, यह वहां उन चीज़ों को देखता है जो वहां
है ही नहीं."
ओशो |
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