Amrit Dwar--अमृत द्वार (Audio(Indiv))

 

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Amrit Dwar--अमृत द्वार

Track #1 of the Series, Amrit Dwar--अमृत द्वार

‘सदगुरु के शब्द तो वे ही हैं जो समाज के शब्द हैं। और कहना है उसे कुछ, जिसका समाज को कोई पता नहीं। भाषा तो उसकी वही है, जो सदियों-सदियों से चली आई है—जराजीर्ण, धूल-धूसरित। लेकिन कहना है उसे कुछ ऐसा नित-नूतन, जैसे सुबह की अभी ताजी-ताजी ओस, कि सुबह की सूरज की पहली-पहली किरण! पुराने शब्द बासे, सड़े-गले, सदियों-सदियों चले, थके-मांदे, उनमें उसे डालना है प्राण। उनमें उसे भरना है उस सत्य को जो अभी-अभी उसने जाना है—और जो सदा नया है और जो कभी पुराना नहीं पड़ता।’-ओशो
 
 
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Osho International
55
 
 
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उद्धरण: अमृत द्वार,पहला प्रवचन
"एक अमावस की रात्रि थी, और एक व्यक्ति मधुशाला गया। जाते समय उसने सोचा कि रात जब लौटूंगा, अंधेरा बहुत हो जाएगा। और फिर मैं नशे में भी होऊंगा। साथ में लालटेन लेता चलूं। वह लालटेन लेकर मधुशाला गया। फिर उसने वहां शराब पी और आधी रात बीते वह अपने घर की तरफ वापस लौटा। चलते वक्त उसने लालटेन उठा ली और घर की तरफ चला। लेकिन रास्ते पर जगह-जगह खड़े हुए जानवरों से, मकानों से, रास्ते पर गुजरते लोगों से उसकी टक्कर होने लगी। वह बार-बार अपनी लालटेन उठा कर देखने लगा और पूछने लगा अपने मन में कि आज लालटेन को क्या हो गया है? प्रकाश नहीं मालूम होता? रास्ता बड़ा अंधेरा मालूम पड़ता है, लालटेन कुछ प्रकाश नहीं देती। फिर आखिर में वह एक दीवाल से टकरा कर नाली में गिर पड़ा। उसने गुस्से से लालटेन पटक दी और उसने कहा कि ठीक ही कहते थे पुराने लोग कि कलयुग आएगा, जब प्रकाश भी फिर प्रकाश नहीं देगा। यह लालटेन भी कलयुगी मालूम पड़ती है।
फिर सुबह उसे बेहोश हालत में ही घर उठा कर पहुंचाया गया। दोपहर मधुशाला के मालिक ने एक नौकर भेजा और उसके साथ एक चिट्ठी भेजी। उस चिट्ठी को उसने जाकर उस रात शराब पीए आदमी को दी। उस चिट्ठी में मधुशाला के मालिक ने लिखा था: मेरे मित्र, रात तुम भूल से अपनी लालटेन की जगह मेरे तोते का पिंजरा उठा कर ले गए। मैं लालटेन वापस भेज रहा हूं, कृपा करके मेरा तोते का पिंजरा तुम वापस लौटा देना। तब उसने पीछे जाकर देखा, वह रात तोते का पिंजरा ले आया था।
अब तोते के पिंजड़ों से प्रकाश नहीं निकलता। लेकिन बेहोश आदमी को यह ही पता नहीं चलता है कि क्या लालटेन है, क्या तोते का पिंजड़ा है।
आज तक आदमी धर्म के नाम पर तोतों के पिंजड़े पकड़े रहा है, इसलिए धार्मिक दुनिया पैदा नहीं हो सकी, और आदमी का परिवर्तन नहीं हो सका। धर्म के नाम पर हम तोतों के पिंजड़े पकड़े हुए हैं, प्रकाशित दीये नहीं। इस बात में कि पूरब के लोग धार्मिक थे, या भारत के लोग आध्यात्मिक थे, यह बात सरासर झूठी है। अब तक कोई जमीन पर कोई मुल्क आध्यात्मिक नहीं रहा है। इस झूठी बात के कारण हमको यह भ्रम पैदा होता है कि हम आध्यात्मिक थे, फिर भी हम शांत नहीं हो सके। और तब इसका अंतिम परिणाम यह होगा कि अगर इतने आध्यात्मिक होते हुए भी हम शांत नहीं हो सके, तो इसका मतलब साफ है कि सारी दुनिया कितनी ही आध्यात्मिक हो जाए, शांत नहीं हो सकेगी। -- ओशो
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