ओशो ऑडियो पुस्तक - प्रवचन: Apui Gai Hirai - आपुई गई हिराय – नी सईयो मैं गई गुवाची  (mp3)

 

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Apui Gai Hirai - आपुई गई हिराय

Track #1 of the Series, आपुई गई हिराय – Apui Gai Hirai

सत्य की खोज में, धर्म के आविष्कार में एक अदभुत क्षण आता है जब खोजने वाला स्वयं को स्वयं की तरह खो देता है और सागर की तरह पा लेता है।
‘पिय को खोजन मैं चली, आपुई गई हिराय।’
संत पलटू के इस वचन से शुरू होने वाली इस प्रश्नोत्तर प्रवचनमाला में ओशो ने शिष्यों को मार्गदर्शन दिया है, साधकों की समस्याओं का समाधान किया है, जिज्ञासुओं को अंतर्दृष्टि दी है एवं संतापग्रस्त मनुष्यों को अहंकारमुक्ति व आनंद-उपलब्धि का उपाय समझाया है।
इसके साथ ही साथ ओशो ने संत बुल्लेशाह के सीधे-सरल वचनों एवं आदि शंकराचार्य के सूत्रों पर भी अपनी पैनी अंतर्दृष्टि दी है। शेरो-शायरी एवं हास्य-कविताओं के भरपूर उपयोग से ओशो के ये प्रवचन समझने में सरल होने के साथ-साथ अत्यंत रसपूर्ण भी हो गए हैं।
 
 
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Osho International
87
 
 
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उद्धरण: आपुई गई हिराय,पहला प्रवचन
"पलटू सीधे-सादे आदमी हैं, पंडित नहीं हैं, शास्त्रों के ज्ञाता नहीं हैं, लेकिन स्वयं का अनुभव किया है। और वही शास्त्रों का शास्त्र है। वेद से चूके तो कुछ खोओगे नहीं; अपने से चूके तो सब गंवाया। कुरान आई या न आई चलेगा, लेकिन स्वयं की अनुभूति तो अनिवार्य है।
जो अपने को बिना जाने इस जगत से विदा हो जाते हैं, वे आए ही नहीं; आए तो व्यर्थ आए; उन्होंने नाहक ही कष्ट झेले। फूल चुनने आए थे और कांटों में ही जिंदगी बिताई। आनंद की संभावना थी, ऊर्जा थी, बीज थे, भविष्य था, लेकिन सब मटियामेट कर डाला। जिससे आनंद बनता उससे विषाद बनाया। जो अमृत होता उससे जहर निर्मित किया। जिन ईंटों से स्वर्ग का महल बनता उन्हीं ईंटों से, अपने ही हाथों से, नरक की भट्टियां तैयार कीं। और चूक छोटी सी, चूक बड़ी छोटी सी--कि अपने को बिना जाने जीवन की यात्रा पर चल पड़े; अपने को बिना पहचाने जूझ गए जीवन के संघर्ष में; अपने को बिना पहचाने हजार-हजार कृत्यों में उलझ गए; खूब बवंडर उठाए, आंधियां उठाईं, तूफान उठाए; दौड़े, आपाधापी की, छीना-झपटी की; मगर यह पूछा ही नहीं कि मैं कौन हूं, कि मेरी नियति क्या है, कि मेरा स्वभाव क्या है।
और जब तक कोई व्यक्ति अपने स्वभाव को न जान ले, जो भी करेगा गलत करेगा; और जिसने स्वभाव को जाना, वह जो भी करेगा सही करेगा।
इसलिए मैं तुम्हें नीति नहीं देता हूं और न कोई ऊपर से थोपा गया अनुशासन देता हूं; देता हूं केवल एक प्यास--एक ऐसी प्यास जो तुम्हें स्वयं को जानने के लिए उद्वेलित कर दे, जो तुम्हारे भीतर एक ऐसी आग जलाए कि न दिन चैन न रात चैन, जब तक कि अपने को न जान लो।
और जिसने भी अपने को जाना है, फिर कुछ भी करे, उसका सारा जीवन सत्य का जीवन है। लोग पहचानें कि न पहचानें, लोग मानें कि न मानें, स्वभाव की अनुभूति के बाद, सत्य की किरणें वैसे ही विकीर्णित होने लगती हैं जीवन से, जैसे सुबह सूरज के ऊगने पर रात विदा हो जाती है, और पक्षियों के कंठों में गीत आ जाते हैं, और फूलों में प्राण आ जाते हैं। रात भर सोए पड़े थे, आंखें खोल देते हैं। पंखुरियां खुल जाती हैं, गंध विकीर्णित होने लगती है। ऐसे ही स्वयं का अनुभव परम का अनुभव है।"-- ओशो
 

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