ओशो ऑडियो पुस्तक - प्रवचन: Agyat Ki Or--अज्ञात की ओर  – धर्म की सही शिक्षा  (mp3)

 

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Agyat Ki Or--अज्ञात की ओर

Track #2 of the Series, Agyat Ki Or -- अज्ञात की ओर

इसके पहले कि मैं धर्म और शिक्षा के संबंध में आपसे कुछ कहूं, यह कह देना जरूरी है कि धर्म से मेरा अर्थ हिंदू, मुसलमान और जैन से नहीं है, ईसाई और पारसी से नहीं है। जब तक कोई मनुष्य हिंदू है या मुसलमान है तब तक धार्मिक होना असंभव है।
 
 
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और ओशो आगे कहते हैं:
"जितने लोग धर्म और शिक्षा के लिए विचार करते हैं और जो लोग शिक्षा के साथ धर्म को जोड़ना चाहते हैं, धर्म से उनका अर्थ या तो हिंदू होता है या मुसलमान होता है या ईसाई होता है। ऐसी धार्मिक शिक्षा धर्म तो नहीं लाएगी मनुष्य को और अधिक अधार्मिक बनाती है। इस तरह की शिक्षा तो कोई चार-पांच हजार वर्षों से मनुष्य को दी जाती रही है। लेकिन उसने कोई बेहतर मनुष्य पैदा नहीं किया। उससे कोई अच्छा समाज पैदा नहीं हुआ। विपरीत हिंदू, मुसलमान और ईसाई के नामों पर जितना अधर्म, जितनी हिंसा, जितना रक्तपात हुआ है उतना किसी और बात से नहीं हुआ।
यह जान कर बहुत हैरानी होती है, नास्तिकों के ऊपर, उनके ऊपर जो धर्म के विश्वासी नहीं हैं, बड़े पापों का कोई जिम्मा नहीं है। बड़े पाप उन लोगों के नाम पर हैं जो आस्तिक हैं। नास्तिकों ने न तो मंदिर जलाए हैं, न मस्जिदें, और न लोगों की हत्याएं की हैं। हत्याएं की हैं उन लोगों ने जो आस्तिक हैं। मनुष्य को मनुष्य से विभाजित भी उन लोगों ने किया है जो आस्तिक हैं। जो अपने को धार्मिक समझते हैं उन्होंने ही मनुष्य और मनुष्य के बीच दीवाल खड़ी की है। तो यदि धार्मिक शिक्षा का यह अर्थ हो कि हम गीता सिखाएं, कुरान सिखाएं या बाइबिल सिखाएं, तो यह बड़ी खतरनाक शिक्षा होगी। यह शिक्षा धार्मिक नहीं हो सकती। क्योंकि ये बातें जिन लोगों को सिखाई गई हैं वे लोग कोई अच्छे मनुष्य सिद्ध नहीं हुए हैं। और इन बातों के नाम पर जो भेद खड़े हुए हैं उन्होंने मनुष्य के पूरे इतिहास को रक्तपात और हिंसा से भर दिया है, क्रोध और घृणा से भर दिया। तो सबसे पहली बात तो मैं यह कहना चाहता हूं कि धर्म की शिक्षा से मेरा प्रयोजन किसी संप्रदाय, उसकी धारणाओं, उसके सिद्धांतों की शिक्षा से नहीं है। एक बात निषेधात्मक रूप से, यदि हम चाहते हैं कि शिक्षा और धर्म संबंधित हों, तो हमें चाहना होगा कि हिंदू, मुसलमान और ईसाई शब्दों से धर्म का संबंध टूट जाए। तो ही शिक्षा और धर्म संबंधित हो सकते हैं। नहीं तो शिक्षा और धर्म कभी संबंधित न हो सकते हैं और न होने चाहिए। अगर एक धार्मिक सभ्यता पैदा करनी हो, तो वह सभ्यता हिंदू नहीं होगी, वह सभ्यता मुसलमान भी नहीं होगी; वह सभ्यता पूरब की भी नहीं होगी, वह सभ्यता पश्चिम की भी नहीं होगी। वह सभ्यता अखंड मनुष्य की होगी, सबकी होगी, समग्र की होगी। किसी एक अंश और एक खंड की वह सभ्यता नहीं हो सकती। क्योंकि जब तक हम मनुष्यता को खंडित करेंगे तब तक हम द्वंद्व और युद्ध से मुक्त नहीं हो सकते। जब तक मेरे और आपके बीच कोई दीवाल होगी तब तक बहुत कठिनाई है कि हम एक ऐसे समाज को निर्मित कर सकें जो प्रेम और आनंद में जीए।
"
 

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