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| इस जीवन में मैंने दुख ही दुख क्यों पाया है? |
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"दुख ही दुख अगर पाया है तो बड़ी मेहनत की होगी पाने के लिए, बड़ा श्रम किया होगा, बड़ी साधना की होगी, तपश्र्चर्या की होगी! अगर दुख ही दुख पाया है तो बड़ी कुशलता अर्जित की होगी! दुख कुछ ऐसे नहीं मिलता, मुफ्त नहीं मिलता। दुख के लिए कीमत चुकानी पड़ती है।
आनंद तो यूं ही मिलता है; मुफ्त मिलता है; क्योंकि आनंद स्वभाव है। दुख अर्जित करना पड़ता है। और दुख अर्जित करने का पहला नियम क्या है? सुख मांगो और दुख मिलेगा। सफलता मांगो, विफलता मिलेगी। सम्मान मांगो, अपमान मिलेगा। ...." |
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| ऊपर से देखने पर आदमी जैसा दिखाई पड़ता है, वह उसका पूरा शरीर नहीं है। |
"भोजन आपके शरीर को रोज नया शरीर दे रहा है, और आपके शरीर से मुर्दा शरीर रोज बाहर फेंका जा रहा है। यह सतत प्रकि"या है। इसलिए शरीर को अन्नमयकोश कहा है, क्योंकि वह अन्न से ही निर्मित होता है।
और इसलिए बहुत कुछ निर्भर करेगा कि आप कैसा भोजन ले रहे हैं। इस पर बहुत कुछ निर्भर करेगा। आपका आहार सिर्फ जीवन चलाऊ नहीं है, वह आपके व्यक्तित्व की पहली पर्त निर्मित करता है। और उस पर्त के ऊपर बहुत कुछ निर्भर करेगा कि आप भीतर यात्रा कर सकते हैं या नहीं कर सकते हैं; क्योंकि सभी भोजन एक जैसा नहीं है।
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| बच्चों को अंतर्मुखी कैसे बनाया जाए? |
| पहली तो बात यह है कि बच्चों को कैसा बनाया जाए, इसकी बजाय हमेशा यह सोचना चाहिए, खुद को कैसा बनाया जाए।
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| "....हमेशा हम यह सोचते हैं कि दूसरों को कैसा बनाया जाए। और मैं यह भी आपसे कहूं कि वही व्यक्ति यह पूछता है कि दूसरों को कैसा बनाया जाए, जो खुद ठीक से बनने में असमर्थ रहा है। अगर उसके खुद के व्यक्तित्व का ठीक-ठीक निर्माण हुआ हो, तो जीवन के जिन सूत्रों से उसने खुद को निर्मित किया है, खुद के जीवन में शांति को, स्वयं को पाने की दिशा खोजी है, खुद के जीवन में संगीत पाया है, उन्हीं सूत्रों से, उन्हीं सूत्रों के आधार पर, वह दूसरों के निर्माण के लिए भी अनायास अवसर बन जाता है।...." |
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मैं सन 2005 से ओशो इंटरनेशनल मेडिटेशन रिजॉर्ट आ रही थी, और हर भेंट मानो एक साहसिक अभियान थी जो मुझे अस्तित्व के करीब लाती थी।
यहां जो लोग काम करते थे उनके भीतर खिला हुआ आनंद मुझे हमेशा छू जाता था। उससे मेरे अंदर एक गहरी चाहत पैदा हुई कि मैं भी रेसिडेन्शियल कार्यक्रम में शामिल होऊं। सो अमरीका में मैं जो काम कर रही थी, जिसमें मैं हमेशा तनाव और ऊब से भरी रहती, उसे मैंने छोड़ दिया और यहां दो महीने के लिए कार्य ध्यान में सहभागी हुई। मैं काम करते हुए खुद को साक्षीभाव से देखने की कोशिश करने लगी, ओशो की दृष्टि का पालन करती हुई : ' तुम क्या करते हो इससे अधिक महत्वपूर्ण है, तुम उसे कैसे करते हो।'
मुझे ऐसा काम दिया गया जिसके बारे में मैं कुछ नहीं जानती थी लेकिन मेरे प्रशिक्षक और इस अत्यधिक सहयोगी वातावरण के कारण मैं यह नया काम सहर्ष सीख सकी।
यहां पर काम करने में तीन मुख्य ध्यान आधार स्तंभ हैं:
ओशो डायनेमिक,
ओशो कुंडलिनी और संध्या ध्यान सभा। इससे कार्य में ध्यान की सुगंध घुल जाती है।
और रात होनेवाली नृत्य और रचनात्मक पार्टियां सोने में सुहागे का काम करती हैं।
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ओपनिंग टु दि फीलिंग: ब्रैथ में फिर से अपने सांस की पूरी रेंज से परिचित हों, और उसकी मदद से अपने जीवन की पूर्णता को महसूस करने की क्षमता को वापिस पा लें, 16 - 18 मई के बीच। और 21- 23 मई तक ओशो ध्यान विधियों के कौशल सीखने का आनंद लें और दूसरों को सिखाने का आत्मविश्वास पाएं
ओशो ध्यान प्रशिक्षण में। 26 - 27 मई तक
ओपनिंग टु दि हार्ट : इसमें आपको हृदय के सच्चे और मूलभूत गुणों को खोजने और उनके साथ संबंधित होने का अवसर मिलेगा।
जून 1 - 3 पर कार्य और जीवन के आंतरिक कौशल को समझें और अनुभव करें
इनर स्किल्स फॉर वर्क एण्ड लाइफ में। 3 - 6 जून
अवेयरनेस इंटेंसिव:हू इज़ इन? आप जो वास्तव में हैं उसकी खोज में आपकी पूरी ऊर्जा का ध्यान केंद्रित करने के लिए डिज़ाइन किया गया है। अप्रैल 4 पर,
फास्ट ट्रैक टु योरसेल्फ -- खुद के पास आने के लिए शरीर के चार प्रवेश बिंदुओं: होश, विचार और भावनाओं का उपयोग कर आप पाएंगे कि आप इन सभी से परे हैं। रचनात्मकता के माध्यम से मैं को विलीन करने का सबसे अच्छा और हल्का-फुल्का तरीका होगा
डिसपीयर इनटु दि पेंटिंग 4 से 6 जून से तक। और फिर
सेल्फ हिप्नोसिस फॉर मेडिटेशन में 10 जून से 16 जून आप सीख सकते हैं आत्म सम्मोहन के तरीके जिन्हें आप अपने दैनिक जीवन के लिए एक व्यावहारिक उपकरण के रूप में उपयोग कर सकते हैं ।
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अध्यात्म उपनिषद
प्रकाशक: OSHO Media International
आई एस बी एन: 978-81-7261-030-2
आकार - 6.5" x 8.5"
पृष्ठ संख्या - 332
हार्ड बाउंड
“यह उपनिषद अध्यात्म का सीधा साक्षात्कार है। सिद्धांत इसमें नहीं हैं, इसमें सिद्धों का अनुभव है। इसमें उस सब की कोई बातचीत नहीं है जो कुतूहल से पैदा होती है, जिज्ञासा से पैदा होती है। नहीं, इसमें तो उनकी तरफ इशारे हैं जो मुमुक्षा से भरे हैं, और उनके इशारे हैं जिन्होंने पा लिया है।"
ओशो
पुस्तक के कुछ विषय-बिंदु:
शिक्षक होने में मजा क्या है?
कहां खोजें परमात्मा को?
वासना का अर्थ क्या है?
मृत्यु जब घटती है तो कौन मरता है?
“धर्म, दर्शन, विज्ञान, इतिहास, साहित्य, संस्कृति, कला आदि का कोई भी क्षेत्र ऐसा नहीं है, जो ओशो से अछूता बचा हो। वे विद्या-व्यसनी रहे, उनका विशाल पुस्तकालय इसका प्रमाण है।
वेद, उपनिषद, पुराण, महाभारत, गीता, बाइबिल, धम्मपद, ग्रंथसाहिब आदि सब कुछ उन्होंने आत्मसात कर लिया है। उनकी सबसे बड़ी विशेषता यह है कि उन्होंने धर्म-ग्रंथों में लिखे शब्द को यथावत स्वीकार नहीं किया। उस शब्द की भावना को अपने मौलिक चिंतन की कसौटी पर कसा और उसके गूढ़ अर्थ को प्रकट किया। उनकी दृष्टि एक वैज्ञानिक की दृष्टि है।" यशपाल जैन
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