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इंटरनेशनल न्यूज़लेटर
सितंबर 2012
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रात के समय निर्णय ना लें |
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मेरी प्रेमिका के साथ मेरे संबंध मुश्किल में हैं और मैं नहीं जानता इस रिश्ते को जारी रखूं या नहीं।
“ जल्दबाजी मत करो, क्योँकि होता यह है कि मन के अपने अंधेरे व उजाले क्षण होते हैं, दिन के क्षण और रात्रि के क्षण. जब दिन का क्षण आता है तो हर चीज बहुत अच्छी लगती है; तुम हर चीज साफ-साफ देख सकते हो। जब रात आती है तो हर चीज काली हो जाती है …" |
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| बस " हां " कहो |
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| “जीवन को नकार से नहीं जिया जा सकता, और जो जीवन को नकार से जीने का प्रयत्न करते हैं वे जीवन को केवल गंवा देते हैं। आप नकार को अपना आशियाना नहीं बना सकते क्योंकि नकार पूरी तरह खाली है। नकार अंधेरे की तरह है। अंधेरे का कोई |
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वास्तविक अस्तित्व नहीं यह केवल प्रकाश की अनुपस्थिति है। इसलिए आप सीधे-सीधे अंधेरे के साथ कुछ नहीं कर सकते। आप इसे कमरे से बाहर धकेल नहीं सकते, आप इसे पड़ोसी के घर में नहीं फेंक सकते; और आप अपने घर में और अधिक अंधेरा नहीं ला सकते।… |
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इंजीनियरिग की शिक्षा, पारंपरिक कैरियर का रास्ता, और छोटे से व्यापार का मालिक, इसके अलावा अट्ठाईस वर्षों का स्वयं के विकास का अन्वेषण –– ये सब मुझे अक्टूबर 2010 के उस घटना के पास ले |
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आए, जब मैंने एकाएक अपनी सारी सम्पत्ति: घर, जायदाद, आटोमोबाइल आदि को, समेट दिया। इन पूर्व वर्षों की जीवन की मात्र कुछ छोटी चीजें:… |
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दुख में अदायगी
दुख तुम्हेँ वह सब देता है जो सुख नहीँ दे सकता. वास्तव मेँ सुख तुम्हेँ हर चीज़ से वँचित कर देता है. सुख तुमसे वह सब छीन लेता है जो कभी तुम्हारे पास था, जो तुम कभी थे; सुख तुम्हेँ मिटा देता हैi.
दुख तुम्हारे अहँकार को पोषित करता है और सुख मूलत: निरहँकार की अवस्था है. वही समस्या है और वही |
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समस्या की जड़. तभी सुखी होना लोगोँ को बहुत कठिन लगता है. तभी सँसार मेँ लाखोँ लोग दुख मेँ ही जीते हैँ... उन्होँने दुख मेँ ही जीने की ठान ली है. यह तुम्हेँ बहुत सूक्ष्म अहँकार देता है.… |
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आप ट्रिम होना चाहते है, भीतर देखे
मैँ खाना बँद क्योँ नहीँ कर सकता? लेकिन प्रश्न यह नहीँ है; उसके पीछे कुछ और है, कुछ और. यह बहुत बचकाना लगता है… |
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नहीँ, मूल्यांकन मत करो, अगर तुम इसे बचकाना कहते हो तो तुमने इसे पहले ही निँदित कर दिया, और वही समस्या की जड़ है.… |
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जिन खोजा तिन पाइयां
मनुष्य साधारणतः आदत में जीता है और आदत को तोड़ना कठिनाई मालूम पड़ती है। हमारी भी सब आदतें हैं, जो ध्यान में बाधा बनती हैं। … |
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| ओशो इंटरनेशनल न्यूज़लेटर, सितंबर 2012 |
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