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OSHO
इंटरनेशनल न्यूज़लेटर
सितम्बर 2 0 1 0
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"मन पूरे जीवन प्रश्न करता है और उसे कभी भी उत्तर नहीं मिलता, और हृदय कभी भी प्रश्न नहीं करता और उसे उत्तर मिल जाता है।"     ओशो
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A Loveless Heart Cannot Be Authentically Creative
एक कलाकार जब प्रेमी बनता है।
एक कलाकार होने के नाते, मैं बहुत ही आसानी से अपनी भावनाओं और प्रेम को अपने कार्य में उंड़ेल देता हूं। यही अहसास अपने संगी-साथियों के साथ मैं क्यों नहीं बांट पाता?
"शिल्पकार बनना आसान है क्योंकि तुम निर्जीव वस्तुओं को देख रहे हो। तुम सुंदर मूर्ति बना सकते हो लेकिन वे मूर्तियां मृत हैं। तुम उनके साथ संबंधित नहीं हो सकते, तुम जीवंत हो। जीवन और मृत्यु के बीच संवाद संभव नहीं है।…"
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Beyond the Herd Mentality
भीड़-मानसिकता के पार
"यह तीसरी, और आखरी, पतजंली की अंतिम किस्त "सात शरीर,' तृतीय शरीर, मन शरीर पर केंद्रित है। स्वयं में इस आयाम को विकसित होने देना वास्तविक मानवता का महत्वपूर्ण हिस्सा है।

तीसरा शरीर दूसरे से अधिक बड़ा है, दूसरे से अधिक सूक्ष्म, दूसरे से अधिक उच्चतर।…"
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How to deal with fear
बदलाव का भय
मैं अकेला महसूस करता हूं, जो कि ठीक है, लेकिन मैं भ्रमित हूं। मैं नहीं जानता कि क्या हो रहा है। मेरे भीतर चीजें बदल रही हैं इसलिए कभी-कभी मैं आतंकित हो जाता हूं, कभी-कभी अस्थिर अहसास होते हैं।
"यह स्वाभाविक है। जब कभी तुम आतंकित महसूस करो, बस विश्रांत हो जाओ। इस सत्य को स्वीकार लो कि भय यहां है, लेकिन उसके बारे में कुछ भी मत करो। उसकी उपेक्षा करो, उसे किसी प्रकार का ध्यान मत दो। शरीर को देखो। वहां किसी प्रकार का तनाव नहीं होना चाहिए। यदि शरीर में तनाव नहीं रहता तो भय स्वतः समाप्त हो जाता है। …"
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French properties
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  ओशो मेडिटेशन रिज़ॉर्ट OSHO INTERNATIONAL MEDITATION RESORT
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मैं एक वकील हूं, कैलिफोर्निया में फर्नीचर डिजाइनर का काम करती थी। एक बार मैं सेडोना एरिज़ोना में गाड़ी चला रहा थी और रास्ते में एक किताबों की दुकान देखी जिसमें ओशो की पुस्तकें थीं। जब मैंने एक किताब पर ओशो का चेहरा देखा, मैंने सोचा यह कौन आदमी है जो धूप का चश्मा लगाए है। मैं किताब पढ़ती गई और उसमें ध्यान के बारे में जो भी कहा गया था वह मुझे बेहद पसंद आ गया। मेरे अंदर तार झनझना गए। अगले महीने मैंने पुणे की टिकट ली, और मैं यहां आकर आवासीय कार्यक्रम के लिए दाखिल हुई।

यहां के लोग बाहर की तुलना में एक-दूसरे से एक अलग स्तर पर मिलते हैं, जो मुझे छू गया। यहां लोग सिर्फ प्यार के लिए काम कर रहे हैं; पैसा, सत्ता, प्रतिष्ठा इस उद्देश्य से नहीं। इसलिए वे अधिक प्रेमपूर्ण, सरल, सीधे और हार्दिक हैं।

अपने काम में ही रिलैक्स करना कार्य में एक अलग गुणवत्ता देता है।

मैं सुबह यहां पर रेस्टोरेटिव योग सिखाती हूं और वह दिन भर मुझे ताजगी देता है। इवनिंग मीटिंग यानी संध्या ध्यान सभा मुझे एक गर्म कंबल की तरह लगती है, दिन को समाप्त करने का यह एक अच्छा तरीका है। इससे पहले कि आप सभागार में प्रवेश करें, अपनी मुसीबतों को दरवाजे के बाहर छोड़ कर सामूहिक ऊर्जा में प्रवेश करें। अपने बुद्धत्व की याद दिलाने में ओशो मार्गदर्शन करते हैं, और फिर वह पूरे दिन के कामकाज में छलकता है। इससे मैं जो भी करती हूं उसमें अधिक सतर्क रहती हूं। ध्यान रिज़ोर्ट में प्रकृति, सौंदर्य, शांति, इन सबका मेल स्वयं के ध्यान के लिए बहुत ही सहायक है।

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  मल्टीवर्सिटी OSHO MULTIVERSITY
 
OSHO MULTIVERSITY
सितम्बर 18 - 20 पर क्रिएटिविटी ऐज़ योर नेचर थ्रू पेण्टिंग एण्ड पोएट्री चित्रकारी और काव्य के द्वारा अपनी रचनात्मकता को अभिव्यक्त करें। सितंबर 25 -27 के बीच पेण्टिंग एण्ड डान्सिंग क्रिएटिविटी के माध्यम से जान लें कि चित्रकारी और नृत्य हमारे परम विकास का फूल बन सकता है। इसके बाद 29 सितंबर को फास्ट ट्रैक टु योरसेल्फ में चार प्रवेश बिंदुओं: शरीर, होश, विचार और भावनाओं का उपयोग कर आप पाएंगे कि आप इन सभी से परे मौजूद हैं।

7 -10 अक्टूबर तक आप जो वास्तव अवेयरनैस इंटेन्सिव: हू इज़ इन में अपनी कुल ऊर्जा मैं कौन हूं इसकी खोज करने में लगाएं। अक्टूबर 10 - 16 पर सेल्फ हिप्नोसिस फॉर मेडिटेशन में आत्म-सम्मोहन को अपने दैनिक जीवन के लिए एक महान उपकरण का उपयोग करना सीखें।

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  पुस्तक विमोचन BOOK RELEASE
 
 
Geeta Darshan
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गीता दर्शन, Vol.8

ISBN : 81-7261-121-8
ISBN : 978-81-7261-121-7
Hard Back
Size : 7.5" x 8.5"
Pages : 580
Price : Rs.250/-

मनुष्य-जाति के इतिहास में उस परम निगूढ़ तत्व के संबंध में जितने भी तर्क हो सकते हैं, सब अर्जुन ने उठाए। और शाश्वत में लीन हो गए व्यक्ति से जितने उत्तर आ सकते हैं, वे सभी कृष्ण ने दिए। इसलिए गीता अनूठी है। वह सार-संचय है; वह सारी मनुष्य की जिज्ञासा, खोज, उपलब्धि, सभी का नवनीत है। उसमें सारे खोजियों का सार अर्जुन है। और सारे खोज लेने वालों का सार कृष्ण हैं।

ओशो

इस पुस्तक में गीता के सत्रहवें व अठारहवें अध्याय – ‘श्रद्धात्रय-विभाग-योग’ व ‘मोक्ष-संन्यास-योग’ – तथा विविध प्रश्नों व विषयों पर चर्चा है। कुछ विषय बिंदु:
• भोजन की कीमिया
• तीन प्रकार के कर्म
• सुख और शांति का भेद
• समाधान का रहस्य
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Trisha Gai ek Bund se
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साक्षी की साधना

ISBN : 81-7261-182-X
ISBN : 978-81-7261-182-8
Paper Back
Size : 5.75" x 8.25"
Pages : 224
Price : Rs.100/-

अंधेरा हटाना हो, तो प्रकाश लाना होता है। और मन को हटाना हो, तो ध्यान लाना होता है। मन को नियंत्रित नहीं करना है, वरन जानना है कि वह है ही नहीं। यह जानते ही उससे मुक्ति हो जाती है।

यह जानना साक्षी चैतन्य से होता है। मन के साक्षी बनें। जो है, उसके साक्षी बनें। कैसे होना चाहिए, इसकी चिंता छोड़ दें। जो है, जैसा है, उसके प्रति जागें, जागरूक हों। कोई निर्णय न लें, कोई नियंत्रण न करें, किसी संघर्ष में न पड़ें। बस, मौन होकर देखें। देखना ही, यह साक्षी होना ही मुक्ति बन जाता है।

साक्षी बनते ही चेतना दृश्य को छोड़ द्रष्टा पर स्थिर हो जाती है। इस स्थिति में अकंप प्रज्ञा की ज्योति उपलब्ध होती है। और यही ज्योति मुक्ति है।

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  माह का ध्यान MONTHLY MEDITATION
अपने मन को जीभ के मध्य में रखें
Keep Your Mind in the Middle of Your Tongue
मुंह को थोड़ा-सा खुला रखते हुए मन को जीभ के बीच में स्थिर करो। अथवा जब श्वास चुपचाप भीतर आए, हकार ध्वनि को अनुभव करो।

मुंह को बंद नहीं, थोड़ा-सा खुला रखना है-मानो तुम बोलने वाले हो। ऐसा नहीं कि तुम बोल रहे हो; ऐसा ही कि तुम बोलने जा रहे हो। मुंह को इतना ही खोलो जितना उस समय खोलते हो जब बोलने को होते हो। और तब मन को जीभ के बीच में स्थिर करो। तब तुम्हें अनूठा अनुभव होगा; क्योंकि जीभ के ठीक बीच में एक केंद्र है जो तुम्हारे विचारों को नियंत्रित करता है। अगर तुम अचानक सजग हो जाओ और उस केंद्र पर मन को स्थिर करो तो तुम्हारे विचार बंद हो जाएंगे। जीभ के ठीक बीच में मन को स्थिर करो-मानो तुम्हारा समस्त मन जीभ में चला आया है। जीभ के ठीक बीच में।

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